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महिला मज़दूरों की अदृश्य मज़दूरियाँ

नम्रता मिश्रा :

इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के 103 साल पूरे हो रहे हैं। भारत में पहली बार यह दिवस 1 मई 1923 को चेन्नई (तब मद्रास) में कॉमरेड सिंगारवेलु चेट्टियार द्वारा मनाया गया था। दुनिया में यह पहली बार 1 मई 1890 को शिकागो के 1886 मज़दूर आंदोलन की स्मृति में मनाया गया था। तब से यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि श्रमिक वर्ग की ऐतिहासिक लड़ाई का प्रतीक बन गया—वह लड़ाई जिसमें इंसानों ने इंसानों की तरह जीने का अधिकार माँगा।

इन आंदोलनों ने सिखाया कि 8 घंटे का काम, न्यायपूर्ण वेतन, छुट्टियाँ, सुरक्षा और गरिमा कोई खैरात नहीं—ये इंसानी हक़ हैं। पर ये हक़ यूँ ही नहीं मिले। इस संघर्ष में गोलियाँ चलीं, बम फटे, लाठियाँ टूटीं, जानें गईं, और न जाने कितने घर उजड़ गए। पर क्या हमने इन आंदोलनों को समावेशी नज़रिए से देखने की कोशिश की है?

क्या हमारी मज़दूर की तस्वीर में महिलाएं हैं?

हमारे मन में जब ‘मज़दूर’ की छवि बनती है, तो उसमें एक पुरुष अधिक स्पष्ट रूप से उभरता है — पर क्या हमने कभी सोचा कि इन संघर्षों में महिलाएं भी थीं? और अगर थीं, तो क्या हमने उन्हें देखा? क्या हमारे ज़हन में मज़दूर की जो छवि बनती है, उसमें महिलाओं की जगह है? क्या हमने जाना कि कई नीतियाँ और नियम काग़ज़ पर आने से पहले महिलाओं के शरीरों पर गोदे गए?

महिलाएं, जो आजीवन—पुरुषों के साथ और अक्सर उनके बिना भी—घर में, खेतों में, फैक्ट्रियों में, सिलाई मशीन पर, दाई के रूप में, नाचते-गाते, थकान मिटाते, खाना पकाते और देखभाल के अनगिनत रूपों में श्रम करती रही हैं। ऐसा श्रम जिसका जितना उपयोग हुआ, उतना नाम नहीं। इस अदृश्य श्रम को अक्सर प्रेम, कर्तव्य, या नैतिक संस्कार कहकर उसकी आर्थिक और सामाजिक मान्यता छीन ली गई।

अदृश्य श्रम और जेंडर की दीवारें

जब हम श्रम को जेंडर के दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हमें वह भी देखना होता है जिसे ना दिखाया गया, ना मान्यता दी गई। Silvia Federici जैसे नारीवादी विचारकों ने लिखा है कि पितृसत्ता और पूंजीवाद ने मिलकर घरेलू श्रम को “प्राकृतिक” और “मुफ़्त” बना दिया — जिससे औरतें श्रमिक होते हुए भी मज़दूर नहीं मानी गईं।

इसीलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि महिलाओं के लिए मज़दूर आंदोलन केवल वेतन की नहीं, पहचान की भी लड़ाई है।

वे जोमर्दों वालेकाम करती हैं

The Swaddle द्वारा बनाए गए इंटरव्यू सीरीज़ वीडियो The Night Shift में चार महिलाओं की कहानियाँ हैं जो पितृसत्ता की लक्ष्मण रेखा को पार कर नाइट शिफ्ट की नौकरियाँ कर रही हैं— एक नाइट ड्राइवर, एक बार डांसर, एक होमगार्ड, और एक बाउंसर।

एक महिला बताती है कि भले ही वह अपने महिला होने को रुकावट नहीं मानती, पर उसकी कार्यस्थल पर उपस्थिति पुरुषों को असहज करती है। उनके लिए वह ‘मर्द नहीं है’ और यही एक बहाना बन जाता है कि वे उसे तंग करें, नीचा दिखाएँ या काम से निकालने की कोशिश करें।

ये कहानियाँ हमें दिखाती हैं कि जब महिलाएं ‘मर्दों वाले’ काम करती हैं, तो उन्हें मर्दों की तरह दिखने और बर्ताव करने का दबाव झेलना पड़ता है। जबकि पुरुषों को कभी अपनी पहचान बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

पब्लिक बनाम प्राइवेट: श्रम की असमान कीमतें

जब घर में महिलाएं खाना बनाती हैं, तो उसे ‘कर्तव्य’ कहा जाता है। पर जब होटल में पुरुष खाना बनाते हैं, तो उसे ‘काम’ कहा जाता है। यह पब्लिक और पर्सनल स्पेस के बीच का पितृसत्तात्मक फर्क ही श्रम की वैल्यू तय करता है।

यह फर्क इतना गहरा है कि 8 घंटे के काम, 8 घंटे के आराम और 8 घंटे के व्यक्तिगत समय का आदर्श, जो मज़दूर आंदोलनों ने गढ़ा था, वह भी जेंडर के आधार पर एकसमान नहीं लागू होता।
2019 में Statista के एक सर्वे के अनुसार, भारत में ग्रामीण आदिवासी महिलाओं को ग्रामीण आदिवासी पुरुषों के मुकाबले प्रतिदिन औसतन 22 मिनट कम अवकाश (leisure time) मिलता है। उनके पास आराम के लिए कम समय होता है क्योंकि उन्हें सामाजिक दबाव के कारण पुरुषों से पहले उठना पड़ता है और अधिक unpaid care work करना होता है।

औरतें दिन की शुरुआत जल्दी करती हैं, देर तक काम करती हैं, और फिर भी उन्हें “सहायिका” या “हाउसवाइफ” कहकर उनकी मेहनत को अनदेखा किया जाता है।

इसलिए केवल महिलाओं को घर के कामों में क़ैद कर के वेतन देना समाधान नहीं है। असली बदलाव तब आएगा जब समाज उन्हें उनके श्रम के लिए न सिर्फ पैसे, बल्कि इज़्ज़त और अपने जीवन के फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी भी देगा। यह कहना कि “हम तो उन्हें पैसे दे रहे हैं, हमारी मर्ज़ी!”—यह सोच श्रम को सौदेबाज़ी बना देती है, अधिकार नहीं।

सिर्फ मेहनत की गिनती नहीं, मेहनतकश की इज़्ज़त भी ज़रूरी है — और जब तक हम श्रम को लेकर अपनी सोच में लिंग-संवेदनशीलता नहीं लाएंगे, तब तक न तो महिलाओं को काम की बराबरी मिलेगी, और न ही समाज असली प्रगति कर पाएगा।

जब काम और घर दोनों पर अस्वीकार मिलें

काम करने वाली महिलाओं की कहानियाँ यह भी दिखाती हैं कि उन्हें अक्सर अपनी पहचान बदलनी पड़ती है—क्योंकि कार्यस्थल पर उन्हें ‘महिला’ रूप में स्वीकार नहीं किया जाता और घर में ‘मर्दाना औरतों’ के लिए जगह नहीं होती।

आज भी कई कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं, स्तनपान की सुविधा नहीं है, और अपनी स्त्रीत्व को छिपाए बिना काम करने की गुंजाइश नहीं है। शुक्र है नारीवादी आंदोलनों का, जिन्होंने लेडीज़ डिब्बा, ब्रेस्टफीडिंग ज़ोन जैसी सुविधाओं की मांग की। लेकिन फिर भी, बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाएं—चाहे वे टैक्सी ड्राइवर हों या घरेलू कामगार—आज भी सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल से वंचित हैं।

मज़दूर दिवस और अधूरी क्रांति

जब तक श्रम के साथ लिंग आधारित असमानता की बात नहीं होगी, तब तक कोई भी मज़दूर आंदोलन पूरा नहीं माना जा सकता। Bell Hooks अपने प्रसिद्ध ग्रंथ From Margin to Center में कहती हैं कि जब तक औरतें खुद को हाशिए पर पाती हैं, तब तक कोई भी क्रांति अधूरी रहती है।

स्त्रीधर्म, जेंडर भूमिकाएं और अदृश्य श्रम — ये सब मिलकर आज की महिला मज़दूर के लिए एक नया संघर्ष रचते हैं। ये जेंडर भूमिकाएं भी एक तरह की ग़ुलामी हैं—समाज की मौजूदा ग़ुलामी का एक अहम, अदृश्य और अनकहा हिस्सा।

आपको अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस की बधाई। याद रखें, औरत की मज़दूरी केवल पगार नहीं, पहचान और इज़्ज़त की भी माँग है।

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References:

About the Chicago Labour Movement: Eight-Hour Movement

The Interview series by The Swaddle – https://www.youtube.com/watch?v=_KdIfqaQQ7g

Bell Hooks – From Margin to Center, South End Press, 1984.

Statista (2019), “Daily time spent on leisure by gender and social class in India”
https://www.statista.com/statistics/1120651/india-daily-time-spent-on-leisure-by-gender-and-social-class/

Author

  • नम्रता मिश्रा जेंडर, संस्कृति और विकास से जुड़े मुद्दों में दिलचस्पी रखती हैं और इनसे जुड़ी जटिलताओं को समझने की कोशिश करती रहती हैं। वे 'गरदा– The Feminist Dust' नाम से एक नारीवादी कॉमिक पेज चलाती हैं, जो हिंदी, अंग्रेज़ी और अवधी में कॉमिक्स के ज़रिए जागरूकता फैलाने का प्रयास करती है। इस समय वे मुंबई स्थित 'वाचा' संस्था के साथ किशोर लड़के-लड़कियों के साथ फेमिनिस्ट यूथ लीडरशिप पर कार्यरत हैं।

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