श्रुतिका साह:
मैं रचूंगी तुम्हारे लिए
इस शताब्दी की सबसे विवादित नज़्म,
जिसकी शुरुआती पंक्तियों में ज़िक्र होगा
उस दीये का
जो
मैं तुम्हारे अंतस की देहरी पर प्रज्वलित कर बैठी रही,
जिसकी लौ के लिए कपास एकत्र करने की हठ में, मैंने छान डाले दुर्गम वन;
और अंततः कपास न मिलने पर
उस दिए पर मैंने रखा
अपनी दुधिया धोती के आंचल का
एक चिथड़ा बाहर की ओर से,
जानते हो क्यों?
क्योंकि तुम्हारे अंतस का द्वार खुलता है
भीतर की ओर ।।१।।
उस नज़्म में अभिव्यक्ति होगी,
उस पायदान की, जो तुम्हारे हृदय के सोपान पर कैनवास सा पड़ा है, आज भी;
जिस पर तुमने कुछ भौगोलिक मानचित्र बनाए हैं,
शायद उस क्षण तुम्हारी चौखट पर किसी ने यकायक दस्तक दी होगी,
और तुमने उतावलेपन में राष्ट्रीय राजमार्गों की चौड़ाई कुछ कम कर दी,
मैंने चाहा कि तुम्हारे समक्ष
मार्ग के सटीक मापदंड का
समीकरण आश्वस्त किया जाए,
परंतु मैनें खुद को सांत्वना दी
शायद तुम इन सड़कों से रत्ती भर जमीन बचाकर प्रेमियों के लिए कोई राजधानी बना रहे हो ।।२।।
उस नज़्म की मध्यस्तरीय पंक्तियां संबोधित करेंगी,
मेरा अधनंगे पैर लिए उस सोपानी देहरी को पार कर तुम्हारे हृदय के पंडाल में प्रवेश करने का अल्पक्षण,
वो नज़्म यकीनन समावेशित करेगी,
उस पंडाल के एक गोशे पर बैठ तुम्हारे शिशिर के आगे सूरज को झुकता देख मेरे रोम रोम के मधुमास हो जाने को।।३।।
उस नज़्म की अंतिम पंक्तियों में ज़िक्र होगा तुम्हारी कुंदन सी देह का,
नहीं… नहीं बिल्कुल नहीं….
तुम असहज मत होना,
क्योंकि प्रेम मेरे लिए कभी भी देह की देहरी लाँघना नहीं है,
पर हां, मैं तुम्हारे गले पर फूलती नील वर्णी नशों को किसी टूटते तारे की उपमा जरूर देना चाहूंगी,
मैं तुम्हारी मलयज सी उंगलियों के बीच ठहरे तिल को इस आकाशगंगा में सुदूर घूमते किसी उल्का पिंड के समकक्ष जरूर कहना चाहूंगी,
मैं तुलना करना चाहूंगी तुम्हारी निश्छल आंखों की इस सृष्टि में अस्तित्व रखते उस भोर के तारे से,
मेरे लिए देह सिर्फ टूटता तारा, उल्का पिंड और उफ्फ तुम्हारी ये आंखें हैं,
ख़ैर
इन सभी के चुम्बन का साक्ष्य बनते मैं सृजन करूंगी एक कविता का!!
जानते हो क्यों?
क्योंकि
मैं औरत हूं,
मेरे लिए प्रेम के माने प्रसवपीड़ा और सृजन जैसें हैं,
यकीनन मैं सृजन करूंगी तुम्हारे लिए इस शताब्दी की सबसे विवादित नज़्म का!!

