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नगेसिया समुदाय का खाद्य इतिहास

कोर्दूला कुजूर:

नगेसिया समुदाय का मुख्य बसाहट अधिकतर पहाड़ों के ऊपर याने पठारी भाग में है। भौगोलिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मैदानी भाग की अपेक्षा पठार में ठंड अधिक रहता है, ग‌र्मी बहुत कम होती है। ज़मीन के नीचे अत्यधिक बॉक्साइट होने के कारण बारिश के बाद जमीन तुरन्त सूख जाता है। कहा जाता है कि जहाँ अधिक बॉक्साइट होता है वहाँ बॉक्साइट पानी को स्पंज की तरह सोख लेता है और पानी को स्टोर करके रखता है।

लाल मिट्टी होने के कारण वहाँ मकई और गोंदली की खेती अत्याधिक होती है। कहा जाता है कि पहले समय में उनका मुख्य आहार मकई और गोंदली का भात (भोजन) ही हुआ करता था। ये दोनों फसल के साथ-साथ कुछ मड़ुवा और गोड़ा धान भी लगाते थे। खुरसा बीज को महुआ के साथ खाने के लिए लगाया जाता था। साथ ही  तेल के लिए सरसों और जटंगी (सरगुजा) भी लगाते थे।

समय के साथ धीरे-धीरे उनके खेती में बदलाव आने लगा। वे मिश्रित खेती करने लगे। मक्का के साथ अरहर, सरसों के साथ छोटा मटर, उरद और कुरथी जैसे दलहन की खेती भी करने लगे। इससे उन्हें आसानी से दाल और तेल भी मिलने लगा, बाजार से निर्भरता कम होने लगी। 

छोटे और मोटे अनाज के साथ वे वन आधारित भोजन भी इक्कठा करते थे। उनके मुख्य आहार मक्के और गोंदली का भात (भोजन), जंगल के कंद-मूल, जिसमें गेठी, नकवा, पिठारू, और डुरू हुआ करता था। इसमें अत्यधिक पौष्टिकता होने के कारण उनके शरीर भी अत्यधिक हिष्ट पुष्ट और गठीले होते थे।

2006 के लगभग पठार में हाई‌ब्रिड बीज के आने से लोगों के खान-पान और रहन-सहन में बदलाव आया। बज़ार के साथ संबंध बढ़ा और उस पर निर्भरता भी। बाज़ार से संबंध होने से उनके खान-पान में भी बदलाव आया। सरकारी राशन मिलने से लोग चावल और गेहूं की रोटी भी खाने लगे। समय के साथ पठारी क्षेत्र में भी चिली, चौऊमीन और पानी पुरी भी अपने पाँव पसारने लगे। 

चिप्स और कुरकुरे ने तो अपना जगह बना ही लिया है। एक अच्छी बात है कि आदिवासी बहुल गाँव में इन सारी चीजों ने नहीं के बराबर जगह बनाया है। वहाँ के लोगों का प्रयास है कि बच्चों को इन सारी चीजों से दूर रखा जाए और अपना पारंपरिक भोजन, जो विभिन्न पौष्टिक तत्वों से भरपूर है इसकी ओर रुचि बढ़ाया जाए। अतः  मड़ुवा और गोंदली के विभिन्न उत्पाद बनाकर बच्चों को दिया जा रहा है। वहाँ के लोगों से पूछे जाने पर कि, आप लोगों का पसंदीदा भोजन क्या है? जवाब मिलता है कि जब तक हम लोग मकई और गोंदली भात नहीं खाएंगे तब तक खाना खाए हैं, ऐसा नहीं लगता है। यही कारण है कि अभी भी लोग वहाँ मक्के/गोंदली की भात और जंगल के कंद मूल और फल-फूल को भोजन के रूप में बड़े चाव (रूचि) से खाते हैं।

एक अध्ययन के क्रम में उनके भोजन इतिहास को हमने समझने की कोशिश की। महिलाओं ने पुराने समय के कई भोजन रेसिपी हमारे साथ साझा किए। उन भोज्य पदार्थों में जो पौष्टिक तत्व हैं वह चौंकाने वाले हैं-

1. मड़ुवा / महुआ लट्ठा:

प्रति सर्विंग 250 ग्राम पोषक तत्व:-

प्रोटीन = 16 ग्राम

कैल्सियम (Ca) = 726 मिली ग्राम

आइरन (Fe) = 19.8 मिली ग्राम

ज़िंक (Zn) = 10 मिली ग्राम

उर्जा = 641 किलो कैलोरी

2. महुआ लट्ठा:

प्रोटीन = 11 ग्राम

आइरन (Fe) = 37.5 मिली ग्राम

ज़िंक (Zn) = 17.7 मिली ग्राम 

कैल्सियम (Ca) = 350 मिली ग्राम

उर्जा = 312 किलो कैलोरी

3. महु‌आ/ मकई लट्ठा:

प्रोटीन = 18.4 ग्राम 

आइरन (Fe) = 16.2 मिली ग्राम

कैल्सियम (Ca) = 130 मिली ग्राम

ज़िंक (Zn) = 9.6

बीटा कैरोटीन = 322 माइक्रो ग्राम 

उर्जा = 312 किलो कैलोरी

4. महुआ + जटंगी लट्ठा:

प्रोटीन = 29.1 ग्राम

आइरन (Fe) = 42.3 मिली ग्राम

ज़िंक (Zn) = 15.1 मिली ग्राम 

कैल्सियम (Ca) = 890 मिली ग्राम 

बीटा कैरोटीन = 17.6 माइक्रो ग्राम 

उर्जा = 796 किलो कैलोरी

इसके अलावा भी विलुप्त होती कई आहार परंपराएँ उनके बीच आज भी मौजूद हैं, जो बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से उगाया और बनाया जाता है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह बहुत अधिक पौष्टिक और हेल्दी हैं। इस बदलते परिवेश में, जहाँ लोग विभिन्न प्रकार की जटिल बीमारियों से जूझ रहे हैं, नये-नये रोगों की चपेट में आ रहे हैं, ऐसे समय में यदि हम प्राकृतिक भोजन की ओर लौटते हैं तो कई जटिल बीमारियों से लड़ा जा सकता है।

Author

  • कोर्दुला कुजूर आदिवासी एक्टिविस्ट हैं और रांची, झारखंड में रहती हैं। महिलाओं और बच्चों के सवालों पर वह लंबे समय तक काम करते आ रही है और झारखंडी आदिवासी वुमेन्स एसोशियन शुरुआत करने में प्रमुख भूमिका निभाई हैं। साथ ही झारखंडी आदिवासियों के भाषा आंदोलन के सहभागी बनकर कुड़ुख भाषा को बचाए रखने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आयी हैं।

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