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आओ मेरे गाँव में : कविता

नरेश कुमार बेसरा:

आओ मेरे गाँव में
कभी समय निकाल कर
इमली पेड़ के छांव में
बैठ कर बात करेंगे।

घर में मिट्टी के बर्तन
से बने चावल सब्जी
पुआल से बने पीढ़ा में
बैठ कर खिलाएंगे।

मडुवा रोटी, गोड़ा
माढ़, सिलयारी साग,
चकोड़ गुड़ा, पुटकल साग,
इमली आंचार, देमता चटनी।

सिखाएंगे गाँवों के खेत
खलिहानों गलियारों में
अपने गाँव के भाषा में
साथ मिलकर जाल, खटिया,
पटिया, नोड़रा बुनने।

खेतों में जा कर बताएंगे
हल कैसे जोतना है
धान कैसे बोना है
खेत के डोभा में बताएंगे
बांस के बने सैर से पानी
निकाल कर मछली पकड़ना।

प्यास लगे तो गड्ढा खोदकर
केंदु, सराई पत्ती के तुतरु
बना कर पानी पीना।

आओ दिखाते हैं हम
परब त्योहार के अवसर में
कैसे पूजा पाठ कर, मधुर
करम के गीतों के सुर में
मंदर के थाप में झूमते हैं।

आओ धान के खेतो में
दिखाते हैं भाग खुटा गाड़ कर
कीड़ा मकोड़ा कैसे भागते।
दिखाएंगे गाँव का सैर कराएंगे
नदी जंगल,पहाड़ पर्वत की सैर
आओ मेरे गाँव में
कभी समय निकाल कर।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है।

Author

  • नरेश, झारखण्ड के सिमडेगा ज़िले के बोलबा प्रखंड के आवगा गाँव से हैं। गोटुल शिक्षा, आर्ट, व् कविता लेखन में रूचि रखने वाले नरेश, वर्तमान में फार्मर प्रोडूसर आर्गेनाईजेशन में सीईओ के पर पर कार्यरत हैं। नरेश एक समाज सेवी भी हैं जो झारखण्ड में गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन के संयोजक के रूप में काम करते हैं।

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