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रेजा – एक कविता

सलोमी एक्का:

मुर्गे की बांग सुनकर
भोरे उठकर सबके लिए
भोजन पकाती।
झटपट-झटपट घर का काम निपटाती,
साग-भात टिफिन में भरकर
निकलती काम की तलाश में,
क्योंकि मैं एक रेजा हूँ।
आस लगाए बैठकर ताकती
टुकूर-टुकूर कि कुछ काम मिलें।
उतार-चढाव मोल-भाव
कभी तीन सौ तो कभी चार सौ
और कभी वैरंग वापस।
क्योंकि मैं एक रेजा हूँ
माथे में ढोकर ईंट, बालू, पत्थर
बनाती बड़े-बड़े महल।
खपडेल का घर अपना
चिलचिलाती गर्मी-‌बरसात
माथे पर रहती जिम्मेदारी
घूंट-घ़ूंट कर आँसू पीती हूँ
दर्द मेरा समझे ना कोई।
छल-कपट नहीं मुझ में
मुश्किलों से लड़कर
चलाती घर अपना।
क्योंकि मैं एक रेजा हूँ
नहीं करती किसी से गेजा।

Author

  • रांची झारखंड से आने वाली सलोमी, केंद्रीय जन संघर्ष समिति के साथ मिलकर स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर काम कर रही हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं।

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