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बाल विवाह से लड़ती लड़कियाँ

संकलनकर्ता – अमित

आधारशिला बालिका शिक्षण केन्द्र, भदेसर, राजस्थान में हुए तीन दिवसीय बालिका सशक्तिकरण शिविर में लगभग 35 छात्राओं नें भाग लिया जिनमें अधिकांश भील व मीणा आदिवासी समाज की थी। शिविर के दौरान इन्हें लिखने के लिये एक विषय दिया गया – ‘आपने या आप के आस पास किसी लड़की ने अब तक के जीवन में क्या-क्या परेशानियाँ सहन करी और उन्हें कैसे पार किया?’

इन लेखों में समाज का जो चेहरा सामने आया उससे मन को बहुत दुःख हुआ। लड़कियों के लिये इतनी योजनाओं और विश्वगुरू बनने के इतने ढोल पीटे जाने के बावजूद हमारी बच्चियों के सपने पूरे होना कितना कठिन है। हम अभी भी संविधान में लिखे आदर्श, अवसर की बराबरी, के लक्ष्य से कोसों दूर हैं।

लेकिन इन जोशीली बच्चियों के साथ तीन दिन बिताने पर मन आशा और विश्वास से भी भर गया। इन परेशानियों को पार करने के लिये इनके संकल्प और जुझारूपन की कहानियाँ  सुनकर लगा कि यह असंभव काम नहीं है। इनके इस जोश और संकल्प के पीछे जो ताकत है वह है आधारशिला चलाने वाली दो महिलाएं – प्रेरणा और सुमनमाई। इनकी मेहनत और प्यार के बिना इन आदिवासी बच्चियों के लिये, ज़िन्दगी में कुछ कर पाने के सपने देखना सम्भव नहीं हो पाता।

इस अंक में हम दो लड़कियों के आलेख आपके साथ साझा कर रहे हैं।

– अमित

1). रवीना भील, कक्षा 8, गाँव होड़ा, उम्र 15 वर्ष:

मेरी छोटी सी उम्र में ही शादी हो गई थी। मेरी ज़िन्दगी खराब हो गई। मेरी ज़िन्दगी में सबसे बड़ी परेशानी यही है कि मेरी शादी हो गई और मेरे मम्मी-पापा को ससुराल वाले बार-बार बोलते हैं कि लड़की को ससुराल भेजो। ये सब परेशानियां मेरी ज़िन्दगी में चल रही हैं। ससुराल वाले हर टाइम मुझे ससुराल ले जाने की ही बात करते हैं।

मेरी एक सहेली थी, उसकी परेशानी थी कि उसे पढ़ना अच्छा लगता था लेकिन उसके माँ-बाप के पास पैसे नहीं थे कि वे उसे पढ़ा सकें। इसी कारण उसकी पढ़ाई नहीं हो पाई और उसने हिम्मत हार कर पढ़ाई ही छोड़ दी। फिर उसकी शादी करा दी और ससुराल भेजने लगे। उसे यह सब सहन करना पड़ा और इसीलिए लड़कियों की ज़िन्दगी खराब हो जाती है। मेरी सहेली का पति बहुत शराब पीता था और उसे मारता भी था पर वह सब किसी को नहीं बताती है।

मैं उसकी सबसे अच्छी दोस्त हूँ इसलिए मुझे उसने सब बताया। मैंने कहा, “तू क्यों सहन करती है, माँ-बाप को बता दे ये सब बातें।” वह कहती है कि क्या बताऊँ, उन्हें! क्या होगा?

मेरे गाँव में एक और लड़की है। उसकी यह परेशानी है कि उसके सुसुराल वाले बोलते हैं कि तू पढ़ने क्यों जाती है। उसे कहते हैं कि तुझे पढ़कर क्या करना है, तुझे आगे चूल्हा चौका ही करना है। कोई पढ़ाइ-वड़ाई नहीं करनी है, घरों के काम ही करने हैं।

यह सच है कि हमारी ज़िन्दगी हमारे ही परिवार वाले खराब करते हैं इसलिए तो हम आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इन्हीं परेशानियों से गाँव की लड़कियाँ पढ़ नहीं पाती हैं। सब कुछ सहन कर लेती हैं।

2). धीरे-धीरे लड़कियों के प्रति समाज का नज़रिया बदल रहा है; ओमा भील, उम्र 19 वर्ष

मेरी कहानी की शुरूआत होती है एक छोटे से गाँव से जहाँ एक ऐसा परिवार रहता था जिनकी आर्थिक स्थिती बहुत ज़्यादा खराब थी। उसके परिवार में पाँच भाई-बहन थे। वह परिवार उन सबको पढ़ाना तो चाहते थे पर न पैसा, न अच्छा घर, न अच्छी सुख-सुविधा थी। तो उस गरीब परिवार वालों ने अपने सब बच्चों की शादी एक साथ करवा दी। उन्होंने सोचा कि शादी करवा देंगे और ससुराल वालों को बोलेंगे कि हमारी लड़की पढ़ना चाहती है। आप इसकी पढ़ाई करवाना। ससुराल वालों ने हाँ तो कर दी लेकिन ऐसा करा नहीं। बाकी दो बहनों का ससुराल पक्ष अच्छा था उन्होंने दो बहनों की पढ़ाई करवाई पर तीसरी बहन के ससुराल पक्ष वालों ने ऐसा नहीं किया।

उस लड़की के परिवार को भी तीसरी लड़की के ससुराल पक्ष वालों ने ताने देना शरू कर दिया। फिर उस लड़की ने अपने मम्मी-पापा को बोला मुझे पढ़ने नहीं दे रहे, न वे शांति से जीने दे रहे हैं। पढ़ाना तो दूर की बात है। माँ-बाप के नाम पर ताने देते हैं। उसकी दोनों बहनें ससुराल में रहकर पढ़ाई पूरी कर रही थी। फिर मम्मी-पापा ने वहाँ से अपनी बेटी की शादी तोड़ दी और अपनी लड़की को वापिस अपने घर ले गये। उसे 12वीं पूरी करवाई, ग्रैजुएशन कम्प्लीट करवाया फिर उनकी दूसरी जगह शादी करवाई।

हालांकि ये सब करने में उस परिवार को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा पर अब उनको बेटी बहुत अच्छे परिवार में है। तथा अपने आगे की पढ़ाई के लिए भी उसके ससुराल वाले उनको सहायता कर रहे हैं।

माना कि उस लड़की की ज़िन्दगी में समस्याएँ और मुसीबत हज़ार थीं पर उसके हौसलों में उड़ान थी। उन्हीं हौसलों के कारण इतनी समस्याएँ होने के बावजूद भी वह आसमान की ऊँचाइयों पर थी।

निष्कर्ष – समाज का अर्थ होता है संबंधों का जाल, जिस प्रकार किसी की कहानी एक जैसी नहीं हो सकती उसी प्रकार समाज में एक प्रकार के लोग एक जैसे नहीं हो सकते हैं। कुछ परिवार हैं जो अपनी बेटी को अपने बेटे जैसा बनाना चाहते हैं। कुछ अपनी बेटी को समाज में अपना सर भी नहीं उठाने देना चाहते। हम लोगों के लिए यही संदेश देना चाहते हैं कि लड़कियों को मौका दिया जाए तो वे भी कुछ कर दिखा सकती हैं।

समस्याएँ आना जीवन का काम है। उन समस्याओं से लड़ना हमारे जीवन की पहचान है।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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