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काग़ज़ों में जंगल – एक कविता

जय श्रेया:

कभी धूप थी, कभी छाँव थी,
वो ज़मीन हमारी पहचान थी।
पीढ़ियों से सँभाला जंगल है,
अब कहते हैं, ये सरकारी आन है।
हमने रास्ते नहीं, रिश्ते बनाए,
हर पेड़ में अपनी साँस बसाई।
पर अब नोटिस आया है हाथ में,
लिखा है, “तुम्हारा दावा अधूरा है भाई।”
काग़ज़ माँगे वो, जो मिट्टी में गुम हैं,
हस्ताक्षर माँगे उन हाथों से, जो हल थामे हुए हैं।
सालों से चलती ये फ़ाइलें सोती हैं,
गाँव की थकी हुई उम्मीदें फिर लौट आती हैं।
कभी सुनवाई टल जाती है,
कभी “जाँच अधूरी” बताई जाती है।
कभी नाम छूट जाते हैं सूचियों से,
जैसे जीवन की पूरी कहानी मिटा दी जाती है।
जंगल अब भी वही हैं,
बस अधिकारों पर ताले लगे हैं।
हम अब भी लकड़ी नहीं, न्याय माँगते थे
आज भी अपने पुरखों की धरोहर के हक़ माँगते हैं।
कानून बना, पर न्याय कहाँ?
फ़ैसले से पहले भूख मरती है यहाँ।
फिर भी उम्मीद की लौ जलती रहती है,
क्योंकि जंगल अब भी हमसे कहता है
“तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ।”

Author

  • श्रेया, बिहार से हैं और वर्तमान में दिल्ली में एक संस्था के साथ काम कर रही हैं। उन्हें फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और लिखने का शौख है। वह अपनी रचनाओं और प्रलेखन में अपने अनुभवों और अवलोकन को सरल तरीके से दर्शाना पसंद करती हैं।

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