समिक्षा :
मैं पिछले 17 सालों से सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ता के रूप में जुड़ी हुई हूँ। गोसीखुर्द बाँध प्रभावित विस्थापितों के संघर्ष ने और कष्टकरी जन आंदोलन ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। हम पिछले 17 सालों से नागपुर व आसपास के ज़िलों में जल, जंगल, ज़मीन, महिलाओं के सवाल और संवैधानिक अधिकार लोगों तक पहुँचने का काम कर रहे हैं।
हम जिस समुदाय के साथ काम करते हैं, उन गाँव में कोई ना कोई तो मिल ही जाता था जो हमारी बातें अच्छे से सुनकर अपने लोगों तक वो जानकारी पहुँचाने का काम करते थे। हमारे काम का उद्देश ही है कि लोग अपनी संवैधानिक अधिकारों को समझकर अपने हक के लिए लड़ना सीखें।
लेकिन पिछले 5-6 सालों से समाज की अलग शकल बन गई है! शासकीय योजनाओं ने लोगों में स्पर्धा लगाई हुई है। जिस तरह लोगों को पैसा मिलने वाली योजनाएं आई हैं, हर गाँव में दलाल बन गए हैं। बांधकाम मज़दूरों को मदद देने वाली योजना में 500 से लेकर 3,000 तक की दलाली हर महिला से ले रहे हैं। एकल महीलाओं को मिलने वाली विधवा पेंशन योजना के लिए तो, जैसे ही पति मर जाता है, दलाल तुरंत पहुँच जाते हैं महिला के घर, उसे योजना दिलाने के लिए। घर में किसी की अपघाती मृत्यु हो जाए तो लोग पूछते हैं कि किसी से चौदावी के लिए मदद मिलेगी क्या ! जन्मदिन मनाने के लिए राजनैतिक लोग पहुँच जाते हैं। यह सब आजकल लोगों को बड़ा अच्छा लगने लगा है। आज भी लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार के सवाल वही हैं। उसमें सुधार लाने की बातें कोई नहीं करता। रोजगार के लिए कोई लड़ने के लिए तैयार नहीं होता।
जिस भारतीय संविधान ने लोगों को सम्मान सहित जीने का अधिकार दिया है, वो इन पैसों की योजनों में सबसे ज़्यादा लाचार बन चुके है। हर कोई योजनाओं के पीछे दौड़ रहा है। इन पैसों वाली योजनाओं व इन दलालों ने प्रशासकीय व्यवस्था में पैसों के बिना कुछ नहीं होता यह बाते लोगों के दिमाग में पैदा कर दी है। ऑनलाइन की वजह से जो लूट हो रही है वो एक अलग है। आज संविधान बचाने की बातें समाज में ज़ोरों-शोरों से चल रही हैं…लेकिन फिर भी लोग दलालों को पैसे देकर योजना का लाभ उठाते हैं। संविधान तभी बच सकता जब दलालों का धंदा बंद करके सर्वसामान्य और ज़रुरतमंद लोगों को योजना का लाभ मिल सकेगा।

