सबिता बनर्जी :
दरिंदगी में पिसती बेटियां,
कभी निर्भया, कभी संजली,
कभी फुलन, कभी मधुमिता,
ये तो वो नाम हैं जो दरिंदगी की भेंट चढ़कर सुर्खियों में आईं।
पर न जाने कितनी अनाम बेटियां भी दरिंदगी से पिसती हुई, अपनी जान गंवाई।
बावजूद इन अनामों को ढूढनें की, बंदिशें लगा रहे हैं बेटियों के जीवन पर।
खड़े करते रहे हैं कईं संदिग्ध सवाल, बेटियों की स्वतंत्रता पर।
मना रहे एक ओर आज़ादी का 78वां महोत्सव
दूसरी ओर अपने ही घरों, मोहल्लों, कार्यस्थलों पर देखो
बेटियों की अस्मिता पर हो रहे घाव।
हम महिलाएं इंसान हैं, हम भी भारत के नागरिक हैं
फिर रात, अकेले, सुनसान, यहाँ- वहाँ जैसे शब्दों के साथ
क्यों? क्या ज़रूरी? जैसे सवालिया बौछार के साथ अन्यथा क्यों?
बहुत हुआ नारी जागरूकता और नारियों के लिए नैतिकता का पाठ।
पढ़ाओ अब बेटों को नैतिकता, बदलो सब अपनी मानसिकता,
अगर चाहते हो शांतिपूर्ण खुशहाल समाज ।।

