अखिलेश:
मनरेगा के काम में मजदूरों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। लिखित में काम मांगने के बावजूद उन्हें सही समय पर काम नहीं मिल रहा है, जबकि 15 दिनों के अन्दर काम मिल जाना चाहिए। काम तो दूर की बात है, यहाँ तो जॉब कार्ड बनाने के लिए भी काफी दिनों तक ब्लॉक के चक्कर काटने पड़ते हैं। महीनो से भी ज़्यादा लग जाते हैं लेकिन फिर भी जॉब कार्ड नहीं देते हैं। अगर जॉब कार्ड दे भी देते हैं, तो काम काफी दूर पंचायत के अन्दर जहाँ गाडियाँ भी नहीं जाती, वहाँ पर दे देते हैं, फिर भी लोग काम करने के लिए जाते हैं। मजदूरी के भुगतान में दो, तीन या कभी कभी तो छह-छह महीने भी लग जाते हैं।
जब इसकी शिकायत ब्लॉक के कार्यक्रम पदाधिकारी (पीओ) को देते हैं तो वह बोलता है कि जिला से गड़बड़ी है, जब जिला में शिकायत करते हैं उप आयुक्त पदाधिकारी (डीडीसी) को तो वह बोलता है, ये तो राज्य से सही होगा, राज्य मे जाते हैं तो बोलते हैं दिल्ली से रूका हुआ है। इस तरह मजदूरों को परेशान किया जाता है, ताकि वह दौड़ते-दौड़ते थक जाए और फिर मनरेगा में काम करना ही बंद कर दे या फिर भाग जाए। ये है सरकार की नीति। अब मनरेगा मजदूरों को परेशान करने के लिए एक ऐप लाया गया है, इस ऐप से यह परेेशानी होता है कि एक दिन में एक साईट पर 20 से कम ही लोगों की ही हाजरी लगेगी, और मजदूरों को दिन में दो बार आना होगा हाजरी बनाने के लिए। नेटवर्क की प्रोबलम से किसी की हाजरी पुरी ही नही होती, जिसके चलते मज़दूर काफी परेशान हैं।
50 मज़दूरों पर एक मनरेगा मेट (इसे एक तरह से साइट सुपरवाइज़र समझा जा सकता है) होता है। उनकी मज़दूरी भी कम दी जाती है और मज़दूरी के भुगतान में भी काफी दिन लगा देते हैं। मजदूरी लेट से मिलने के चलते मनरेगा मेट भी भाग जाते हैं ऐसे में वो मजदूर जो काम करते हैं उनको काफी दिक्कत हो जाती है। बिना मनरेगा मेट के मजदूरों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, काम की साइट पर कोई सुविधा भी नही देती है सरकार। मनरेगा मजदूरों की इन सारी समस्याओं को लेकर बिहार के तीन जिलों सहरसा, अररिया, कटिहार के जन जागरण शक्ति संगठन से जुड़े 100 से भी ज़्यादा मजदूरों ने एक अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर में एक धरना प्रदर्शन में हिस्सा लिया और अपना विरोध दर्ज कराया।
“मनरेगा के काम में देरी नही…चोरी नहीं।”

