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रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता दीन – दान

युवानिया डेस्क (री-पोस्ट):

रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित “दीन दान” एक सामयिक कविता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर “दीन दान” कविता के माध्यम से यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए स्वर्ण मंदिर बनाने से बेहतर है मनुष्य की सेवा करना। सत्य और शांति स्थापित करने के लिए स्वर्ण मंदिर बनाने की आवश्यकता नहीं है, प्राणियों के प्रति प्रेम, दया और लोगों के प्रति प्रेम की आवश्यकता है। बेघरों, वंचितों, उत्पीड़ितों की मदद करना ईश्वर को प्रसन्न करने का सबसे अच्छा तरीका है।

रवीन्द्रनाथ ने कविता में एक ऋषि का उल्लेख किया है। साधु ने आकर राजा से कहा कि 20 लाख स्वर्ण मुद्राओं से बने आपके मंदिर में कोई भगवान नहीं है। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए और ऋषि को नास्तिक कहा। राजा ने पूछा कि सोने से बना वह मंदिर खाली कैसे हो सकता है। संत ने उत्तर दिया कि मंदिर खाली नहीं है बल्कि तुम्हारे अहंकार से भरा हुआ है।

और याद दिलाया कि जिस वर्ष आपने 20 लाख स्वर्ण संपदा से मंदिर का निर्माण कराया था, उसी समय आपके लोग आपके दरवाजे पर आए और मदद के लिए हाथ फैलाए लेकिन उन्हें असफलता के साथ लौटना पड़ा।

ऋषि ने यह भी कहा कि भगवान और राजा इस कृत्य से आश्चर्यचकित थे कि जो राजा अपनी प्रजा को आश्रय देने में असमर्थ है वह मेरे लिए रत्नों से घर कैसे बनवा रहा है। और उस दिन परमेश्वर ने तेरे मन्दिर से निकलकर बेघर, उत्पीड़ित लोगों में शरण ली। इसलिये तुम्हारा मन्दिर केवल सोने और तुम्हारे अभिमान से भरा हुआ है।

कविता का हिंदी अनुवाद :-

(कवि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा, मंदिर निर्माण के संबंध में १२०वर्ष पहले लिखी गई कविता का अंग्रेजी से हिंदी में भावानुवाद):

मंदिर में कोई भगवान नहीं है, सन्त ने कहा,
राजा गुस्से से लाल हो गया-
भगवान नहीं है,क्या आप नास्तिकों की तरह नहीं बोल रहे हैं?
बेशकीमती हीरे,मणि, माणिक्यों से जुड़े तख्त से भगवान की स्वर्ण मूर्ति
प्रकाश बिखेर रही है और आप कहते हो,
मंदिर खाली है।
सन्त ने उत्तर दिया,
यह खाली नहीं है,बल्कि राजा के घमंड से भरा हुआ है,
तुमने इस मंदिर में खुद को स्थापित किया है,
इस विश्व के भगवान को नहीं।
राजा क्रोध से तिलमिलाते हुए बोला,
इस गगनचुंबी इमारत पर २० लाख स्वर्ण मुद्राओं की बारिश की गई,
मैंने तमाम आवश्यक धार्मिक अनुष्ठानों के बाद,
इसे भगवान के चरणों में अर्पित किया,
ऐ संत,फिर भी, मंदिर में भगवान नहीं होने की बात,
कहने का दुस्साहस कर रहे हो!
संत ने शान्त भाव से जवाब दिया।
इसी वर्ष जब २करोड़ रियाया,
अकाल की भयंकरता के आगोश में कराह रही थी-
दीन हीन आश्रय विहीन , भूख की मार झेलते लोग,
जब तुम्हारे सामने भीख के लिए हाथ फैला रहे थे,
तुमने उन्हें दुत्कार कर भगा दिया।
वे जंगलों,कन्दराओं,जर्जर मंदिरों,
पथो के किनारे,छायादार वृक्षों तले,
रहने को मजबूर हुए
और उसी वर्ष तुमने,२० लाख स्वर्ण मुद्राएं ख़र्च कर,
मंदिर का निर्माण किया।
वहीं दिन था,जिस दिन भगवान ने घोषणा किया,
मेरी शाश्वत दुनियां, विस्तृत आकाश में, लगातार जलते
दियों से प्रकाशमान है।
मेरे घर की नींव, मानवीय मूल्यों,सत्य, शांति, सहानुभूति और प्रेम की बुनियाद पर खड़ी है।
ग़रीबी की मार से ग्रस्त एक घमंडी कंजूस,
जो अपनी रियाया को आश्रय नहीं दे सकता है,
वह मुझे आवास देने की कल्पना भी ,
कैसे कर सकता है।
इसी दिन भगवान ने तुम्हारी मंदिर छोड़ दी,
वे उन मजलूमों, गरीबों से जा मिले,
जो सड़क किनारे,बृक्षों के सारे तले,
आश्रय लिये हुए थे।
विशाल समुद्र की उठने वाली फेनिल लहरों, में जो खालीपन है,
तुम्हारा भी यह मामूली मंदिर,उसी तरह खाली है।
यह सिर्फ़ घमंड और सम्पत्ति का बुलबुला है।
क्रोध से झाग उगलते हुए राजा ने कहा,
ऐ दुष्ट संत,तत्काल तुम मेरी राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ।
संत ने मनमोहक शांति से जवाब दिया।
तुमने जिस स्थान से भगवान को निर्वाशित किया है,
उनके भक्तों को भी वही निर्वाशित कर दो।
( ये मूल बंगला कविता की एक हिस्सा अंग्रेजी अनुवाद से हिन्दी भावानुवाद ।)

अरुण कुमार मिश्रा

फीचर्ड फोटो आभार: हिंदुस्तान टाइम्स

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