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आदिवासी समाज में फैले जातिवाद से बिखरते प्रेम के दो सुरमे

अंतरसिंग निगवाले:

धूप से तपे पहाड़ों के बीच,
मोड़दार पगडंडी पर,
दो कच्चे दिलों ने एक-दूसरे को पहचाना-
वह बारेला आदिवासी लड़का,
और वह भिलाला आदिवासी लड़की,
जैसे जंगल में पहली बारिश की गंध
और सूखी मिट्टी का पहला स्पर्श।

दोनों के प्रेम में कोई छल नहीं,
कोई स्वार्थ नहीं-
बस वही मासूमियत,
जो केवल आदिवासी मिट्टी ही जन्म देती है।

पर समाज के आंगन में
एक पुराना सा ज़हर पल रहा था-
जातिवाद का ज़हर,
जो पीढ़ियों से रिश्तों की जड़ों को कुतरता आया है।

उनका प्यार गहरा था,
इतना गहरा कि
जंगल के कुओं की तली भी सतही लगे।
पर जब दोनों ने
एक-दूसरे का हाथ पकड़ा,
तो समाज की चौपालों में फुसफुसाहटें,
ज़हरीली चींटियों की कतार की तरह
उनके पीछे लग गईं।

“बारेला और भिलाला?
ये कैसे हो सकता है?”
यह सवाल नहीं,
एक ताना था-
एक ऐसा ताना जिसने
दोनों के जीवन को
खतरे की ओर धकेल दिया।

समाज ने इज़्ज़त के नाम पर
रिश्तों की हत्या करने का
अनौपचारिक अधिकार
अपने पास ही रख लिया है।
उन्हें डर था-
यदि दोनों मिले,
तो उनका जीवन ही नहीं,
बल्कि “हमारी जात” की मर्यादा भी टूट जाएगी।

पर प्रेम कहाँ जात पूछता है?
प्रेम तो उन जंगलों की हवा है
जो सबके फेफड़ों में समान चलती है।

लड़के ने कहा-
“हमारे पूर्वजों ने जंगल बचाया,
पहाड़ संभाले,
नदियों का रास्ता तय किया-
पर हम अपने ही दिलों का रास्ता
कैसे नहीं तय कर सकते?”

लड़की ने आंखों में आँसू लिए कहा-
“हमारा प्यार गलत नहीं,
ग़लत वो नज़रें हैं
जो हमें बांटती हैं।”

दोनों जानते थे-
साथ रहेंगे तो मर सकते हैं,
पर बिछड़ गए तो
जीते जी खत्म हो जाएंगे।

समाज के तानों से,
कड़वे शब्दों से,
टूटते सपनों से
दोनों का आदिवासी समुदाय भी
बदनाम होता जा रहा है।
जिस समाज की पहचान
समानता, सामूहिकता और प्रकृति-प्रेम है,
वही समाज
धीरे-धीरे
जातिगत दंभ की दीमक से
खोखला होता जा रहा है।

यह कहानी सिर्फ दो दिलों की नहीं,
पूरे आदिवासी समाज की है-
जहाँ प्रेम करने वाले
दंड के दोषी बना दिए जाते हैं,
और जातिगत दीवारें
अपनों को ही पराया कर देती हैं।

आज ज़रूरी है
कि यह समुदाय
अपनी जड़ों को याद करे-
जहाँ मनुष्यता सबसे बड़ी पहचान थी,
जहाँ रिश्ते जन्म नहीं,
व्यवहार से बनते थे।

वरना
बारेला–भिलाला के ये दो सुरमे
जो प्रेम के गीत गा सकते थे,
समाज के डरों और जहरों में
खत्म हो जाएंगे-
और इतिहास में बच जाएगी
बस एक पंक्ति-
“दो दिल जातिवाद से हार गए।”

परिवर्तन की शुरुआत
उन्हीं कहानियों से होती है
जो दर्द के साथ लिखी जाती हैं।

Author

  • अंतरसिंग, मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से एम.टेक. किया है। वर्तमान में वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की जनजातीय अध्ययनशाला में अध्ययनरत हैं।

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