Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

आदिवासी एकता परिषद प्रेरित ‘बाल संस्कार केन्द्र’ : उमजा, तापी (गुजरात)

सांगलिया भाई वलवी:

आदिवासी एकता परिषद के वैचारिक आंदोलन के बिंदुओं एवं भूमिका को आगे ले जाने के लिए आदिवासी स्वावलंबन, अस्तित्व, अस्मिता, इतिहास, जीवन मूल्य, संस्कृति, परंपरा, प्रकृति मुक्ति, मानव मुक्ति जैसे मुख्य बिंदुओं को लेकर पिछले पाँच वर्षों से “बाल संस्कार केन्द्र” की स्थापना की गई है।

समाज हित कार्य करने वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना एवं उनके प्रेरणादायी इतिहास को आगे ले जाना समाज का कर्तव्य है। अच्छे प्रेरणादायक विचारों और कार्यक्रमों को समाज में आगे ले जाने का ज़िम्मा भी समाज का ही है।

समाज में अच्छे काम करने वाले लोगों की कमी नहीं है। समय के साथ परिवर्तन के चलते बहुत से लोग समाज में अच्छे काम कर रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले में स्थित निम्स अस्पताल के डॉक्टर राजेश जी वसावे। उन्होंने अपनी माँ की प्रेरणा से सिविल अस्पताल के सेवा काल में दिन-रात मेहनत कर हज़ारों गरीब आदिवासियों के ऑपरेशन करके उनकी जान बचाई है।

सरकारी सेवा के साथ-साथ समाज में उच्च शिक्षा जैसे मेडिकल, आई.ए.एस., पी.एच.डी., इंजीनियरिंग, साइंस पढ़ने वाले गरीब आदिवासी छात्रों को यथासंभव मदद की है। साथ ही, विभिन्न संगठनों के सामाजिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों को अपनी कमाई के हिस्से से खुले हाथों आर्थिक सहयोग देते आए हैं।

आज के समय में ऐसे कई लोग हैं जो अपने समाज के अस्तित्व के लिए काम कर रहे हैं।

परमार्थ के संस्कार परिवार से मिलते हैं।

राजेश जी की माँ के संस्कारों की प्रेरणा से समाज में सामाजिक मूल्यों को दिशा मिली है। बाँटकर खाना, जीवन देना जैसे मानवीय मूल्यों को उजागर करने में आपकी और आपकी माँ की भूमिका को समाज हमेशा याद रखेगा।

आदिवासी एकता परिषद का वैचारिक आंदोलन जब भी आर्थिक रूप से दुविधा में आया है, तब भी आपने खुलकर मदद की है। रेनवा भराड़ा, गुजरात में हुए सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन का कर्जा उतारने में भी आपकी भूमिका रही है। समाज के हितचिंतकों में आप निडर चिंतक हैं, इसके लिए हम आपके कृतज्ञ हैं।

आपकी माँ के संस्कारों की प्रेरणा को आगे ले जाने के लिए आदिवासी एकता परिषद के नेतृत्व में “आदिवासी बाल संस्कार केन्द्र” की स्थापना “रोज मेरी माँ” के नाम से की गई।

कुछ साथियों को केन्द्र संचालक सांगल्याभाई वलवी ने असमंजस में डाल दिया। कई साथियों को ऐसा लगा कि यह बाल संस्कार केन्द्र मिशनरी द्वारा चलाया जा रहा है। जबकि आदिवासी समाज सभी धर्मों में है। धर्मों के प्रभाव में नाम भी रखे जाते रहे हैं – रामसिंह भी है, रहीम भी है, रोज मेरी, रुकसाना और रुमानी भाई भी हैं।

सुधार के नाम पर और धर्म के नाम पर हमारे सामाजिक नामों का निकंदन हो गया है। समाज की मूल पहचान लगभग समाप्ति की ओर है। जैसे मेरा नाम “सांगलिया”, मेरे गाँव में आदिवासी पहचान का आखिरी नाम है। अच्छे काम करने वालों के आदिवासी नाम ढूँढना आज मेरे लिए असंभव है। बड़े और अच्छे काम करने वालों के नामों में बदलाव आ गया है। नाम कोई भी हो सकता है।

नाम बदलने से यदि आदिवासी मिट जाता, तो पूरे भारत में मेरे जैसे बहुत कम आदिवासी होते। आरक्षण हमारा होता, जल-जंगल-ज़मीन हमारी होती। हम आदिवासी नाम वाले आदिवासी मालामाल होते। आदिवासियों में से एक माँ रोज मेरी हैं।

आदिवासी एकता परिषद और इसके कार्यकर्ता सांगल्याभाई वलवी का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है। आदिवासी एकता परिषद मानव धर्म में मानती है, इसलिए मैं भी मानव धर्म में ही मानता हूँ। सबकी जानकारी के लिए इतना कहना पर्याप्त है।

केन्द्र का मुख्य उद्देश्य यह है कि गाँव के बच्चे, अच्छे और समयानुकूल संस्कारों के साथ शिक्षा ग्रहण करें। आदिवासी समाज का आचरण दुर्लभ होता जा रहा है। हमारे पूर्वज केवल कहते नहीं थे, बल्कि आचरण में मानते थे। सीखने का क्रम पारंपरिक व्यवहारों से शुरू हो जाता था। अमल के लिए शिविर नहीं होते थे। पूर्वजों ने पारंपरिक पद्धति को जीवन पद्धति में ही छोड़ (या जोड़) रखा है।

आदिवासी के त्योहार, उत्सव, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक सभी पहलुओं में समूह, श्रम और सहकार जैसे मूल्यों का अस्तित्व है। वर्ष में तीन ऋतुएँ होती हैं। वर्षा ऋतु के अलावा शेष आठ महीनों में आदिवासी इलाकों से रोज़गार हेतु पलायन होता है। गाँव छोड़कर जाने वाले परिवारों के बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। मजबूरी और गरीबी के कारण बच्चों को पढ़ाना कठिन होता जा रहा है।

परिवर्तन के चलते अनपढ़ होना जीवन के हर पहलू में रुकावट बन सकता है। इसलिए आज के समय में शिक्षा आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उमजा गाँव में “रोज मेरी माँ” के नाम से आदिवासी एकता परिषद के तत्वावधान में बाल संस्कार केन्द्र की शुरुआत की गई।

गाँव के बच्चे, जो पहली से पाँचवीं कक्षा में पढ़ते हैं, उन्हें सुबह स्कूल से पहले दो घंटे-आठ बजे से दस बजे तक अपनी बोली-भाषा में सरल तरीके से गुजराती, हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित पढ़ाया जाता है।

गाँव में रहने वाले परिवार कृषि और पशुपालन से अपना गुज़ारा करते हैं। अपने खेत का काम पूरा होने के बाद परिवार की अन्य ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे के यहाँ मज़दूरी करते हैं। मज़दूरी या खेत के काम के लिए महिला-पुरुष सुबह आठ बजे के बाद गाँव छोड़ देते हैं। घर पर रह गए बच्चे स्कूल के फ़ाजिल समय में खेलते हैं या इधर-उधर घूमते हैं।

एक तरफ शहर के छात्र सुबह सात बजे से ट्यूशन में होते हैं। धीरे-धीरे गाँव के बच्चों का स्तर शहर के बच्चों से बहुत नीचे होता जा रहा है।

आदिवासी समाज के ही कई लोग आरक्षण के चलते तहसील, ज़िले और हाट-बाज़ार वाले क्षेत्रों में स्थायी निवास करते हैं, जहाँ शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था है। आगे चलकर वे आरक्षण का लाभ लेते ही रहते हैं। गाँव-गाँव पढ़े-लिखे साथियों की कमी नहीं है। हर गाँव में सभी विषयों के जानकार साथी भी हैं। ऐसे में समाज में अच्छी शिक्षा देना और होनहार छात्र तैयार करना गाँव के पढ़े-लिखे साथियों की ज़िम्मेदारी है।

देश और दुनिया में युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर कम हो रहे हैं। बेरोज़गारी बढ़ रही है। जबकि आदिवासी समाज के पास जीवन जीने के लिए संसाधनों की कमी नहीं है। सबके पास ज़मीन है। हमारे पूर्वजों ने संसाधनों के साथ पारंपरिक ज्ञान भी जोड़ा है। हमारे गाँव में हम सब रोज़गार कर सकते हैं, ऐसी व्यवस्था थी जो विकास के नाम पर तकनीकी क्रांति और मशीनों ने ले ली है। सबके अपने-अपने काम थे।

गाँव में कपड़ा बनाना, डोर बनाना, जूते बनाना, वैद्य, सुनार, लुहार, हजाम (हजामत करने वाला), ग्वाला (मवेशी, जानवर चराने वाला), औज़ार (तमाम प्रकार के) बनाने वाले-सभी काम होते थे।

मतलब तमाम प्रकार की ज़रुरतें हम गाँव में ही तैयार कर लेते थे, वह भी स्थानीय संसाधनों से। इसमें शोषण कम था। हम एक दूसरे पर अवलंबित थे। संसाधनों का भी अत्यधिक शोषण नहीं होता था। पुनः निर्माण की परंपरा थी।

भविष्य को देखते हुए ऐसा लगता है कि हमारी पुरानी गाँव व्यवस्था को फिर से लाने का समय आ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण हो रहा है, जो अधिक समय तक नहीं चलेगा। इसलिए अगली पीढ़ी को प्रकृति के साथ विवेक, सद्भाव और संवेदना सिखाने की ज़िम्मेदारी को समझते हुए बाल संस्कार केन्द्र में पारंपरिक ज्ञान सिखाया जा रहा है।

बाल संस्कार केन्द्र के बच्चों को स्थानीय संसाधनों से रोजगार के अवसरों का ज्ञान भी दिया जा रहा है। जैसे-ठाकरे के पत्तों से बाज बनाना, खट्टी भिंडी के पौधों की छाल से डोर बनाना। इस तरह लकड़ी, बेल, पत्ते, मिट्टी, पत्थर आदि स्थानीय संसाधनों से उत्पन्न रोजगार के अवसरों से बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान सिखाया जाता है। तंदुरुस्त समाज के निर्माण और कुपोषण जैसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए स्थानीय कुदरती फल, जो पहले जंगलों में आसानी से मिलते थे, आज धीरे-धीरे वे सब लुप्त होते जा रहे हैं। ये फल गरीब से गरीब तबके को भी मुफ्त में मिल जाते थे। बारिश, ठंड और गर्मी- हर मौसम में फल उपलब्ध रहते थे।

आज डॉक्टर फल और दूध खाने की सलाह देते हैं, लेकिन गाँव की आय के हिसाब से उन्हें खरीदना संभव नहीं हो पाता। इसलिए इन नन्हे मासूम बच्चों को स्थानीय कुदरती फलों से परिचित कराया जा रहा है और उनका उपयोग कैसे किया जाए, यह भी सिखाया जाता है। साथ ही आदिवासी बोली में, हिंदी, गुजराती और जहाँ संभव हो अंग्रेज़ी में भी इन फलों के नाम सिखाए जाते हैं।

एकता परिषद के शुरुआती बुज़ुर्ग कार्यकर्ताओं में से एक मनोज भाई चौधरी ने सातपुड़ा क्षेत्र से लेकर डांग, तलासरी, महाराष्ट्र तक के जंगल और मैदानी क्षेत्रों का सर्वे कर 120 प्रकार की भाजियाँ खोज निकाली हैं, जिन्हें हमारे पूर्वज बारहों महीने ताज़ा और सभी प्रकार के विटामिन के साथ खाते थे। इनमें से कई भाजियाँ आज भी उपलब्ध हैं और आदिवासी समाज में खाई जाती हैं।

सातपुड़ा पहाड़ी क्षेत्र के महाराष्ट्र के मोलगी-कंजाला गाँव के आदिवासी कार्यकर्ता रामसिंह दादा “रानभाजी” नाम से स्थानीय कुदरती भाजियों के महत्व और पकाने के तरीकों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस क्षेत्र में लगभग 47 प्रकार की भाजियाँ पाई जाती हैं।

बाल संस्कार केन्द्र के बच्चों को स्थानीय साथियों से परिचित कराकर भाजियाँ पकाने और खाने के तरीके सिखाने का प्रयास निरंतर जारी है। विस्तार में पैदा होने वाले धान-धान्य, पेड़, वन्य औषधि, पारंपरिक व्यंजन और पारंपरिक कृषि पद्धतियों से बच्चों को परिचित कराया जा रहा है।

साल भर में होने वाले पारंपरिक आदिवासी त्योहार जैसे-

इसी प्रकार देव दिवाली, गींदल, होली आदि त्योहार भी मनाए जाते हैं।

इन सभी त्योहारों और देव पूजा के माध्यम से आदिवासी जीवन मूल्यों का साक्षात आत्मसात होता है। उसके बारे में केंद्र के बच्चों को सभी स्थानों पर, प्रसंगों पर, पूजा में लगने वाली तमाम सामग्री और गाँव पटेल, गाँव पुजारी, गाँव कामदार के रुबरु क्रमबद्ध तरीके के साथ सिखाया जाता है। इसके अमल पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।

आदिवासी त्योहार और देव पूजा में छुपे आदिवासी जीवन मुल्य, मानवीय मूल्यों की अनुभूति, जैसे- कोई भी धान पकने के बाद खुद के पहले दूसरों को देना। परोपकार (सबको अपना-अपना भाग लेना), बांट कर खाना (अकेले नहीं सब साथ में मिलाकर खाना) चूँकि जो आनन्द बांटने में है वह संग्रह करने में नहीं है। हिल मिल के जीना। समानता – बिना भेदभाव से एक जगह इकट्ठा होना। एक पंगत में बैठकर खाना।

गाँव दिवाली और वाग्देव के अवसर पर सबसे पहले पांच डाया (पंच) को भोजन परोसा जाता है। गाँव के ग्वाले से लेकर मुड़िया तक सभी को एक पंगत में बैठाया जाता है। बिना भेदभाव एक साथ खाना आदिवासी जीवन का मूल मूल्य है। इतना कि खाने के बाद बीड़ी या चिलम का कश भी सब एक के बाद एक लेते हैं।

सहकार। बिना दाम, बिना भेद सौंपा हुआ काम आनन्द के साथ स्वीकारा जाता है। किसी को सौंपना नहीं पड़ता।

संतोष और समाधान। बली आदि चढ़ाई जाती है और उसका पकाया हुआ मीट जब परोसा जाता है तब किसी के हिस्से में सिर्फ हड्डी भी आती है, इसे फिर्याद नहीं आस्था के साथ ग्रहण किया जाता है। कम जादे को स्थान नहीं है।

घर-घर पके हुए व्यंजनों को खाने के पहले पाल के रूप में बांस की टोकरी में परिवार में पहुँचाने का रिवाज़ है। साल भर में परिवार में छोटे-बड़े झगड़े, मनमानी के प्रसंग बनते रहते है। बहनें जब पाल देने पहुंचती है तो मनमानी, झगड़े से हुई दूरी अपने आप समाप्त हो जाती है। आने-जाने का, मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कोई नहीं कर सके वह समाधान परंपराओं में है।

साल भर में सामाजिक व्यवहार और कार्यक्रम भी होते हैं – छठ पूजा, क्रियाकर्म, विवाह आदि। बाहरी सभ्यता और धार्मिक और वैचारिक आक्रमणों से सामाजिक व्यवहार बदल रहे हैं, जिससे समाज में शोषण और आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है।

छठ पूजा (स्थानीय बोली में पेत्रा): जन्म के बाद के छठे दिन दायन (हियारी) अकेली ही सब विधि पारंपारिक रुप से कर लेती है। पांच बालकों को पंगत में बिठाकर दाल,चावल, सब्जी परोसा जाता है। खाना खाने के बाद रिवाज अनुसार बालक दरवाजा खोलकर भागते है जिन्हें छोटी लकड़ी से मारा जाता है। बाद में दायन को पका हुआ खाना (टोकरी में) दिया जाता है, कुछ नकद राशि चार-पांच ही रुपया दिया जाता है।

गाँव-पड़ोस की महिलाओं को जो पीती है, उन्हें खाकरे के पत्तों में देशी दारु देकर छाक पाडने की परंपरा है। बाद में उन्हीं पत्तों में पीने के लिए दारु दिया जाता है। दो चार बोतलें और कुछ चावल, दाल, सब्ज़ी से काम पूरा हो जाता है। किन्तु कुछ परिवारों में धीरे-धीरे बाहर की विचारधारा के बदलाव के चलते विधि के खर्च बढ़ गये हैं। हज़ार-दो हज़ार से होने वाली छठ की विधि अब दस-बीस हज़ार में भी होने लगी है। इससे गरीब परिवार प्रभावित हो रहे हैं। केन्द्र के बच्चों को इन विधियों में शामिल कर पारंपरिक सामाजिक स्वावलंबन का महत्व समझाया जाता है।

क्रियाकर्म, विवाह आदि सामाजिक व्यवहारों के बारे में हमारे स्वावलंबन के बारे में सिखाया जा रहा है।

आदिवासी एकता परिषद के तत्वावधान में दो मुख्य बिंदुओं पर कार्य किया जा रहा है-

गाँव में कोई अनपढ़ न रहे के अंतर्गत बाल संस्कार केन्द्र में बड़ी उम्र के लोगों के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था है। केंद्र के ही पड़ोस में रहने वाला रवि, जो गरीबी के कारण बचपन से ही मज़दूरी कर रहा है और स्कूल नहीं जा सका। बाल संस्कार केन्द्र को पढ़ाते वक्त, वह खिड़की के पास बैठकर शिक्षा ग्रहण करता रहा। कुछ समय बाद रवि पढ़ना-लिखना सीख गया। ऐसे कई ‘रवि’ हर गाँव में अनपढ़ है जो उम्मीद के होते हुए भी पढ़ नहीं पाते।

गाँव में कोई भूखा न रहे – विस्तार के हिसाब से 19वीं सदी के अंत तक बारिश आधारित खेती के साहाब से बारिश पर अवलंबित रहना पड़ता था। सरकारी प्रयासों के बल विस्तार में कुएं आदि से, इंजन और बिजली के आगमन से हर सीजन खेती की उपज और जो परिवार मज़दूरी पर ही निर्भर थे उन्हें बारह महीने रोज़ी उपलब्ध है। कुछ परिवार ज्यादा मज़दूरी के दाम के चलते आम में बढ़ोतरी हेतु पलायन कर रहे हैं।

हाँ, कुछ मजबूर आज भी हर गाँव, हर जगह हैं। कुछ निराधार संतान है। जिन्हें मुख से लड़ने का समय आ ही जाता है। कुछ माएं ऐसी हैं जिन्हें बेटे होते हुए भी वक्त पर खाना नहीं मिलता। ऐसे ज़रूरतमंदों के लिए केन्द्र के बच्चों के साथ मिलकर पिछले पांच सालों से निरंतर, माह में एक बार गाँव के हर परिवार से मुट्ठी-मुट्ठी चावल, गेहूं, दाल इकट्ठा कर, गांव के एक ज़रूरतमंद परिवार को देने का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। केन्द्र के बच्चों के निर्णय के बाद अब बच्चे ही अपने घर से हर माह जमा करके दे देते है। केन्द्र की ओर से अब तक कुल मिलाकर हर माह के हिसाब से 60 ज़रुरतमंदों को मदद की है।

इनमें एक उदाहरण इस तरह है – एक परिवार है (नाम नहीं बताते हुए) का इकलौता बेटा टी.बी. का मरीज़ है। बहू सौराष्ट्र में मज़दूरी के लिए गयी है। बेटे की तीन बेटियां है, बड़ी बेटी आश्रमशाला में छठी कक्षा में पढ़ती है। बाकी की दो बेटियां घर पर दादी के साथ रह कर गाँव की पाठशाला में पढ़ रही हैं। बेटे का गुज़ारा भी बूढी माँ ही करती हैं। एक बूढी माँ पर तीन मजबूरों का ज़िम्मा है।

मज़दूरी के अलावा काम का अन्य साधन नहीं है। है न माँ की हिम्मत? केन्द्र में जमा धान्यों को देने के वक्त आदिवासी एकता परिषद के संस्थापक सदस्य आपवासी दरबार सिंग दादा आ गये। उस माँ को दादा के हाथों चावल, दाल और गेहूं जो 20 किलो के आसपास था, दिया गया। माँ बोली; दारु बा.. (वहाँ के लोग दरबासिंग दादा को दारु बा के नाम से बुलाते हैं/थे अब नहीं रहे) तीन महीने से रोज़ मज़दूरी जा रही हूँ, एक भी दिन आराम नहीं है… दादा मैं अब दो-चार दिन आराम करुंगी… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! कहते-कहते वो बूढी माँ रो पड़ी। हम सबके भी आंसू निकल पड़े। कैसी भी मुसीबतों में मैंने दादा को रोते नहीं देखा था…..आज वो भी रो पड़े और बोले “सांगलिया भाई काम चालू ही रखना, कभी बंद नहीं करना।”

संगठनों के कार्यकर्ताओं के लिए गाँव में ही बहुत सारे काम है, कार्यक्रम भी है, आपको सिर्फ कार्यरत होने की ज़रूरत है। काम लेकर लोगों तक जाने की ज़रूरत है। समाज इन्तज़ार कर रहा है। मुझे यह बात पक्की समझ में आ गयी ।

केंद्र के बच्चों में बचत की भावना को बढ़ावा देने हेतु बचत बैंक चालू की है। बैंक ‘अमरसिंगभाई चौधरी’ के नाम पर चलाते हैं। अमरसिंग भाई आदिवासी हैं। उन्होंने दक्षिण गुजरात के आदिवासी क्षेत्र के सूरत, भरुच, वलसाड, नवसारी, डांग ज़िलों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सहकारी प्रवृत्तियों से समाज में आर्थिक स्वावलंबन के लिए सहकारी बैंक, दूध संघ बनाकर कृषि एवं कृषि संलग्नक पशुपालन के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। वे सूरत डिस्ट्रिक्ट बैंक में वाईस चेयरमैन के पद पर कई सालों तक सेवारत रहे हैं। उन्होंने दूध संघ के साथ समन्वय करके डिस्ट्रिक्ट बैंक के सहयोग से मंडलियों को लोन देकर मंडलियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से लाखों आदिवासी सभासदों को व्यवसाय से जोड़ा। आज दुग्ध व्यवसाय से जुड़े आदिवासी इलाकों की मंडलियाँ करोड़ों का टर्नओवर कर रही है। एक सभासद माह में लाखों में पेमेंट ले रहा है। इससे बंधुआ मज़दूरी करने वाले हज़ारों परिवार, गुलामी से मुक्त हो सके है।

अमरसिंग भाई की सोच समाज में आगे बढ़ें, अगली पीढ़ी को आपकी सूझबूझ और काम की तजुर्बेकार बातें काम आये, आदिवासी बच्चे आपसे प्रेरित होकर आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में बचपन से सोचें इसलिए “अमरसिंग भाई झेड चौधरी बाल बैंक” नाम रखा गया। माँ-बाप अपनी संतानों को रोज पांच-दस रुपए देते हैं। उन पैसों से संतानें वेफर, चॉकलेट, बिस्कुट आदि खरीदकर खाते हैं।

जंकफूड (वेफर आदि) से कई बिमारीयाँ होती हैं, ऐसे मेसेज रोज़ मिलते रहते हैं। आदिवासी क्षेत्रों के गाँवों में ज़रूरत की चीज़ों से बढ़कर वेफर ज़्यादा होते हैं। पूरी दुकानें वेफरों के हारों से भरी होती हैं। तरह-तरह के नमकीन, तीखे, खट्टे, मीठे सब स्वादों में बने होते है। पैकेट का डिजाइन आकर्षक होता है। इस्तेमाल करने की मुदत की अवधि के बाहर की चीज़ें आदिवासी क्षेत्र में बेची जाती हैं। रंगीन, आकर्षक पेकेज से बच्चे हर चीज़ को खरीद लेते हैं, खा जाते हैं।

इन सब चीज़ों से सेहत को नुकसान होता है, इसके बारे में बच्चों को समझाया जाता है। बचपन से बचत के बारे में पक्की समझ देने के लिए उदाहरण देकर माँ-बाप की तरह से कड़ी मेहनत करके मज़दूरी से मिले पैसों को थोड़ा-थोड़ा बचाने को कहा जाता है। चाहे वो कितनी भी राशि हो – एक, दो या पांच रुपए, आदि को बचत स्वरूप जमा करने से शुरू किया जाता है। बचाए हुए पैसों से शिक्षा, साहित्य, पेन, पेंसिल, नोटबुक, स्लेट, रबर और किताबें खरीदकर इन्हीं बच्चों को दी जाती हैं। 

गाँव डाबरीआंबा के रिटायर्ड शिक्षक महोदय इन्द्र सिंह भाई ने बच्चों के शिक्षा साहित्य हेतु रु 2100 दान में दिये थे। उस पैसे से सामान रखने के लिए पेटी (लोहे का बॉक्स) और साहित्य खरीदा गया। कोई भी चीज़ की ज़रूरत होती है तो बच्चे अपने घर नहीं, सीधे बाल संस्कार केन्द्र पर आकर ले जाते हैं। और पॉकेट के खर्च के पैसे जमा कर देते हैं। मज़दूरी के लिए बाहर रह रहे लोगों के बच्चे पैसा नहीं भी जमा करते हैं तो चला लेते हैं। माँ- बाप के वापस आने के बाद कुछ बच्चे पैसा जमा कर देते हैं।

बहुत बड़े पैमाने पर आदिवासी समाज में लोग बैंक के साथ कम व्यवहार करते हैं, अपनी आमदनी से चांदी, सोना आदि खरीदते हैं।

ज़रूरत पड़ने पर साहूकारों के यहाँ गिरवी रखकर ज़रूरी रकम लेकर समय निकाल लेते हैं। पैसों के बंदोबस्त हो जाने पर ब्याज देकर चांदी-सोने के सामान को छुड़ा लेते हैं। जीवन में बचत के महत्व को समझने के लिए और अच्छी सेहत के लिए बाल बैंक इस रूप से कार्य कर रही है। बच्चों के लिए इतना काफी है।

बाल संस्कार चलाने के पांच सालों के समय काल में, केंद्र की मुलाकात हेतु समाज प्रेमी, शिक्षा प्रेमी साथियों ने बच्चों को ज्ञान-दान, धान्यों का दान, नकद दान दिया है और मेरा उत्साह बढ़ाने में मदद की है। ऐसे साथियों का मैं आभारी हूँ। पांच सालों के अंतराल में केंद्र के बच्चों की ओर से होने वाले कार्यक्रमों जैसे बिरसा मुंडा जयंती, विश्व आदिवासी गौरव दिवस, डॉक्टर बाबा साहेब जयंती, वन दिवस, पृथ्वी दिवस जैसे कार्यक्रमों में जब भी गाँव का सहयोग मांगा, तो पूरा सहयोग हमेशा मिलता रहा है, जिसके लिए मैं गाँव का आभारी हूँ।

Author

  • सांगलिया भाई वलवी गुजरात के निवासी हैं और आदिवासी एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। वे आदिवासी समुदायों से जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवनगत मुद्दों पर निरंतर सक्रिय रहे हैं, विशेष रूप से आदिवासी संस्कृति, ज्ञान, मूल्य और परंपराओं को समुदाय के भीतर, खासकर बच्चों और युवाओं तक पहुँचाने पर उनका कार्य केंद्रित है।

    View all posts
Exit mobile version