गिरीश कुमार:
‘शिक्षा’ बाज़ार की वस्तु बनने तक की यात्रा
“जिस देश और समाज की शिक्षा व्यवस्था मजबूत होती है, उस देश की सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक जड़ें भी उतनी ही प्रगतिशील व सशक्त होती हैं।”
प्रश्न है कि आखिर शिक्षा क्या है?
क्या शिक्षा केवल अक्षर पहचानना, किसी परीक्षा को उत्तीर्ण करना, अच्छी नौकरी पाना और मात्र धन कमाना है? इस शिक्षा का मतलब इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। मनुष्य को सोचने-समझने, सवाल पूछने, सही-गलत में फर्क करने एवं समाज के प्रति जिम्मेदार बनने योग्य बनाना है?
अगर शिक्षा केवल नौकरी-रोजगार पाने तक सीमित होती, तो शायद स्कूलों और विश्वविद्यालयों की ज़रूरत इतनी बड़ी नहीं होती। ‘शिक्षा’ का असल उद्देश्य मनुष्य को केवल धन कमाने वाला नहीं, बल्कि बेहतर सोचने-समझने वाला मनुष्य बनाने से है।
आज मनुष्य ने जो स्वास्थ्य, चिकित्सा, विज्ञान, कृषि व खाद्यान्न सुरक्षा, उद्योग, आधुनिक तकनीक, निरंतर परिष्कृत होती संचार सुविधा, कला, खेल एवं अंतरिक्ष व अन्य क्षेत्रों में जो अद्भुत प्रगति की है, उसके पीछे ज्ञान और वैज्ञानिक शिक्षा की बहुत बड़ी भूमिका है। शिक्षा ने मनुष्य को वैज्ञानिक नजरिए से प्रकृति को सोचने-समझने, बीमारियों को हराने, निरंतर शोधों के माध्यम से नई-नई तकनीकों की खोज करने तथा दुनिया को बदलने की क्षमता को बढ़ाया है।
लेकिन आज हमारे समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा होता दिखाई दे रहा है, वह यह कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से दूर होती जा रही है या किसी गुप्त षड्यंत्र के साथ लोगों से दूर किया जा रहा है?
जो शिक्षा कभी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का आधार माना व समझा जाता था, आज वह एक ऐसे बाज़ार का रूप लेती दिखाई दे रही है, जहाँ स्कूल, कॉलेज, कोचिंग सेंटर, किताबें, परिवहन, यूनिफॉर्म, डिजिटल उपकरण और यहाँ तक कि बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी हर छोटी-छोटी ज़रूरतें भी खरीदने-बेचने की वस्तु बनती जा रही हैं। जो कि शिक्षा के बाज़ारीकरण का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
जब स्कूल केवल स्कूल नहीं, बल्कि विविध समाज और बच्चों का मिलन स्थल हुआ करते थे
आज से कुछ दशक पहले का सरकारी विद्यालय याद कीजिए।
एक ही कक्षा में डॉक्टर का बेटा, किसान की बेटी, व्यापारी का बच्चा, मजदूर का बेटा, शिक्षक की बेटी और सरकारी कर्मचारी का बच्चा एक छत के नीचे एक साथ बैठकर अध्ययन करते थे। किसी के घर में ज्यादा संपन्नता थी और किसी के घर में कम, इसके बाद भी विद्यालय में बैठने की जगह सबकी लगभग एक जैसी हुआ करती थी। बच्चे साथ सीखते थे, खेलते थे, साथ पढ़ते थे और साथ बड़े होते थे।
विद्यालय का महत्व केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि एक किसान का बच्चा डॉक्टर के बच्चे का दोस्त बनता था और डॉक्टर का बच्चा किसान के बच्चे के घर जाता था। अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चे एक-दूसरे के जीवन को समझते थे तथा विद्यालय समाज में समानता व भाईचारे की भावनाओं का निर्माण करने के सबसे मजबूत स्थान हुआ करते थे। यही कारण है कि सरकारी विद्यालय सिर्फ शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक मेल-मिलाप, लोकतांत्रिक भावनाओं और आपसी समझ के भी केंद्र हुआ करते थे। किंतु समय के साथ पूंजीवादी विकासवादी अवधारणा ने आज उक्त सामाजिक तस्वीर धीरे-धीरे बदल दी है।
आर्थिक रूप से संपन्न व सक्षम परिवारों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी विद्यालयों से निकलकर निजी विद्यालयों की ओर आकर्षित हो गया। अंग्रेजी माध्यम का महत्व, बेहतर भवन, स्मार्ट क्लास, परिवहन, विभिन्न गतिविधियों और आधुनिक सुविधाओं का आकर्षण बढ़ा है। इनमें से बहुत सी सुविधाएं उपयोगी भी हैं। निजी विद्यालयों का होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब अच्छी शिक्षा को पैसे से जोड़ दिया जाता है तथा सरकारी शिक्षा व्यवस्था को गरीबों की शिक्षा मान लिया जाता है।
सरकारी विद्यालय कैसे कमजोर होते गए?
आज यह सवाल केवल शिक्षकों से पूछना उचित नहीं होगा कि सरकारी स्कूलों की स्थिति क्यों खराब है या क्यों दिन-पर-दिन खराब होती जा रही है? असल सवाल इससे कहीं ज्यादा बड़ा व विचारणीय है।
वह यह कि जब देश में आबादी जिस गति से बढ़ रही थी, गाँवों और शहरों का विस्तार हो रहा था, बच्चों की संख्या बढ़ रही थी, तब क्या उसी अनुपात में सरकारी विद्यालय, शिक्षक, कमरे, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और अन्य सुविधाएं व ज़रूरतों को बढ़ाया गया?
शासन के पास इसका कोई ठोस संतोषजनक जवाब नहीं है। अब तो हालात यह हैं कि विगत कुछ वर्षों में हजारों की संख्या में विद्यालय बंद हुए हैं, वहीं दूसरी ओर धीरे-धीरे शिक्षा के विस्तार में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ती जा रही है। कुछ जानकार यह कहते हैं कि सरकार शिक्षा को गैर-उत्पादक और राजस्व पर बोझ मानकर इसे निजी हाथों में सौंप रही है, क्योंकि वह शिक्षा को लाभ-हानि के चश्मे से देखती है। इस नीति के तहत शिक्षा पर होने वाले खर्चे घटाए जा रहे हैं, शिक्षण संस्थानों का बाज़ारीकरण किया जा रहा है और शिक्षा एक महंगी वस्तु बनकर आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है।
अविभाजित मध्य प्रदेश और बाद में छत्तीसगढ़ में शिक्षकीय व्यवस्था इसका एक उदाहरण रही है। समान प्रकृति के काम के बावजूद शिक्षकों व शिक्षाकर्मियों की सेवा शर्तों और वेतन में अंतर रहा। इसके परिणामस्वरूप लंबे समय तक असंतोष और आंदोलन चलते रहे। आज भी शिक्षक समूह सरकार की नीतियों से संतुष्ट नहीं हैं। अतः यहाँ केवल शिक्षकों को दोष देना उचित नहीं होगा। हमें यह भी पूछना चाहिए कि एक ही शिक्षा व्यवस्था में समान जिम्मेदारी निभाने वाले शिक्षकों के बीच ऐसी असमान व्यवस्था क्यों बनाई गई?
नीति बनाने वालों को यह समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था में अस्थिरता का असर अंततः बच्चों पर ही पड़ता है।
‘शिक्षा’ सेवा से व्यवसाय तक
निजी विद्यालयों का विस्तार अपने आप में गलत है या नहीं, इस पर व्यापक चर्चा हो सकती है। समाज में अलग-अलग प्रकार के विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन जब शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान से अधिक मुनाफा बनाना बन जाए, तब चिंता होना स्वाभाविक है। इस महंगी शिक्षा के दौर में आज एक बच्चे को स्कूल भेजना कई परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ तो साबित हो रहा है, साथ ही बहुत से भारतीय परिवारों में यह गरीबी का कारण भी बन रहे हैं।
महंगी फीस, प्रवेश शुल्क, परिवहन, यूनिफॉर्म, किताबें, कॉपी, डिजिटल उपकरण, विभिन्न गतिविधियां और दूसरी आवश्यकताओं का खर्च मिलाकर शिक्षा परिवार के बजट पर भारी पड़ रहा है।
उच्च व व्यावसायिक शिक्षा की स्थिति तो और कठिन हो गई है। मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक शिक्षा का खर्च बहुत-से परिवारों की क्षमता से बाहर होता जा रहा है।
ऐसे में यही कहा जा सकता है कि – “जिसके पास पैसा है, संपन्नता है, उसके पास दर्जनों बेहतर अवसर हैं।” फिर सवाल उठता है कि, क्या प्रतिभा का मूल्य पैसा तय करेगा?
सभ्य समाज के लिए यह विचारणीय है कि, यदि दो बच्चे समान प्रतिभा रखते हैं, लेकिन एक के परिवार के पास महंगी कोचिंग और अच्छे संसाधन खरीदने की क्षमता है और दूसरे के पास नहीं, तो प्रतियोगिता वास्तव में प्रतिभा की प्रतियोगिता नहीं रह जाती, बल्कि वह आर्थिक क्षमता की प्रतियोगिता बन जाती है!
भारत में शिक्षा गुरु-शिष्य संबंध की परंपरा से पहचानी जाती थी, जो कि अब ग्राहक और सेवा प्रदाता में तब्दील हो गई है।
पहले शिक्षक केवल किताब पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं माना जाता था, बल्कि वह बच्चों के जीवन को समझने व संवारने में मदद करने वाला आदर्श मार्गदर्शक समझा जाता था।
आज कई जगहों पर शिक्षा का स्वरूप बदलता दिखाई देता है।
पालक भारी शिक्षण शुल्क देता है, इसलिए वह ग्राहक की श्रेणी में आ गया है। विद्यालय सेवा प्रदाता है। शिक्षक कर्मचारी है और बच्चा इस पूरी व्यवस्था का उपभोक्ता हो गया है।
प्रतियोगी परीक्षा और उसका परिणाम बच्चों को बेहतर रैंक हासिल करने के दबाव तक सीमित कर दिया है।
यह बच्चों पर गंभीर मानसिक दबाव और अवसाद का कारण बन रहा है।
बच्चों से पूछा जाता है, “कितने नंबर आए?”
लेकिन यह कम पूछा जाता है: उसने क्या सीखा-समझा, मन में कौन-कौन से सवाल पैदा हुए?
शिक्षा की सफलता केवल परीक्षा में प्राप्त नंबरों व रैंक से नहीं मापी जा सकती।
शिक्षाशास्त्रीय कहते हैं, जिस बच्चे ने सवाल पूछना सीख लिया, वह शिक्षा के वास्तविक अर्थ के करीब पहुंच गया है।
आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा : सबसे बड़ी चिंता
शिक्षा के बाज़ारीकरण पर चर्चा करते समय हमें भारत के दूरस्थ गाँवों और आदिवासी क्षेत्रों को भूलाया नहीं जा सकता। क्योंकि आदिवासी क्षेत्रों में समस्या केवल फीस की नहीं है, बल्कि कई जगह समस्या यह है कि विद्यालय है, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं। भवन है, लेकिन पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। किताब है, लेकिन पढ़ाने-सीखाने का पर्याप्त समय और व्यवस्था नहीं है।
छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी और पेसा क्षेत्रों में भौगोलिक कठिनाइयां भी बड़ी चुनौती हैं।
कहीं सड़क नहीं है, कहीं सार्वजनिक परिवहन की सुविधा कमजोर है या बिल्कुल नहीं है, शिक्षकों के रहने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में केवल कागज पर शिक्षक पद स्वीकृत कर देना पर्याप्त नहीं है।
ज़रूरत है ऐसी नीति की जो स्थानीय परिस्थितियों को समझे और उस पर ठोस पहल की जाए।
दूरस्थ विद्यालयों के लिए शिक्षक आवास, परिवहन, स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर शिक्षक के रूप में तैयार करना और कठिन क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए विशेष व्यवस्था जैसे उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा। कई प्राथमिक विद्यालयों में एक या दो शिक्षकों के भरोसे पांच कक्षाओं का संचालन, क्या यह संभव है?
एक तरफ पहली कक्षा का बच्चा अक्षर पहचानना सीख रहा है। दूसरी तरफ पांचवीं कक्षा का बच्चा गणित का सवाल हल कर रहा है।
एक ही शिक्षक को सबको पढ़ाना है।
साथ ही उपस्थिति, रिकॉर्ड, विभागीय जानकारी, बैठकों और दूसरी जिम्मेदारियां भी हैं, जनगणना, मतदाता सूची से जुड़े कार्य, पौढ़ शिक्षा आदि की जवाबदेही। फिर यह कहना कि बच्चों की पढ़ाई कमजोर क्यों है?
यह सवाल केवल शिक्षक से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से पूछना चाहिए।
यदि किसी विद्यालय में बच्चों की संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद करना कठिन होगा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम कानून के अंतर्गत 1:30 का प्रावधान है, साठ बच्चों के लिए सिर्फ दो शिक्षक, शिक्षा में कैसे गुणवत्ता संभव है?
कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की बुनियादी शिक्षा के अंतर्गत पढ़ने-लिखने, सीखने-समझने की क्षमता को लेकर जो समस्याएं दिखाई देती हैं, वह इसी बड़ी चुनौती की ओर संकेत करती हैं।
शिक्षक पढ़ाएँ या ऑनलाइन रिपोर्ट भरें?
आज शिक्षक की भूमिका में एक और बदलाव आया है।
ऑनलाइन पोर्टल पर जानकारी भरना, आंकड़े भेजना, विभिन्न रिपोर्ट तैयार करना, बैठकों में जाना और अनेक प्रशासनिक कार्य करना शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। डिजिटल तकनीक से जुड़ना गलत नहीं है। किंतु सही उपयोग किया जाए तो तकनीक शिक्षा को बेहतर बना सकती है।
लेकिन सवाल यह है कि तकनीक शिक्षक का काम आसान कर रही है या शिक्षक को ही डेटा एंट्री कर्मचारी बना रही है?
शिक्षक का सबसे महत्वपूर्ण काम क्या है?
बच्चों के साथ कक्षा में रहना, विभिन्न गतिविधियों से जोड़ना, उनकी गलतियां देखना और सुधारना, उनके सवाल सुनना, कमजोर बच्चे को अतिरिक्त समय देना, प्रयोग कराना, किस्से-कहानियों के माध्यम से नैतिक बनाना, पढ़ने की आदत डालना आदि।
यदि शिक्षक के समय का बड़ा हिस्सा रिपोर्ट और गैर-शैक्षणिक काम में चला जाएगा, तो बच्चों के लिए उसका समय कम होना स्वाभाविक है।
प्रशासन को आंकड़े चाहिए तो उसके लिए अलग सहयोगी व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षक को शिक्षक ही रहने दिया जाए।
किताब बच्चों में वितरित हो गई, लेकिन क्या बच्चा पढ़ रहा है?
किसी बच्चे को किताब दे देना शिक्षा की शुरुआत है, समाप्ति नहीं। अब असल सवाल यह है कि बच्चा किताब खोल रहा है या नहीं? क्या वह पढ़ और समझ पा रहा है? क्या वह शिक्षक से बेहिचक सवाल पूछ पा रहा है? क्या कक्षा में चर्चा होती है? क्या बच्चे प्रयोग करते हैं? क्या उन्हें अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर पढ़ाया जाता है?
विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा को स्थानीय जीवन से जोड़ना बहुत ज़रूरी है। बच्चे के लिए जंगल केवल जंगल नहीं है, वह उसके जीवन का हिस्सा है, नदी केवल पानी की धारा नहीं है, वह उसके गाँव और जीवन का आधार है, खेती सिर्फ आजीविका व रोजगार नहीं है, बल्कि वह विज्ञान, मौसम, मिट्टी, बीज, पानी और मेहनत का जीवंत पाठ है।
स्थानीय बोली, लोककथा, खेती, जंगल, वनस्पति, पशु-पक्षी, मौसम, स्थानीय इतिहास और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर पढ़ाया और सीखाया जा सकता है।
बच्चों को उनकी दुनिया से काटकर शिक्षा देने के बजाय उनकी दुनिया को ही किताब बना देना चाहिए।
जानकार बताते हैं कि बुनियादी शिक्षा कमजोर है, तो पूरी इमारत कमजोर होगी।
हम अक्सर बड़े विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, इंजीनियरिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की बात करते हैं।
लेकिन किसी बच्चे ने प्राथमिक स्तर पर पढ़ना ही नहीं सीखा, तो वह आगे कैसे बढ़ेगा? शिक्षा की असली नींव वहीं से तैयार होती है।
हर बच्चा कम से कम इतना ज़रूर सीख सके कि वह किसी सामान्य पाठ को पढ़ सके, उसका अर्थ समझ सके, लिख सके, सामान्य गणना कर सके, सवाल पूछ सके और तर्क के साथ अपनी बात रख सके।
बुनियादी शिक्षा मजबूत होगी, तो आगे की पूरी शिक्षा मजबूत होगी।
विद्यालय का संचालन व जिम्मेदारी केवल शिक्षक तक सीमित न रखकर, विद्यालय को मजबूत बनाने में सरकार की सबसे बड़ी भूमिका तो है ही, किन्तु समाज की भूमिका भी कम नहीं है।
विद्यालय प्रबंधन समितियां केवल बैठक की कार्यवाही लिखने के लिए नहीं बनाई जाती हैं।
पालकों को पूछना चाहिए कि विद्यालय में शिक्षक कितने हैं? बच्चे नियमित आ रहे हैं या नहीं? बच्चे वास्तव में क्या सीख रहे हैं? पुस्तकालय का उपयोग हो रहा है या नहीं? विद्यालय में पीने का पानी, शौचालय और सुरक्षा की व्यवस्था कैसी है? बच्चों के लिए खेल और प्रयोग की सुविधा है या नहीं?
जब पालक और समुदाय विद्यालय और सरकार से सवाल पूछेंगे, तभी विद्यालय समाज का वास्तविक संस्थान बनने की ओर अग्रसर होगा।
सरकार – शिक्षक – पालक – समुदाय इन चारों की साझी जिम्मेदारी से ही सरकारी शिक्षा में सुधार संभव है।
क्या समाधान हो सकता है?
वर्तमान में शिक्षा के क्षेत्र में समस्या बड़ी अवश्य है, परंतु इच्छाशक्ति है तो समाधान भी संभव है।
सबसे पहले सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त संख्या में स्थायी और प्रशिक्षित शिक्षक होने चाहिए।
दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के लिए अलग शिक्षक नीति और शिक्षक आवास की व्यवस्था के क्षेत्र में पहल करना होगा तथा शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाना चाहिए।
बहुकक्षीय शिक्षण की समस्या को कम करने के लिए विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराने होंगे।
विद्यालयों का मूल्यांकन केवल परीक्षा परिणाम से नहीं, बल्कि बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता से होना चाहिए।
कानून अनुसार प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा और स्थानीय ज्ञान को उचित स्थान दिया गया है, परन्तु क्या वह लागू हो पा रहा है, यह देखने की ज़रूरत है।
विद्यालयों में पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल सामग्री और डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराया जाना चाहिए और जहाँ उपलब्ध हैं, उनका नियमित उपयोग भी सुनिश्चित होना चाहिए।
निजी विद्यालयों की फीस और अन्य अनिवार्य शुल्कों में पारदर्शिता तथा प्रभावी नियम ज़रूरी हैं।
शिक्षा को केवल रोजगार से जोड़ने के बजाय वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ना होगा।
शासकीय विद्यालयों में सुधार के लिए सुझाव
सवाल है कि नीति निर्धारण व बनाने वालों के बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं?
उक्त सवाल असहज करने वाला ज़रूर है, लेकिन साथ ही साथ विचार करने योग्य भी है।
यदि सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता वास्तव में अच्छी है, तो शिक्षक, अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सरकारी व्यवस्था से जुड़े लोगों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए महंगे निजी विद्यालयों पर निर्भर रहने की ज़रूरत क्यों महसूस होनी चाहिए?
यहाँ उद्देश्य किसी व्यक्ति को मजबूर करना या दंडित करना नहीं है।
मुद्दा यह है कि जिस व्यवस्था के बारे में हम नीति बनाते हैं, क्या हम स्वयं उस व्यवस्था पर भरोसा करते हैं?
यह कि शिक्षक, अधिकारी, जनप्रतिनिधि और अन्य प्रभावशाली वर्ग के बच्चे भी यदि सरकारी विद्यालयों से जुड़े होंगे, तो विद्यालय की गुणवत्ता उनके लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाएगा जितना एक गरीब किसान या मजदूर के परिवार के लिए है।
फिर खराब भवन केवल गरीब का सवाल नहीं रहेगा।
तब शिक्षक की कमी केवल गरीब बच्चों की समस्या नहीं रहेगी।
पुस्तकालय, प्रयोगशाला, परिवहन और सुरक्षा की कमी सीधे नीति बनाने वालों के घर तक पहुंचेगी।
उक्त विचार पर गंभीर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए कि क्या शासकीय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नीति-निर्माताओं और शासकीय संस्थानों से जुड़े लोगों की सरकारी शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए कोई प्रभावी नीति बनाई जा सकती है?
क्या परीक्षा में पास होना ही शिक्षा की सफलता है?
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है: क्या केवल यह देखना पर्याप्त है कि बच्चा अगली कक्षा में पहुंच गया?
यदि बच्चा पूरे वर्ष स्कूल नहीं आया, पढ़ना नहीं सीख पाया, गणित की बुनियादी समझ विकसित नहीं कर पाया और फिर भी अगली कक्षा में पहुंच गया, तो क्या हमने शिक्षा का उद्देश्य पूरा कर दिया?
यह ठीक है कि बच्चे को फेल कर देना समाधान नहीं है। लेकिन बिना सीखे आगे बढ़ा देना भी समाधान तो नहीं है।
ज़रूरत है कि कमजोर बच्चों की पहचान की जाए, उन्हें अतिरिक्त शिक्षण सहायता दी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे वास्तविक रूप से सीख सकें।
प्रमाणपत्र से ज्यादा ज़रूरी सीखना है।
बच्चों को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकले
बच्चों को केवल किताब और ब्लैकबोर्ड के बीच सीमित क्यों रखा जाए? हम ऐसे क्यों न करें कि
कृषि विभाग का अधिकारी बच्चों को खेती और मिट्टी के बारे में बताए। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी ने स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता के बारे में समझाया।
वन विभाग का विशेषज्ञ जंगल और जैव विविधता के बारे में सिखाता है। किसान बीज और खेती का अपना अनुभव साझा करें। समाज में कार्यरत विभिन्न कारीगर अपने हुनर के बारे में बताएं। इंजीनियरिंग पुल, सड़क और मशीनों का विज्ञान समझाए।
खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति बच्चों को आकाश, ग्रहों और तारों की दुनिया से परिचित कराए।
स्थानीय बुजुर्ग गाँव के इतिहास और परंपराओं की कहानी सुनाएँ।
इससे बच्चे किताब से बाहर की दुनिया को भी समझेंगे।
शिक्षा केवल चार दीवारों के भीतर नहीं होती। पूरी दुनिया एक खुली पाठशाला है।
शिक्षा किसके लिए?
आज हमें सबसे बुनियादी सवाल फिर से पूछना होगा,
क्या शिक्षा अधिकार है या बाज़ार में खरीदी जाने वाली सेवा?
अगर शिक्षा केवल पैसे वालों के लिए अच्छी होगी, तो समाज में असमानता बढ़ेगी तथा अपराध में भी वृद्धि होगी। अगर गरीब के बच्चे के लिए अलग और अमीर के बच्चे के लिए अलग गुणवत्ता की शिक्षा होगी, तो हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं?
सरकारी विद्यालयों को गरीबों का विद्यालय और निजी विद्यालयों को अमीरों का विद्यालय बना देना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अच्छा संकेत तो नहीं है।
सरकारी विद्यालयों में फिर से समाज के हर वर्ग का विश्वास पैदा करने के साथ ऐसे विद्यालय बनाने होंगे जहाँ डॉक्टर का बच्चा भी पढ़े और किसान का बच्चा भी, जहाँ अधिकारी का बच्चा भी पढ़े और मजदूर का बच्चा भी। जहाँ किसी बच्चे को यह महसूस न हो कि वह गरीब है, इसलिए उसे कमतर शिक्षा मिलनी है।
शिक्षा को बाज़ार से नहीं, समाज से जोड़ना होगा
बाज़ार हमें बहुत-सी चीजें दे सकता है।
नई तकनीक दे सकता है, नई किताबें दे सकता है।
नए विद्यालय और नए प्रयोग भी दे सकता है।
लेकिन समान अवसर और सामाजिक न्याय बाज़ार अपने आप नहीं दे सकते।
यह जिम्मेदारी राज्य और समाज की है।
इसलिए निजी शिक्षा का विरोध करना ही समाधान नहीं है। असली समाधान है सार्वजनिक शिक्षा को इतना मजबूत बनाना कि कोई भी परिवार केवल मजबूरी में निजी शिक्षा की ओर न जाए।
शिक्षा का उद्देश्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा बड़ा होकर कितना पैसा कमाएगा।
बल्कि उसे यह भी सिखाना ज़रूरी है कि वह अपने आसपास के समाज को कैसे समझेगा? प्रकृति के साथ कैसे व्यवहार करेगा? वैज्ञानिक दृष्टि से कैसे सोचेगा? गलत बात का विरोध कैसे करेगा और अपने अधिकारों तथा जिम्मेदारियों को कैसे समझेगा?
जिस बच्चे के हाथ में किताब है, उसके हाथ में भविष्य है
भारत का भविष्य केवल बड़े विश्वविद्यालयों और चमकदार निजी स्कूलों में तैयार नहीं होगा।
भारत का असली भविष्य उस छोटे से गाँव के स्कूल में तैयार होगा जहाँ एक आदिवासी किसान व श्रमिक बच्चा पहली बार किताब खोलता है।
जहाँ किसान की बेटी पहली बार दुनिया का नक्शा देखती है। जहाँ मजदूर का बेटा पहली बार विज्ञान का प्रयोग करता है।
जहाँ किसी दूरस्थ गाँव का बच्चा पहली बार आसमान देखकर पूछता है, “तारे इतने दूर क्यों हैं?”
उस सवाल को दबाना नहीं है।
उसे और सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना है।
क्योंकि जिस बच्चे के मन में सवाल पैदा हो गया, उसमें सीखने की शुरुआत हो चुकी है।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो बच्चे को केवल नौकरी मांगने वाला न बनाए, बल्कि दुनिया को समझने और उसे बेहतर बनाने वाला नागरिक बनाए।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो गरीब और अमीर के बीच की दूरी बढ़ाने के बजाय कम करे।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें किताब हो, लेकिन केवल किताब न हो, शिक्षक हो, लेकिन केवल पाठ पढ़ाने वाला शिक्षक न हो, तकनीक हो, लेकिन तकनीक ही शिक्षा न बन जाए।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें विज्ञान हो, सवाल हो, तर्क हो, संवेदना हो, लोकतंत्र हो और मनुष्य होने का अर्थ समझने की क्षमता हो।
आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “सबको शिक्षा मिले।”
अब सवाल इससे आगे का है-
“सबको समान, गुणवत्तायुक्त, वैज्ञानिक और मानवीय शिक्षा मिले।”
क्योंकि शिक्षा बच्चों का भविष्य संवारने के साथ यह भी तय करती है कि आने वाला समाज कैसा होगा।
और इसलिए शिक्षा को बाज़ार के भरोसे छोड़ना केवल शिक्षा के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।

