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जब रंग सच बोलते हैं – एक कविता 

दिव्यांशी:

अगर मैं तुमसे पूछूँ कि तुम्हारा पसंदीदा रंग क्या है,
तो तुम शायद यह बता भी दो कि तुम्हारा सबसे प्रिय रंग कौन सा है।।
लेकिन क्या तुम जानते हो – जिन रंगों में तुम अपना हुस्न ढूँढ़ते हो,
वे रंग अगर कुछ कह पाते, तो तुम्हें क्या कहते?

सुनो – आखिर तुम होते कौन हो हमारा चयन करने वाले?
क्या तुम्हें यह एहसास है कि जिन रंगों में तुम सुकून तलाशते हो,
वे सब रंग धुंधले हो जाएंगे – जब तुम इस दुनिया से रुख़्सत हो जाओगे।।

मृत्यु के उतने क़रीब होगे कि तुम्हें केवल तीन रंग ही अपने लगेंगे।।
पहला – वह काला रंग, जो तुम्हारी आँखों में समा जाएगा,
जब तुम अपना शरीर त्याग दोगे।।

दूसरा – वह सुर्ख़ रंग, जिसमें तुम लिपटे हुए नज़र आओगे,
जिसे देखकर तुम्हारे अपने रोते हुए तुम्हें आख़िरी बार देख रहे होंगे।।

तीसरा – वह सफ़ेद रंग, जिसमें तुम किसी को दिखाई नहीं दोगे,
तुम्हारी आत्मा का रंग, जो सफ़ेद चादर ओढ़े,
तुम्हें तुम्हारे शरीर से विच्छिन्न होता दिखाएगा।।

तब क्या तुम कहोगे कि तुम्हारे पसंदीदा रंग काला, सुर्ख़ और सफ़ेद हैं?

Author

  • दिव्यांशी, उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के एक छोटे से गाँव चौखुटिया से हैं और वर्तमान में कक्षा 10 की छात्रा हैं। पहाड़ों के शांत सौंदर्य और प्रकृति के सूक्ष्म रंगों से प्रेरित होकर वे अपने लेखन में गहराई, भावनाओं और दार्शनिक दृष्टि का सुंदर मेल रचती हैं।

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