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एक नजर मेहतर बस्ती की ओर – कविता

विश्वजीत नास्तिक:

रखा गया इन्हे कुछ इस
तरह कि इन्हे
पता ही न चले
वे किस नरक में जी रहे हैं।

सरकारी कर्मचारी, ठेकेदारों, ज़मींदारों की
रोज़ सुनते ताना और गाली।
जब अपने शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठाते
तो यह भ्रष्ट सिस्टम इन्हे डराती और नौकरी से निकालने को धमकाती।

शहर से इनको किया अलग,
अलग किया गाँव और कस्बे से
जब तक कुछ समझ पाते
तब तक धकेले गए गंदी नाली में।

सिर्फ इन्होंने जाना है
कैसी होती है पीप – खून -पेशाब और मैले की नदी,
एक अंधे कुएं में पड़े हैं
ये लोग।

एक सड़क सींचते हैं
दूसरे गटर में जाते हैं।
न मुंह पर मास्क
न ही हाथों में दस्ताने।

सब कामों की इज्ज़त है
पर ये जो काम करते है,
सबसे महान और बड़ा काम,
हर दिन अपनी मौत से लड़ते हैं।
हर दिन ज़लील होते, बेइज्जत होते हैं।
क्या इन्हे कभी इज्ज़त मिलेगी?

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