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अयूब जी: एक मज़दूर की लड़ाई

अखिलेश कुमार:

अयूब मुस्लिम धर्म से आते हैं। वे गरीब और अशिक्षित व्यक्ति हैं। उनका जन्म 1 जनवरी 1955 को पलासी ब्लॉक के एक छोटे से गाँव, पंचायत चहटपुर (पलासी) में हुआ। अयुब देखने में लंबे, पतले और सांवले रंग के हैं। उनके परिवार में पहले से ही गरीबी थी, और कोई पढ़ा-लिखा नहीं था, जिसके चलते अयूब को रास्ता दिखाने वाला भी कोई नहीं था। गरीबी के कारण वो पढ़ नहीं पाए। 

जब बचपन में अयूब स्कूल जाते थे, तो पढ़ने वाले बच्चे उन्हें खूब चीढ़ाते थे और उनकी शिकायत मास्टर से कर देते थे। जो बच्चे रोज़ाना स्कूल जाते थे, उन्हीं का स्कूल में बोल-बाला था। इसके चलते मास्टर भी अयूब की खूब बेइज्जती करते और पीटते थे। अयूब को बच्चों के साथ खेलना बहुत पसंद था, जिसके कारण वे स्कूल भी नियमित रूप से नहीं जा पाते थे। कभी देर से पहुँचने पर अगले दिन बच्चे उन्हें चिढ़ाते और मास्टर से शिकायत कर देते थे। इसके कारण उन्हें मार भी पड़ती थी। ऐसी घटनाएँ कई बार हुईं, और अंततः उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया, जिससे उनकी पढ़ाई छूट गई। 

बचपन से ही पढ़ाई छूट जाने के बाद, गाँव के ही नईउद्दीन के यहाँ भैंस चराने का काम करने लगे। इससे गाँव और घर के लोग मानते थे कि नौकरी लग गई है। इस काम से उन्हें खाने के लिए चावल मिलता था, और उसी से किसी तरह जीवनयापन करने लगे। अगर उनके यहाँ कोई मेहमान आ जाता, तो वे सोच में पड़ जाते थे कि रोज कमाने-खाने वाले लोग मेहमान को कहाँ से खिलाएँगे। 

इनका विवाह नौ साल की उम्र में कर दिया गया, जिसके कारण ज़िम्मेदारी बढ़ने लगी, फिर शादी के बाद गाँव से दिल्ली, पंजाब और अन्य राज्यों में कमाने जाने लगे। बाहर जाकर धान रोपनी, धान काटने, और हर मौसम में खेती मज़दूरी करते, और सीज़न खत्म होने के बाद वापस गाँव लौट आते थे। वे गाँव में भी किसानों के खेतों में काम करते थे। काम के बदले 1 किलो चावल, आधा किलो आटा और ₹50 मिलते थे, जिससे वे जीवनयापन करते थे। जब सीजन खत्म हो जाता था, तो गाँव में मुखिया के द्वारा मनरेगा में ठेके पर काम करने लगते थे। इसके बदले में प्रतिदिन के हिसाब से 150 से 200 रुपये मिलते थे। उस समय मनरेगा में सुबह से शाम 4:00 बजे तक काम करवाया जाता था। काम करने के बाद भी पूरा पैसा नहीं मिलता था, जिससे मुखिया और बिचौलियों से झगड़ा भी हो जाता था। मनरेगा के बारे में उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी, और ब्लॉक, पंचायत या थाना में भी किसी को नहीं जानते थे, जिससे शिकायत कर सकें। 

लगभग 2010 के आसपास, जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से कामायनी स्वामी, आशीष रंजन, रंजीत पासवान, पंजाब और हरियाणा से कुछ लोगों की सूची लेकर, वार्ड-वार्ड घूम रहे थे। उसी समय अयूब की उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने नाम-पता पूछा और अपना भी परिचय दिया। अयूब से पूछा गया कि क्या वे मनरेगा के बारे में जानते हैं। उन्होंने हामी भरी कि वे मनरेगा के बारे में जानते भी हैं और उसके तहत काम भी किए हैं। उन्होंने ये भी जोड़ा कि उन्हें कईं लोगों को रोज़ के हिसाब से रुपया मिलता था और कुछ योजनाओं में काम किए हैं और उसकी मज़दूरी उनको नहीं मिली है। अयूब ने बताया कि जब भी वे लोग पैसे माँगने जाते हैं तो मुखिया से जवाब मिलता है कि सारे रुपए दे दिए हैं, तो कभी जवाब टालमटोल करके सभी को भगा देते हैं, पर बकाया रुपया नहीं देते हैं। 

संगठन के साथी आशीष रंजन ने कहा कि जितने मज़दूरों को पैसा नहीं मिला है, सबको एक साथ बुलाइए। अगले दिन एक बैठक रखी गई। मज़दूरों की एक सूची बनाई गयी और इसी में ये भी पता चला कि फर्जी नामों की जानकारी देकर, पैसा निकाला गया है। जब मुखिया से पूछा गया, तो उसने कहा कि सबको पैसा मिल गया है। लेकिन मजदूरों ने कहा कि पैसा नहीं मिला। शिकायत की बात होने पर आखिरकार मुखिया ने पैसा दे दिया। 

इसके बाद आयूब संगठन के साथ जुड़ गए। वे ब्लॉक में आवेदन भरकर देने लगे, रसीद कटवाने लगे। हर जगह अयूब की बातें सुनी जाने लगीं। शासन-प्रशासन भी उनसे परेशान और थोड़ा डरने लगा था क्योंकि वह मजदूरों के हित में हमेशा खड़े रहते थे और बिना घूस के काम करवाते थे। वे हिंदू-मुस्लिम भेदभाव नहीं करते थे और सभी के साथ मिलकर काम करते थे। 

अयूब शिक्षित नहीं थे, फिर भी अलग-अलग पंचायतों में जाकर लोगों को संगठित किए और लोगों को काम दिलवाने का काम करने लगें। एक ज़िले से दूसरे ज़िले तक लोगों को जोड़ने का काम किया। जब काम नहीं मिलता, तो धरना-प्रदर्शन भी करते थे। इसी कारण अयूब पर 17 एफआईआर भी दर्ज हैं। वे मनरेगा में 100 दिन का पूरा काम मज़दूरों को दिलाने के लिए लड़ते थे।

जिस समय कोविड-19 हुआ था, उस समय पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के लोगों से नफरत कर रहा था और काम नहीं मिलने के वजह से लोग पैदल गाँव लौट रहे थे,  तब भी अयूब ने आगे आकर सबका सहयोग किया। वे घर-घर जाकर दाल-चावल और मास्क बाँटते थे तथा सभी के साथ बैठकर चर्च-बैठक करते थे। उन्होंने सबका नाम रोज़गार में जोड़वाया और मास्टर रोल निकलवाया। अपनी जान जोखिम में डालकर भी वे लोगों के रोज़गार के बारे में सोचते रहे। इसी समय जब मीडिया में नफरत फैलाई जा रही थी, तब भी अयूब ने लोगों का साथ नहीं छोड़ा। कोविड के दौरान स्कूलों में कैंप लगवाए और कोशिश की कि जिनके घर खाना नहीं बनता था, वे सब कैंप तक पहुँच कर खाना खा सकें। वे घर में बंद नहीं रहे, बल्कि गरीब, वंचित, दलित, आदिवासी मजदूरों के बीच जाते रहे। 

पहले मनरेगा में काम करने पर लोगों के खाते में सही समय पर रुपया आ जाता था। लेकिन आजकल सरकार ने मज़दूरों के हित में जो ऑनलाइन हाजरी चालू किया है, उसी के नाते काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कभी नेटवर्क सही समय पर काम नहीं करता, जिससे उन्हें काम की साइट से वापस लौटना पड़ता है; और कभी काम करने के बाद भी उन्हें पैसे नहीं मिलते हैं। सैकड़ों बार ब्लॉक का चक्कर लगाने के बाद काम मिलता है। अब 100 दिनों में से सिर्फ 25-30 दिन ही काम मिल पाता है। सरकारी दफ्तर में बैठकर पैर हिलाने वाले अफसर जिनकी तनख्वाह लाखों-हज़ारों में रहती है, उनका कोई ऑनलाइन हाज़िरी नहीं बनता है। लेकिन हम मज़दूरों को 255 रुपये मज़दूरी के लिए दिन में दो बार हाज़िरी लगानी पड़ती है। कई बार हाज़िरी कट जाती है और समय भी बर्बाद होता है। सही समय पर खाना भी नहीं मिल पाता है। 

सरकार ने कहा था “अच्छे दिन आएंगे”, लेकिन क्या हम लोगों के लिए यही महंगाई ही अच्छे दिन हैं? हमें ऐसा दिन नहीं चाहिए। पुराने दिन ही ठीक थे हमारे लिए।

देश में डर का माहौल बना दिया है। हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत बढ़ गई है। जब आवाज़ उठाते हैं तो फर्जी केस में फँसाने और प्रशासन से धमकी दिलाने की कोशिश होती है। हमें हिंदू-मुस्लिम नहीं, शांति, भाईचारा और रोज़गार चाहिए।

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  • अखिलेश, बिहार के अररिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। गाने लिखना, गाना और सबको खेल खिलाने में माहिर। जन जागरण शक्ति संगठन के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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