जिनित सामाद:
मई दिवस का इतिहास खून-पसीने की स्याही से लिखा गया है। आज जब हम आधुनिक भारत की बात करते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस आधुनिकता की नींव में उन आदिवासियों का त्याग और उन श्रमिकों का श्रम है जिन्हें आज व्यवस्था ने हाशिये पर धकेल दिया है।
संवैधानिक धाराओं का उल्लंघन और आदिवासियों की पीड़ा:
भारतीय संविधान की 5वीं अनुसूची आदिवासियों को अपनी जमीन और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार देती है। अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है, लेकिन आज ‘कॉर्पोरेट विकास’ इन अधिकारों को कुचल रहा है। ओड़िशा के नियमगिरि, काशीपुर और कलिंगनगर जैसे क्षेत्र इस बात के गवाह हैं कि कैसे आदिवासियों ने अपनी जमीन बचाने के लिए प्राणों की आहुति दी। पेसा कानून (PESA), 1996 के तहत ग्राम सभाओं को स्वायत्तता दी गई थी, लेकिन आज निर्णय ग्राम सभाओं में नहीं, बल्कि बंद कमरों में पूंजीपतियों के साथ मिलकर लिए जा रहे हैं।
ओडिशा का संदर्भ: संसाधनों की प्रचुरता बनाम जन-विस्थापन:
ओडिशा भारत की खनिज संपदा का केंद्र है, लेकिन विडंबना यह है कि जहाँ सबसे अधिक बॉक्साइट, लोहा और कोयला है, वहीं के लोग सबसे अधिक विस्थापित और गरीब हैं। ‘पॉस्को’ (POSCO) से लेकर हालिया खनन परियोजनाओं तक जैसे (रायगड़ा जिला के सिज़िमाली, कुटरूमाली, सुंदरगढ़ जिले का लांजीबेरना आदि..) विकास का मॉडल केवल ‘निर्यात-उन्मुख’ रह गया है। यहाँ का आदिवासी अपनी ही जमीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ करार दिया जा रहा है। वनाधिकार अधिनियम (FRA, 2006) के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को खारिज करना या उन्हें लटकाए रखना, शासन की मंशा पर सवाल उठाता है।
मनरेगा और श्रम कानूनों का हनन:
श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा हथियार ‘मनरेगा’ (MGNREGA) था। लेकिन अब इसे बदलकर VB-G RAM-G कानून बना दिया गया और इसे कमजोर कर दिया गया ।
- बजट में कटौती और आधार-लिंक्ड भुगतान प्रणाली ने ग्रामीण श्रमिकों के लिए काम मिलना मुश्किल कर दिया है।
- श्रमिकों के आधार ई-केवाईसी और डिजिटल हाजिरी के कारण कई श्रमिकों के रोजगार के अधिकार को छिन गया है।
- समय पर मजदूरी न मिलना ‘मजदूरी के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है।
- दूसरी ओर, पुराने 44 श्रम कानूनों को समेटकर जो 4 नए श्रम संहिता (Labour Codes) लाए गए हैं, वे श्रमिकों के ‘यूनियन’ बनाने के अधिकार और ‘हड़ताल’ करने की शक्ति को खत्म करते हैं। यह संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के मजदूरों को मालिकों के रहमों-करम पर छोड़ देता है।
महिला श्रमिकों की दोहरी मार:
ओडिशा जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर पलायन (Migration) होता है। पलायन करने वाले श्रमिकों में महिलाओं की स्थिति सबसे दयनीय है। असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को न तो मातृत्व लाभ (Maternity Benefits) मिलता है और न ही कार्यस्थल पर सुरक्षा। ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ (अनुच्छेद 39-d) आज भी एक सपना बना हुआ है।
इस 1 मई विश्व श्रमिक दिवस के संकल्प में हमें इन मांगों को पुरजोर तरीके से उठाना होगा:
- संवैधानिक रक्षा: 5वीं अनुसूची और पेसा (PESA) का कड़ाई से पालन हो। बिना ग्राम सभा की वास्तविक सहमति के कोई भूमि अधिग्रहण न हो।
- श्रम सुधार: नए लेबर कोड को रद्द कर श्रमिकों के पक्ष में कानून बनाए जाएं और VB-G RAM-G को रद्द कर मनरेगा को पुनः लागू करें एवं साल में कम से कम 200 दिन के काम की गारंटी दी जाए।
- मजदूरी भुगतान: समान काम का समान भुगतान और सम्मानजनक भुगतान को सुनिश्चित करें ।
- सामाजिक सुरक्षा: असंगठित क्षेत्र के हर मजदूर (कृषि से लेकर निर्माण कार्य तक) के लिए यूनिवर्सल पेंशन और स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य हो।
ओडिशा की मिट्टी और देश के श्रमिकों का पसीना इस लोकतंत्र को सींचता है। यदि संसाधन केवल पूंजीपतियों की तिजोरियां भरेंगे और श्रमिक खाली हाथ रहेगा, तो यह विकास नहीं, बल्कि ‘सभ्य डकैती’ है। आइए, इस मई दिवस पर हम अधिकारों की रक्षा और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का संकल्प लें।

