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मैं एक सैनिक हूँ, मैं प्यार की बात कर रहा हूँ – कविता

मानस भारद्वाज:

अब जब जंग का वक़्त चल रहा है
मैं प्यार की बात कर रहा हूँ
मैं एक सैनिक हूँ…
जब कोई गोली मेरे कान के पास से जाती है
मुझे तुम्हारे बालों की लटें याद आती हैं

जब जब मैं मरते मरते बचता हूँ
मुझे लगता है मैं अपने आँगन में खेल रहा हूँ
अभी अभी पेड़ की डाली से गिरा हूँ
अरे हाथ में अमरुद है ..
बन्दूक न जाने कैसे मेरे हाथों में
गुलेल बन जाती है

जब जब मैं किसी दुश्मन को मारता हूँ
मुझे मेरा बच्चे याद आते है
रात भर सो नहीं पाता
अगर दुश्मन ने मुझे मारा होता तो
मेरा बच्चा शायद
मेरा मरा मुँह देख के रो नहीं पाता
मैंने न जाने किस बच्चे से उसका बचपन छीन लिया है
लोग कहते हैं मैंने फिर एक दुश्मन छीन लिया है

मुझे अपनी छाती पे लटके पदकों के नीचे
धड़कता दिल महसूस होता है
जब अँधेरी रातों में दिल की धड़कन बढ़ जाती है
तब रम के नशे में मुझे
old monk (ओल्ड मौंक) की बोतल कभी कभी
बुद्ध की तरह नज़र आती है
और मैं कहना चाहता हूँ
शराब प्यार बढ़ाती है
प्रेम शान्ति के लिए ज़रूरी है
मैंने नशे में बुद्ध को जाना है
और होश में आकर
बन्दूक को थामा है
काश मैं हर वक़्त नशे में रहता
काश ये दुनिया नशे में रहती
होश में तो सबने अपना बुरा किया है

अब जब जंग का वक्त चल रहा है
तो बताना चाहता हूँ जंग बिलकुल वैसी नहीं होती
जैसी अखबारों और टीवी में नज़र आती है
मैं जो बचपन में मास्टरजी की छड़ी से डरता था
अब न जाने कितने बच्चों से बचपन छीन रहा हूँ

जंग में कुछ भी साहसपूर्ण नहीं होता है
सब कुछ glamourised किया हुआ है
भला बताओ कई किलोमीटर दूर से किसी को मार देने में
कैसा साहस ?
हम जिसको मारते हैं … उसके बारे में कुछ नहीं जानते
वो जब हमको मारते हैं
हमारे बारे में कुछ नहीं जानते

हम जब लड़ रहे होते हैं
तो हमें पता होता है
गाँव में कर्ज बढ़ रहा है
पिता की उम्र बढ़ रही है
माँ की कमजोरी बढ़ रही है
छोटा भाई हो सकता है
आवारा निकल जाए
बहन की शादी में
पैसा कम पड़ जाए
बेटे की परीक्षा में नम्बर कम तो नहीं आये
बेटी ने कहा था पापा गुडिया क्यों नहीं लाये
बीवी की साड़ियाँ पुरानी हो गई हैं
और छत भी अबकी ज्यादा टपक रही है

ये गोली जिसपे मेरा नाम लिखा है
इसका लोहा किसी बूढ़े की
लाठी में भी लग सकता था
और इसके बारूद से हो सकता है
मेरा बच्चा आतिशबाजी कर सकता था
ये बारूद और ये लोहा मेरे दुश्मन के पास
कहाँ से आया है
आखिर उसे और मुझे
बन्दूक पकड़ के यहाँ तक आने का रास्ता
किसने और क्यों बताया है ?

फीचर्ड फोटो आभार: scroll.in

Author

  • मानस भारद्वाज का 30 जुलाई 1986 को मध्यप्रदेश के खंडवा ज़िले में जन्म हुआ। उनके पिताजी सरकारी नौकरी में थे इस कारण हर दो साल में एक नए शहर उनका ठिकाना रहा। मानस, 2001 से कविता लेखन में सक्रिय हैं। वे 2008 से रंगमंच से जुड़े हैं। कविताओं का नाट्य प्रदर्शन 2008 से हो रहा है। वर्तमान में मानस भोपाल में रहते हैं।

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