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क्या टिटवड़ी फ़ेल हो गई इस बार?

अमित: 

इस साल टिटवड़ी नें चार अण्डे दिये थे। लोग खुश थें कि अच्छी बरसात होगी। पश्चिम भारत में आदिवासियों में टिटवड़ी के अण्डों से बारिश का अनुमान लगाया जाता है। जितने अण्डे दिये उतने महीने बारिश होगी ऐसा कहा जाता है। तो इस बार चार अण्डे दिये थे कई जगह पर तो लोगों नें कहा कि चार महीने बारिश होगी। मतलब बहुत अच्छी बारिश। दूसरी बात देखते हैं कि अण्डे कहाँ  दिये गये हैं। यदि नदी नाले के तल में दिये गये हैं मतलब कि अकाल पड़ेगा क्योंकि किसी तरह टिटवड़ी को पता चल जाता है कि इस साल नदी में पानी नहीं आने वाला है। यदि अण्डे उपर खेत में दिये गये हों तो इसका अर्थ लगाया जाता है कि बहुत अधिक बारिश होने वाली है इसी लिये टिटवड़ी ने ऊँचाई के स्थान को चुना जिससे अण्डे सुरक्षित रहें। टिटवड़ी के अण्डों से बारिश के मौसम का अनुमान लगाने की लोग परम्परा पश्चिम भारत में राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के इलाकों के गाँवों में प्रचलित है।

लेकिन इस साल, कम से कम सेंधवा से निवाली के बीच के गाँवों में तो टिटवड़ी के अण्डों नें धोखा दे दिया।

साकड़ में लगभग एक महीने से बारिश नहीं हुई है। बीच – बीच में रिमझिम रिमझिम हुई। लेकिन टिटवड़ी के पक्ष में यह है कि जून में शुरूआत की बारिश हो गई थी, हालाॅंकि बहुत कम हुई थी और देर से हुई थी। खेत से पानी बाहर नहीं निकला था फिर भी लोगों ने बो दिया था क्योंकि न बोते तो बहुत देर हो रही थी।

 एक महीने से, ढंग की बारिश न होने पर भी फ़सलें हरी हैं। जितनी बड़ी होनी चाहियें थीं उतनी नहीं हैं। इस समय तक तो भुट्टे लग जाते हैं, मूॅंग और चवले की फलियाँ आ जाती हैं। निंदाई और कुलपे कर के बैठे हैं लोेग। दोपहर में तेज़ धूप हो जाती है जिस दिन, उस दिन फ़सल मुरझा जाती है। शाम को और सुबह थोड़ी ठीक दिखती है। विदेशी मक्का लगाई है अघिकतर लोगों ने। उसे देख कर नहीं लगता कि बारिश नहीं हुई है इतने दिन से। शायद कुछ लोग ट्युबवेल से पानी दे रहे हैं। बहुत से के तो ट्यूबवेल भी सूखे हैं। इस समय लोग मोटर के पाइप आदि सब लपेट कर रख देते हैं। तीन फ़ेज़ लाइन भी कम ही जगह आती है। खुदरे में पानी भी नहीं है इस साल। कुओं और ट्यूबवेल मे भी पानी नहीं होगा भरपूर तो रबि में गेहूॅं की फ़सल पर भी असर पड़ेगा।

लोग चिंता में हैं लेकिन यह चिंता ऐसी है जिसके लिये वे कुछ कर नहीं सकते। सबकी बातों में यह बात आ ही गई है कि मौसम बदल रहा है। अब कुछ निश्चित नहीं है। बारिश न आने पर यहाँ के लोग अपनी परम्पराओं अनुसार कुछ टोटके करते हैं, बारिश बुलाने के लिये। हमारे क्षेत्र के बारेला, भील, भीलाले आदिवासी, ढूढी खेलते हैं। ढूढी में यह होता है कि गाँव के कुछ लोग और बच्चे एक टोली बनाकर पूरे गाँव में घर घर फिरते हैं। यह टोली बारिश के मौसम का नाटक करती है। कुछ लोग मेंढक की आवाज़ निकालते हैं कुछ कोयल या मोर की आवाज़ निकालते हैं। वे घर घर जाकर उनके मटकों से पानी निकाल कर घर पर डालते हैं। लोगों पर भी डालते हैं। कभी कभी गोदड़ी – गद्दे भी गीले कर देते हैं। ढूढी वो ढूढी, गीत गाते हुए यह टोली गाँव में घर घर घूमती है। इस नाटक के माध्यम से वे एक तरह से बादलों को बरसने की याद दिलाते हैं। शायद वह भूल गये हों कि उन्हे यहाँ बरसना है!!

एक और टोटका हमने आलीराजपुर ज़िले के छोटी गेन्द्रा गाँव में बहुत साल पहले देखा था। वहाँ बारिश न आने पर गाँव के प्रमुख लोगों को बापदेव के पास एक पेड़ से बांध दिया था। इनमें गाॅंव का पटेल था, पुजारा था और गाँव के एक दो बुज़ुर्ग लोग थे जिन्हे गाँव डाहला कहते थे। उन्हे खाने के लिये केवल दूध या दही दिया जाता था। ऐसा करके एक तरह से गाँव वाले बापदेव से कहते थे कि जब तक तुम बारिश नहीं गिरवाओग, हम इन मुखियाओं को  बांध कर रखेंगे। कहीं न कहीं यह मान्यता थी कि इन मुखियाओं का बापदेव से कुछ कनेक्शन होगा। उस बार तो एक डेढ़ दिन में बारिश आ गई थी और नाइका पटेल और उसके बुज़र्ग साथियों को खोल दिया गया था। बारिश नहीं आती और दो चार दिन तो पता नहीं लोग क्या करते।

इधर कई सालों से बारिश की अनिश्तिता बढ़ गई है। कई बार बोने के समय बारिश होती है, लोग बुवाई कर देते हैं लेकिन उगने के बाद बारिश बहुत दिनों तक नहीं आती और लोगों को दुबारा बोना पड़ता है। महंगे बीज बेकार हो जाते हैं। पिछले साल फ़सल की निंदाई के समय बारिश बंद ही नहीं हुई जिससे लोग फ़सलों की निराई गुड़ाई नहीं कर सके और खरपतवार अधिक हो गया और उत्पादन पर असर पड़ा। यह सब देख कर और इस समय मज़दूरों के अभाव में लोग खरपतवार नाशक दवा डालने लगे हैं जिनका खतरनाक असर न केवल खाने वालों पर पड़ता है, दवा छांटने वालों पर भी पड़ता है। बहुत जगह यह दवा बच्चे या महिलाएँ डालती हैं। एक साल यह हुआ था कि सोयाबीन लोगों ने काट दी थी लेकिन खेत में सूख रही थी और अचानक बहुत बारिश हो गई। आनन फ़ानन लोगों ने उठाई और ढेर लगाया। गीली फ़सल सड़ गई, कहीं दाना काला पड़ गया जिससे कीमत ठीक नहीं मिली। बारिश बुलाने के टोटके तो हैं लोगों के पास लेकिन असमय बारिश या अतिवर्षा को रोकने के टोटके नहीं सुने।

चलते फिरते कोई गाॅंव का बूढ़ा बूढ़ी कह देते हैं – दुनिया में पाप बढ़ रहा है, यह सब तो होना ही है।

पाँच सितारा होटलों में होने वाले सेमिनार और काॅन्फ़रेन्सों में तो यह बात बार बार बोली जाती है कि मौसम के इन बदलावों के होने के पीछे, कुछ लोगों की मुनाफ़े की भूख है जिसके कारण वे जंगलों, नदियों को तबाह करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। साथ ही आद्योगीकरण व शहरीकरण भी धरती के तापमान को बढ़ाने के लिये ज़िम्मेदार हैं यह भी बात होती है। लेकिन यह बात अभी इतनी अधिक नहीं फैली आम जन के बीच कि वे इसके लिये आवाज़ उठायें। उत्पादन प्रणाली को बड़े पैमाने पर बदलने के कोई प्रया नहीं दिखाई देते। सरकारें भी एक दूसरे को आरोप लगाने में लगी रहती हैं। पेड़ लगाना ही एक बात है जो सबको इस वृहद् समस्या के हल के रूप में समझ आता है क्योंकि यह सबसे आसान है। मज़े की बात यह है कि इस काम को भी काॅर्परेट्स को दे दिया है जो इसे अब किसानों की ज़मीन पर ही लगाने में लगे हैं। यह एक और बड़ा हथकण्डा बन जायेगा किसानों से ज़मीन हथियाने का। मौसम परिवर्तन को भी कार्बन क्रेडिट के नाम से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की वस्तु बना दिया गया है जिसमें वैश्विक पूँजी के बड़े बड़े खिलाड़ी उतर आये हैं। इसकी खास बात यह है कि किसी के गंदगी फैलाने पर रोक नहीं है। केवल यह है कि जितनी गंदगी फेलाई है उसके बदले पेड़ लगा दो या किसी ऐसे काम में पैसे डाल दो जिनसे ऐसा लगता है कि पर्यावरण की हानि नहीं होती या कम होती है। और यह भी ज़रूरी नहीं है कि जहाँ  गंदगी फैलाई है वहीं पेड़ लगाकर सफ़ाई करनी है। आप दुनिया के किसी भी कोने में पेड़ लगाकर अपना हिसाब बराबर कर सकते हैं।

मुनाफ़े के लिये काम करने वाले बड़े बड़े पूँजीपति कुछ भी सोच सकते हैं और अपने हित साधने के लिये सरकारों पर दबाव लाकर उनसे नियमों को तोड़ मरोड़ सकते हैं और हम गाँव में अभी टिटवड़ी के अण्डे ही गिनने में लगे हैं, स्वांग रच के सोच रहे हैं कि देवी देवताओं को मनाने में लगे हैं। क्या करेगी टिटवड़ी बेचारी और क्या करेगा बापदेव? इसके लिये तो पूरी उत्पादन प्रणाली को नये सिरे से सोचना होगा और इन्हे बदलने के लिये सरकारों को कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। मौसम परिवर्तन का सबसे बुरा असर किसानों, मज़दूरों और गरीब वर्ग के लोगों पर पड़ता है यह बात कार्यकर्ता भी पूरी तरह से नहीं समझते। और केवल इनसानों पर ही नहीं उस टिटवड़ी और उसके जैसे करोड़ों जीवों पर, वनस्पतियों पर जिनका जीवन मौसम के बहुत बारीक बदलावों से संचालित होता है। कहीं कहीं जहाँ लोगों की ज़मीन और जंगल इनके चलते छिन रहे हैं वहाँ उन्हे थोड़ा बहुत समझ आता है और वो लड़ रहे हैं। लेकिन यह मुद्दा इन लड़ाइयों से बहुत बड़ा है। उम्मीद है हमारे युवा साथी इस पर ध्यान देंगे।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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