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वजूद: कविता

ज्योति लकड़ा:

आज भी याद है मुझे आजी की वो कहानियाँ जिनमें टंगे होते
पेड़ों पर प्राण
यह जानते हुए भी ….
कटते रहे पेड़
कटते पेड़ों के साथ ही कट रहा है
फूलों से रंग, लहरों से लय
टूटते पहाड़ों सा अब टूट रहा है आदमी
छूट रहा है उनसे गीत संगीत
मरती नदीयों सा मर रही उसकी संस्कृति
कटते पेड़ों के साथ ही कट रहे हैं बहुत गहरे कहीं वो रिस्ते
जिनसे बंधे हैं हम सब
कहां है अब गांव का गोई – सखी भाई
कहां चली गयी सोनपांखी चिड़ियाँ
कहां है वो नाग नागिन जिनसे सीखी हमने कलाबाजियां
कहां गयी वो सहचरी जीव जिनसे सीखी हमने जीवन के हुनर
कहां गये इंद्रधनुसी वादा लिए हमारे नेता
कहां गये महतो, माझी
क्या कटते पेड़ों सा कट रहे हैं सब?
फिर भी हम काटते हैं पेड़
बनाने के लिए घर
पर
बचा पाएंगे क्या
बगैर पेड़ों के अपना वजूद

शब्द संकेत: सोनपांखी चिड़ियाँ – युवाओं का प्रतीक

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