विलसन एक्का:
वर्तमान समय में आदिवासी सवाल और उसकी चुनौतियाँ –
वर्तमान समय को केवल एक ऐतिहासिक कालखंड मान लेना एक गंभीर बौद्धिक चूक होगी। “वर्तमान” वह दौर है जहाँ अन्याय को सामान्य, शोषण को वैध और असमानता को विकास का नाम देकर प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी तरह “राजनीति” को केवल दलगत गतिविधियों तक सीमित कर देना भी वास्तविकता से मुँह मोड़ना है। राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज में मूल्यों के क्षरण, सिद्धांतों के खोखलेपन और नैतिक पतन को तर्कों और नीतियों की भाषा में ढक दिया जाता है। इसी संदर्भ में यह लेख आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति को “संप्रभुता” के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता है I संप्रभुता, अर्थात अपने जीवन, प्रकृति, संसाधन, निर्णय और भविष्य पर सामूहिक नियंत्रण। यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि यहाँ “आदिवासी समाज” से आशय उन मौलिक, प्राकृतिक आदिवासी समुदायों से है जो आदिकाल से अपने विशिष्ट भू-भागों में रहते आए हैं और न कि उन समुदायों से जिन्हें बाद में प्रशासनिक रूप से “अनुसूचित जनजाति (ST)” की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया।
विकास के पैमाने और आदिवासी समाज: एक थोपा गया मूल्यांकन – आज पूरे देश में आदिवासी समाज को उन्हीं “विकास के पैमानों” से परखा जाता है जिन्हें गैर-आदिवासी, पश्चिमी और मुख्यधारा समाज ने अपने हितों के अनुरूप गढ़ा है। इन पैमानों के अनुसार आदिवासी समाज आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जो पचास वर्ष पहले थीं, हालांकि उनकी गहराई और तीव्रता में अवश्य वृद्धि हुई है। यहाँ मूल प्रश्न “समस्या” का नहीं, बल्कि मूल्यांकन के दृष्टिकोण का है। आदिवासी समाज के जीवन को कभी उसकी अपनी दृष्टि से समझने का ईमानदार प्रयास नहीं किया गया। “विकास” शब्द स्वयं आदिवासी समाज के संदर्भ में एक बाहरी अवधारणा है, जिसे बिना सहमति, बिना समझ और बिना संवेदनशीलता के उन पर थोपा गया। यह सर्वविदित तथ्य है कि आदिवासी समाज आदिकाल से प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर, अपने विशिष्ट सामाजिक ढाँचे के साथ, प्राकृतिक लोकतंत्र का रचयिता रहा है। बाहरी हस्तक्षेप से पहले आदिवासी समाज न तो अविकसित था और न ही अव्यवस्थित बल्कि वह अपने तरीके से पूर्ण, संतुलित और आत्मनिर्भर था।
खुशहाली बनाम विकास: मूलभूत अंतर – आदिवासी समाज और बाहरी समाज के बीच अंतर केवल नस्ल, भाषा, संस्कृति या रहन-सहन तक सीमित नहीं रहा है। यह अंतर दृष्टिकोण, जीवन-दर्शन, सामाजिक संरचना और प्रकृति के प्रति व्यवहार में भी निहित है। बाहरी हस्तक्षेप से पहले आदिवासी समाज अपने और प्रकृति के बीच खुशहाली के साथ जीता आया। यह खुशहाली किसी आर्थिक सूचकांक या भौतिक उपलब्धियों पर आधारित नहीं थी। यह लूट, दोहन, लालच, स्वार्थ और प्रभुत्व से मुक्त जीवन-पद्धति थी। इसके विपरीत, बाहरी समाज की प्रवृत्ति ऐतिहासिक रूप से विस्तारवादी, मुनाफाखोर और अधिपत्यकारी रही है। यही प्रवृत्तियाँ बाहरी हस्तक्षेप के साथ आदिवासी समाज में प्रवेश करती हैं और यहीं से संकट की शुरुआत होती है। “विकास” जहाँ चयनित आर्थिक और भौतिक पैमानों से आँका जाता है, वहीं “खुशहाली” लोगों, गाँवों और समाज की सामूहिक शांति, संतोष, सुरक्षा और संतुलन से मापी जाती है। इस अंतर को न समझना, या जानबूझकर नज़रअंदाज़ करना, आदिवासी समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा बौद्धिक और राजनीतिक अन्याय है।
बाहरी हस्तक्षेप और खुशहाली का क्षरण – यह स्वीकार करना होगा कि जब तक आदिवासी समुदायों के जीवन में बाहरी (गैर-आदिवासी) हस्तक्षेप नहीं हुआ था, तब तक वे अपने भू-भागों में सुखी, संतुष्ट और खुशहाल थे। भले ही वे आधुनिक दुनिया द्वारा परिभाषित “विकास” के पैमानों पर खरे न उतरते हों, परंतु उन्होंने कभी भी स्वयं को अपूर्ण या पिछड़ा नहीं माना। बाहरी हस्तक्षेप के साथ आदिवासी समाज से वे तत्व धीरे-धीरे छिनते गए जो उनकी खुशहाली की बुनियाद थे। शिक्षा इसका स्पष्ट उदाहरण है। आदिवासी समाज औपचारिक शिक्षा से मुश्किल से तीसरी पीढ़ी में जुड़ा है, जबकि मुख्यधारा का प्रभावशाली और अभिजात वर्ग पीढ़ियों से शिक्षित रहा है। इसके बावजूद दोनों से समान प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा करना स्वयं में एक संरचनात्मक अन्याय है। यह स्थिति उस दौड़ की तरह है जहाँ आदिवासी समाज को शून्य से और मुख्यधारा के अभिजात वर्ग को 40–50 मीटर आगे से शुरुआत करने का अवसर मिला। ऐसे में “विकास” की तुलना न केवल अनुचित है, बल्कि कपटपूर्ण भी है। क्योंकि आदिवासी समाज कभी वास्तव में “पिछड़ा” नहीं था, वह अलग है, स्वायत्त है और खुशहाल है।वह गैर-आदिवासी समाज द्वारा गढ़े गए विकास मॉडल के अनुरूप कभी विकसित नहीं था और न ही हो सकता है।बाहरी हस्तक्षेप के साथ आदिवासी समाज से उसकी खुशहाली के मूल तत्व छिनते गए और आज उसे उसी व्यवस्था के पैमानों पर असफल घोषित किया जा रहा है जिसने उसकी संप्रभुता और संतुलन को नष्ट किया।
बाहरी हस्तक्षेप के साथ आंतरिक क्षरण – आदिवासी संप्रभुता का दोहरा संकट – यह मानना आवश्यक है कि आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति केवल बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम नहीं है। इस पूरी ऐतिहासिक यात्रा में आदिवासी समुदायों और स्वयं आदिवासियों की आंतरिक कमजोरियाँ भी बराबर की सहभागी रही हैं। यह स्वीकारोक्ति किसी आत्म-दोषारोपण के लिए नहीं, बल्कि वास्तविकता को पूरी ईमानदारी से देखने के लिए अनिवार्य है। पारंपरिक रूप से आदिवासी समाज कभी भी प्रभुत्व स्थापित करने वाली या विस्तारवादी प्रवृत्ति वाला समाज नहीं रहा। वह बाहरी दुनिया से लगभग अनभिज्ञ था, न ही इसलिए कि वह अज्ञानी था, बल्कि इसलिए कि उसे बाहरी दुनिया की आवश्यकता ही नहीं थी। परंतु जैसे ही मुख्यधारा की शिक्षा और बाहरी ज्ञान का प्रवेश हुआ, उसके साथ ऐसे अनेक पैटर्न भी आए जो आदिवासी जीवन-दर्शन के मूल स्वभाव से मेल नहीं खाते थे जो कि व्यक्तिवाद, मुनाफा, व्यक्तिगत लाभ, व्यक्तिगत प्रभुत्व और प्रतिस्पर्धा प्रमुख हैं। धीरे-धीरे वे मूल्य, व्यवहार और विचारधाराएँ, जो सदियों से आदिवासी खुशहाली की नींव थीं, कमजोर पड़ने लगीं। पीढ़ियों तक आदिवासी समाज ने बाहरी दुनिया की ओर कदम बढ़ाए—यह परिवर्तन कुछ हद तक स्वाभाविक भी था। किंतु इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा “समझौता” अपनी “खुशहाली” के साथ किया गया। आज स्थिति यह है कि आदिवासी समाज उस बिंदु तक पहुँच चुका है जहाँ पीछे लौटने का कोई सहज रास्ता शेष नहीं दिखता।
संप्रभुता का अर्थ: क्यों खुशहाली समाप्त होते ही नियंत्रण छिन गया
जब आज बाहरी हस्तक्षेप को तथ्यात्मक दृष्टि से समझने की कोशिश होती है, तब “संप्रभुता” का अर्थ स्वतः स्पष्ट होने लगता है। इतिहास साक्षी है कि जब तक आदिवासी समुदाय बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त थे, तब तक वे संतुष्ट, सुरक्षित और खुशहाल थे। उनकी अपनी स्वशासन प्रणालियाँ थीं जैसे सामूहिक या सामुदायिक नीति, निर्णय और सामाजिक कानून भले ही आधुनिक शिक्षा, मेडिकल विज्ञान या तकनीक मौजूद न रही हो। बाहरी हस्तक्षेप के बाद आदिवासी जीवन के हर क्षेत्र में परिवर्तन आया, भाषा, साहित्य, रहन-सहन, संस्कृति, सोच, दृष्टि और सामाजिक व्यवहार। इसके साथ-साथ व्यक्तिवाद, लाभ, मुनाफा, अधिपत्य, स्वार्थ और प्रभुत्व जैसे विकार भी धीरे-धीरे जड़ पकड़ने लगे। ये परिवर्तन केवल बाहरी दबाव के कारण नहीं, बल्कि आंतरिक स्वीकार्यता के कारण भी संभव हुए। परिणामस्वरूप, आदिवासी खुशहाली के मौलिक तत्व कमजोर और खोखले होते चले गए।
प्रकृति से अलगाव: सामूहिक से व्यक्तिवाद की ओर – सभ्यताओं के संपर्क में आने पर परिवर्तन होते हैं, किंतु आदिवासी समाज के मामले में यह परिवर्तन प्रतिकूल सिद्ध हुआ। जल, जंगल और ज़मीन को आदिवासी समाज कभी “संसाधन” नहीं मानता था। ये न तो किसी व्यक्ति के थे, न किसी परिवार के—ये सामूहिक, पूजनीय और जीवनदायी थे। इनके साथ अध्यात्म, परंपरा और सामाजिक उत्तरदायित्व जुड़ा था, जिससे संरक्षण और संतुलन सुनिश्चित होता था। बाहरी हस्तक्षेप के बाद इस संबंध की पूरी संरचना बदल दी गई। सामूहिक पूजनीय धरोहरें निजी संपत्तियों में बदली गईं। जिन भूभागों को आदिवासी समुदायों ने सदियों तक सहेज कर रखा, उन पर से उनका अधिकार समाप्त होता गया। नई-नई प्रशासनिक व्यवस्थाएँ थोपी गईं और आदिवासी समाज को मजबूर किया गया कि वह “मुख्यधारा” के अनुरूप स्वयं को ढाले। यह प्रक्रिया आज भी जारी है और यहीं यह प्रश्न उठता है कि ऐसे हालात में संप्रभुता का क्या अर्थ बचता है?
स्वास्थ्य, प्रशासन और शासित होने की प्रक्रिया – बाहरी हस्तक्षेप के साथ नई बीमारियाँ आईं। जब ये बीमारियाँ नहीं थीं, तब आधुनिक चिकित्सा की आवश्यकता भी नहीं थी। पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ और सामुदायिक उपचार पद्धतियाँ पर्याप्त थीं, महामारी जैसी स्थितियाँ नहीं थीं। इस संदर्भ में भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि आदिवासी समाज के लिए “संप्रभुता” का मूल्य कहाँ और कैसे समाप्त किया गया। इसी प्रकार प्रशासनिक व्यवस्था में भी आदिवासी समाज के पास अपनी पारंपरिक, स्वायत्त स्वशासन प्रणालियाँ थीं। उनमें विस्तारवाद नहीं था, सत्ता-संचय की लालसा नहीं थी। इसके विपरीत, बाहरी समाज ने मनुष्य और प्रकृति दोनों को संसाधन के रूप में देखा। इसी दृष्टि के तहत आदिवासियों को “जंगली” और “असभ्य” घोषित कर शासन-प्रशासन के नाम पर दमन, अन्याय और शोषण को वैध ठहराया गया।
“संप्रभुता पर संकट” मूल और उसके परिणाम – आदिवासी दृष्टिकोण से यह निष्कर्ष स्पष्ट है कि आदिवासी समाज की सबसे बड़ी चुनौती ऐतिहासिक रूप से बाहरी (गैर-आदिवासी) हस्तक्षेप रही है, जिसने आदिवासी संप्रभुता को निर्णायक रूप से कमजोर किया। तथाकथित उपचारात्मक उपायों और विकास योजनाओं ने भी इस संप्रभुता को पुनर्स्थापित करने के बजाय और क्षीण ही किया, क्योंकि उनमें आदिवासी गरिमा और दृष्टि का अभाव रहा। मुख्यधारा के पैमानों पर आदिवासियों को “विकसित” करने का निरंतर प्रयास, वस्तुतः आदिवासी समाज को विकास नहीं, विनाश की ओर ले जाने का मार्ग है। इसके परिणाम पिछली कुछपीढ़ियों से स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं I
आदिवासियों का शहरीकरण, अपनी अस्मिता पर शर्म, मुख्यधारा की नकल, पारंपरिक ज्ञान और कौशल को कमतर समझना, और अपनी ही विरासत से मानसिक दूरी। यही वह बिंदु है जहाँ संकट केवल बाहरी नहीं रह जाता बल्कियह आदिवासी समाज के भीतर भी गहराता चला जाता है।
मुख्यधारा की ओर झुकाव: आदिवासियों में आत्म-परित्याग और संप्रभुता का संकट – आज के आदिवासी समाज में एक गंभीर प्रवृत्ति यह उभर रही है कि जो आदिवासी बाहरी समाज या “मुख्यधारा” में उच्च पद, ओहदे, सम्मान या आय के पैमानों तक पहुँचते हैं, वे स्वतः ही उस समाज के तौर-तरीकों, कार्यशैली, विचारधाराओं और मान्यताओं को अपना आदर्श मानने लगते हैं। यह सिर्फ अनुसरण नहीं, बल्कि एक आत्मसात और आत्मसिद्धि की प्रक्रिया बन गई है। इस प्रक्रिया में आदिवासी समाज का मौलिक आधार धीरे-धीरे खोखले होते जाते है। आदिवासी जो “मुख्यधारा” में सफलता पाते हैं, उन्हें अपने समाज के मूल्य और विरासत से जुड़ाव कम होने लगते है। वे अपनी सफलता का श्रेय अक्सर अपनी मेहनत, कुशलता और माता-पिता या शिक्षकों तक सीमित मानते हैं, जबकि उनके लिए उपलब्ध सरकारी प्रावधान और समाजिक संरचना की भूमिका अनदेखी रह जाती है। यथार्थ यह है कि ये आदिवासी मुख्यधारा के सिद्धांतों और व्यवहारों अर्थात व्यक्तिवाद, लाभ की अभिलाषा, प्रभुत्व की इच्छा, प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ, आदि में पारंगत होकर ही वहां सफलता प्राप्त करते हैं। परिणामस्वरूप उनकी मौलिक आदिवासियत, सामूहिकता और पारंपरिक खुशहाली के मूल्य, धीरे-धीरे पीछे छूट जाते हैं।
सफलता का मिथक और सामाजिक दूरी – जो आदिवासी मुख्यधारा में ऊँचे पद या ओहदे प्राप्त करते हैं, वे अपने समाज से पृथक और श्रेष्ठ समझने लगते हैं। वे समाज के अन्य सदस्यों के लिए मार्गदर्शन या योगदान देने के बजाय उदासीनता और दूरी अपनाते हैं। अध्ययन बताते हैं कि यह केवल आदिवासी ही नहीं, बल्कि पिछड़े वर्गों के उच्च पदस्थ लोग अक्सर ऐसा करते हैं, वे अपनी सफलता में गर्व महसूस करते हैं और अपने ही समाज के लोगों को अपने स्तर के योग्य नहीं मानते। इस दृष्टिकोण का दूरगामी परिणाम यह है कि आदिवासी समाज की अगली पीढ़ियाँ भी “मुख्यधारा” की आदतों और मूल्यों को अपनाती हैं, अपनी पारंपरिक आदिवासियत से धीरे-धीरे कटती चली जाती हैं।
मुख्यधारा की सफलता और आदिवासी संप्रभुता का ह्रास – जिन आदिवासियों ने “मुख्यधारा” में ऊँचाई हासिल की, वे स्वयं अपने समाज की पारंपरिक प्रथाओं, संस्कृति, भाषा, कला, रीति-रिवाज और जीवनशैली को कमतर समझने लगते हैं। इसके विपरीत, वे बाहरी समाज की नीति-निर्णय, सोच, व्यवहार और कलात्मक मानदंडों को श्रेष्ठ मानते हैं। इस अनुसरण और आत्मसात से आदिवासी समाज की संप्रभुता संकट में पड़ती है। आदिवासी समुदाय न केवल बाहरी दबाव से प्रभावित होता है, बल्कि अपने ही भीतर के अनुकरण और स्वाभिमान ह्रास से भी अपनी पहचान और मौलिकता खोने लगता है। देखा जाये तोआदिवासियों के “मुख्यधारा” की ओर झुकाव और वहां सफलता पाने की प्रक्रिया, मौलिक आदिवासियत को कमजोर करती है और संप्रभुता पर सबसे प्रतिकूल असर डालती है।
आज आदिवासी समाज की सबसे बड़ी चुनौती उनकी संप्रभुता पर निरंतर बढ़ता संकट है। यह संकट दो कारकों के कारण गहरा रहा है:
- बाहरी हस्तक्षेप:
- संवैधानिक प्रावधान, कानून और विकास योजनाएँ आदिवासियों के लिए बनाई गई हैं, लेकिन उनका निर्माण, नीति-निर्धारण और क्रियान्वयन बाहरी गैर-आदिवासियों के नियंत्रण में है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संसाधन प्रबंधन, बुनियादी ढांचे जैसे सभी क्षेत्रों में आदिवासी समाज को निर्णयात्मक पदों तक पहुँचने से रोका गया है, जिससे संसाधनों और नीति निर्माण में उनकी भागीदारी नगण्य रही।
- बाहरी अधिकारियों और संस्थाओं की समझ आदिवासी जीवन, संस्कृति, रीति-रिवाज, पारंपरिक ज्ञान और जरूरतों से अक्सर असंगत रही, जिसके कारण योजनाओं का प्रभाव सीमित या अनुचित रहा।
- आंतरिक कमजोरी और नासमझी:
- आदिवासी समाज ने संगठित रूप से अपनी आवाज़, स्वशासन और सामूहिकता बनाए रखने में विफलता दिखाई।
- व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ, व्यक्तिवाद और मुख्यधारा की सफलता की लालसा ने समुदाय की सामूहिक ताकत को कमजोर किया।
- मुख्यधारा में सफलता पाने वाले आदिवासी, अपने समुदाय के प्रति उदासीन या स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हैं, जिससे सामूहिक संप्रभुता और आत्म-सम्मान पर असर पड़ता है।
इन दोनों कारकों ने मिलकर आदिवासी समाज की संप्रभुता को लगातार खतरे में डाल दिया है, और यह संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है।
आवश्यक कदम –
- बाहरी हस्तक्षेप की जिम्मेदारी स्वीकार करना:
- सरकार, प्रशासन, निजी संस्थाएँ, गैर-सरकारी संगठन और सभी बाहरी एजेंसियों को यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने आदिवासी समाज की अस्मिता और संप्रभुता का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा।
- ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा जाना चाहिए, ताकि न्याय की प्रक्रिया शुरू हो सके।
- बराबरी और सम्मान पर आधारित दृष्टिकोण:
- आदिवासियों को अपने से कमतर न समझें।
- उनकी क्षमता, कौशल, अनुभव और ज्ञान को मुख्यधारा के बराबर सम्मान दें।
- नीति निर्माण, निर्णय और प्राधिकृत पदों में आदिवासियों को अधिकतम प्रतिनिधित्व प्रदान करें।
- सामुदायिक सहभागिता और स्वशासन:
- आदिवासी अगुआ, युवाओं, ग्राम सभाओं, पारंपरिक स्वशासन इकाइयों और शिक्षित वर्ग को एकजुट होकर समाज के हित में कार्य करना होगा।
- समुदाय में संवाद, चर्चा और बैठक आयोजित करके नीतियाँ और योजनाएँ बनाना, उनका मूल्यांकन करना और समीक्षा करना आवश्यक है।
- संवैधानिक प्रावधानों का अधिकतम उपयोग कर स्वशासन और स्थानीय नियंत्रण सुनिश्चित करना होगा।
- मौलिक आदिवासियत और खुशहाली की पुनर्स्थापना:
- पारंपरिक रीति-रिवाज, संस्कृति, कला, भाषा, पर्व-त्यौहार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ध्यान दें।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के कार्यक्रमों में आदिवासी जीवनशैली, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता दें।
- यह सुनिश्चित करें कि आदिवासी समाज की खुशहाली, स्वायत्तता और सांस्कृतिक पहचान फिर से मजबूत हो।
निष्कर्ष – आदिवासी समाज की संप्रभुता पर संकट अब केवल बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम नहीं है, बल्कि आंतरिक कमजोरी, अनुशासन की कमी और व्यक्तिगत स्वार्थ ने इसे और गहरा किया है।
- इसे पूरी तरह समाप्त करना शायद असंभव हो, लेकिन सुधार और संरक्षण संभव है।
- इसके लिए बराबरी, भागीदारी, स्वशासन और पारंपरिक मूल्यों की पुनःस्थापना अनिवार्य हैं।
- आदिवासी अगुआ और समाज के सभी वर्गों को सामूहिक चेतना और सक्रिय नेतृत्व के माध्यम से इस संकट को कम करने और अपने अपने समाज की खुशहाली लौटाने का प्रयास करना होगा।

