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दामोदर दा को अंतिम जोहार

युवानिया डेस्क:

जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज, संस्कृति और अपनी भाषा के संरक्षण को समर्पित कर दिया – दामोदर सिंह हांसदा जी, झारखण्ड के सरायकेला खरसावां के कोटवाल साई गाँव के रहने वाले थे। उनकी असमय और दुखद मृत्यु ने पूरे समाज को गहरे शोक में डाल दिया है।

दामोदर सिंह हांसदा जी केवल एक व्यक्ति नहीं थे – वे एक विचार थे, एक आंदोलन थे, और एक प्रेरणा थे। उन्होंने कोल्हान क्षेत्र के हो आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और पहचान को बचाने और सशक्त बनाने का जो बीड़ा उठाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन गया।

सन 2005 में उन्होंने हो आदिवासी महासभा की स्थापना की – एक ऐसा मंच जिसने हो समाज को एक नई दिशा दी। उनके नेतृत्व में अनेक क्षेत्रीय अभियान चलाए गए, जिनका उद्देश्य था – हमारी हो भाषा और वारंग लिपि को सम्मान और पहचान दिलाना।

उनकी अटूट मेहनत, निस्वार्थ भावना और संघर्ष ने समाज में आत्मगौरव की एक नई चेतना जगाई। उनकी सरलता, मज़बूत व्यक्तित्व, और हमेशा लोगों की मदद करने के लिए तत्पर रहने की भावना से सबलोग परिचित थे।        

दामोदर जी भलीभांति जानते थे कि किसी भी समाज का भविष्य उसके युवाओं में निहित होता है। इसलिए उन्होंने हो आदिवासी युवा समाज की स्थापना की, ताकि नवयुवक अपने समाज की भाषा, संस्कृति और इतिहास को जानें, समझें और आगे बढ़ाएँ।

सन 2005 से 2008 के बीच, उन्होंने युवाओं के साथ मिलकर चक्रधरपुर और कोचाई प्रखंडों के लगभग 100 गाँवों में अभियान चलाया – यह प्रयास केवल भाषा का प्रचार नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान और एकता की पुकार थी।

उनका सपना था कि हो भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिले, और इसे औपचारिक शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाए। उन्होंने इसके लिए लगातार संघर्ष किया, दस्तक दी, आवाज उठाई – क्योंकि वे मानते थे कि अपनी भाषा में शिक्षा ही सच्ची स्वतंत्रता है।

वे इंस्टिट्यूट ऑफ एंशिएंट कल्चर एंड साइंस (आदि संस्कृति एवं विकास संस्था), सरायकेला खरसावां से जुड़े हुए थे, जहाँ वे अपने ज्ञान, अनुभव और समर्पण से नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहे थे। भाषा आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए पिछले झारखण्ड चुनाव में लोकसभा प्रत्याशी के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र से चुनाव भी लड़ा। 

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो लगता है जैसे समाज का एक मजबूत स्तंभ गिर गया हो। पर सच यह है कि दामोदर हांसदा जी जैसे लोग कभी जाते नहीं – वे अपनी सोच, अपने कार्यों और अपने सपनों के रूप में हमेशा हमारे बीच जीवित रहते हैं। हम उन्हें सभी श्रुति साथी और उनके सामाजिक परिवर्तन शाळा के साथियों के तरफ से अंतिम सलाम करते हैं।

उनकी हर स्मृति, हर विचार, हर प्रयास हमें याद दिलाता रहेगा कि भाषा और संस्कृति हमारी आत्मा है – और उसे जीवित रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को इस गहरे दुःख को सहने की शक्ति मिले।

उनकी प्रेरणा से हम सब मिलकर उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाएँगे – ताकि आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकें कि हम दामोदर सिंह हांसदा जी की विरासत के वाहक हैं।

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