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“बुआई (वेरनी) की बात आदिवासी क़बीलाई ख़ास” 

अंतर निगवाले :

बरखा आई धरती हँसी,
घनघोर घटा गगन में बसी।
ढोल मांदल बजे गाँव में,
धरा में खेती किसानी हवाएं चली
हरिया उम्मीदें छाई मन में।

खेतों में फिर हल चलने लगे,
बैलों के साथ गीत बहने लगे।
माँटी की खुशबू छूती तन को,
बीजों की आशा छूती मन को।

कंधे पर बोरा, हाथों में बीज,
सपनों की खेती, हर दिन का गीत।
बूढ़े, जवान, नारी-बाल,
सब मिलकर रचते मेहनत का जाल।

पगडंडियाँ बोलें, “फिर लौटा सावन”,
धरती को चूमे किसान का पावन।
सात भुजाओं की लय में जीवन,
बुआई है पूजा, कर्म है निर्धारण।

हर एक बीज का सपना किसान का सपना हो साकार,
हर कण एक कथा हर एक बूंद की आशा
संग चिड़ियों के गूँजे प्रीति की भाषा।
आदिवासी जन में उत्सव की रीत,
बुआई बन जाए जीवन की जीत।

Author

  • अंतरसिंग, मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से एम.टेक. किया है। वर्तमान में वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की जनजातीय अध्ययनशाला में अध्ययनरत हैं।

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