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प्यार जाति नहीं देखता – उरांव समुदाय की दीपा की कहानी

दीपा कच्छप:  

मैं दीपा, उरांव समुदाय की लड़की हूँ। आज से लगभग 5-6 साल पहले मैं रांची, झारखंड में एक माॅल में सिक्युरिटी गार्ड के रूप में काम करती थी। उसी माॅल में देवानंद भी एक दुकान में काम करता था। जब तक मेरी नज़र देवानंद से नहीं मिलती मैं बेचैन रहती, उनको देखने के बाद ही मन में सुकून होता था और देवानंद का हाल भी मेरे ही जैसा रहता था। मैं उस समय किराये का कमरा लेकर रहती थी, क्योंकि घर गाँव में था जो काफी दूर भी था। कभी-कभी मैं देवानंद के लिए भी कुछ टिफिन बनाकर ले जाती थी, लगभग एक माह होते-होते हम दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा था।

तब उसने एक दिन मौका पाकर बोला, “तुम हमसे शादी करोगी?” 

यह बात सुनकर तो मेरा दिल गदगद हो गया, बिना देर किए मैंने हामी भर दी। फिर हमने फटाफट दोनों तरफ के लिए दो गवाह जुगाड़ कर लिए, दोनों गवाह माॅल में ही हमारे साथ काम करते थे इसलिए वह भी जल्द ही तैयार हो गये। फिर हम चारों रांची झारखंड के पहाड़ी मंदिर गये और शादी कर ली। चार दिन के बाद देवानंद मुझे लेकर अपने घर, जसपुर, छत्तीसगढ़ गए। 

घर में मेरी सास- सुर और देवानंद की दीदी अपने बच्चों के साथ रहते थे। वहाँ हमारा विरोध तो किसी ने नहीं किया परंतु स्वागत भी नहीं हुआ। कुछ दिन ठीक-ठाक रहने के बाद घर के कामों को लेकर मेरी जेठानी से अनबन होने लगी। 

इधर तीन माह से परेशान मेरे माता-पिता को किसी तरह मालूम हुआ कि मैंने शादी कर ली है तो उन्होंने हमसे संपर्क किया और आने के लिए बोला। मैं अकेली बहन हूँ और मेरे दो भाई है। मेरे घरवालों ने देवानंद को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि चोरी-छुपे शादी करने से कोई नहीं मानता और लोग बातें करते रहते हैं। इसलिए हमारी फिर से सामाजिक रूप से जगरनाथपुर मंदिर में शादी किया गया। 

शादी के बाद हम दोनों मेरे माता-पिता के ही घर में रहने लगे और कभी-कभी जसपुर, छत्तीसगढ़ भी मिलने के लिए जाते रहते हैं। देवानंद घर में काम संभाल रहा है और मैं दो महीने पहले झारखंड के खूंटी जिला में नर्सिंग लाइन के 108 नम्बर हेल्प लाइन में ड्यूटी कर रही हूँ। छुट्टी मिलने पर घर मिलने चली जाती हूं। हम दोनों खुशी-खुशी एक दूसरे के साथ में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है।

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