मनीषा शहारे :
महुआ के पेड़ को आप सभी लोग जानते ही होंगे। यह ग्रामीण क्षेत्रों, जंगलों और खेतों में आसानी से दिखाई देता है। हालांकि शहरी इलाकों में यह अब बहुत कम दिखाई देता है या कहीं-कहीं बिल्कुल नहीं मिलता। महुआ के फूल मुख्य रूप से मार्च और अप्रैल के महीनों में गिरते हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग सुबह से दोपहर 12 बजे तक महुआ इकट्ठा करते हैं, फिर उसे घर लाकर सुखाते हैं। सूख जाने पर गाँव में महुआ खरीदी करने के लिए व्यापारी आते हैं, जिसको गाँव के सब लोग एकत्रित कर बेचते हैं। ये व्यापारी महुआ को 35 से 40 रुपये प्रति किलो के कम दामों में खरीदते हैं। लेकिन जून, जुलाई और अगस्त में इसका भाव बढ़ जाता है – जैसे अभी महुआ का दाम 70 रुपये प्रति किलो तक पहुँच चुका है।
अधिकतर लोगों को लगता है कि महुआ ज़्यादातर शराब बनाने के काम आता है। ये सभी को पता है, और ऐसा बोलते हैं। युवाओं को भी लगता है कि महुआ शराब के लिये ही है। लेकिन पुराने लोग आज भी महुआ को दाल में उबाल कर खाते हैं। अभी बचत कर से जुड़ी महिलाएं लड्डु बनाने का प्रयास कर रही हैं, पर मार्केट में उसे कोई खरीदता नहीं है। बहुत लोगों को लगता है कि महुआ के लड्डू खाने से नशा हो जाता है, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। ये सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। ग्रामीण क्षेत्र में कईं ऐसी महिलाएं हैं जो अपने बच्चे को महुआ लड्डू बनाके रोज़ाना खिलाती हैं।
इसी विषय पर चर्चा के दौरान महिलाओं की ट्रेनिंग कराने की बात सामने आई। फिर ‘आम्ही आमच्या आरोग्यासाठी’ संस्था से संपर्क कर महुआ पर आधारित उत्पाद बनाने के लिए, 40 महिलाओं के साथ तीन-दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने अपने घरों में महुआ के लड्डू बनाना शुरू किया और रोज़ाना खुद भी इसका सेवन करने लगीं।
मार्केट में इन लड्डुओं को बेचने पर ज़्यादातर लोग इसे खरीदते नहीं थे। लेकिन फिर इन लड्डुओं के सैंपल स्थानीय स्कूलों और आयुर्वेद पर काम करने वाली एक संस्था को भेजे गए। बच्चों को जब ये लड्डू चखाए गए, तो स्वाद सबको पसंद आया। इसके बाद धीरे-धीरे रुचि बढ़ने लगी।
धान की खेती के बाद जब महिलाओं के पास कोई खास काम नहीं रहता, तब यह महुआ उत्पाद बनाने का कार्य उनके लिए एक बेहतर विकल्प साबित हुआ। सैंपल भेजने के बाद एक संस्था से 300 किलो लड्डू का ऑर्डर मिला और काम शुरू कर दिया गया। शुरुआत में 10 महिलाओं को यह कार्य दिया गया और महुआ लड्डू बनाने का काम शुरू हुआ।
अब महिलाएं महुआ से लड्डू के अलावा चिक्की, चकली, चॉकलेट, पुरणपोळी और चिवड़ा भी बना रही हैं। बुजुर्गों से बात करने पर पता चला कि पहले के ज़माने में महुआ को भोजन का हिस्सा माना जाता था। वे बताते हैं कि पहले इमली के बीज निकालकर महुआ के साथ पकाकर खाते थे या दाल के साथ महुआ मिलाकर सेवन करते थे। उनका मानना है कि जब भोजन में महुआ शामिल था, तब बीमारियाँ कम थीं और शरीर में थकान कम महसूस होती थी। पर अब महुआ खाने में मिलता ही नहीं है, ऐसा बुज़ुर्ग बताते हैं। अब जब भी थकान महसूस होती है या व्यक्ति बीमार होता है, तो हम ये ही सलाह देते हैं कि हर रोज महुआ का 15 से 30 ग्राम का सेवन करना चाहिए चूँकि ये शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
महुआ के लड्डू बनाने का काम करते समय महिलाएँ सफाई के साथ काम करती हैं। लड्डू बनाने की प्रक्रिया में, सभी को उनके कौशल अनुसार अलग-अलग काम दिया जाता है, और सभी मिलकर काम करते हैं। वर्तमान में इस पहल से दस महिलाएं जुड़कर काम कर रही हैं। प्रयास है की आगे और महिलाओं को भी इसमें जोड़ा जाएगा।
महुआ लड्डू के फायदे:
- कमर और पीठ दर्द में राहत
- रक्त संचार में सुधार
- झनझनाहट व कमजोरी में लाभदायक
- मधुमेह और बवासीर जैसी समस्याओं में उपयोगी
महत्वपूर्ण टिप: महुआ लड्डू खाने के बाद कम से कम 30 मिनट तक पानी नहीं पीना चाहिए।
आयोजक- वनराई महीला उद्योग केन्द्र कन्हाळगाव

