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सफ़र की मुलाकात

संजीव कुमार:

यह बात जनवरी 2024 की है जब मौसम में हल्की-हल्की सर्दी पड़ रही थी। मुझे ग्वालियर से दिल्ली के लिए किसी ज़रुरी काम से जाना था। मेरी ट्रेन की टिकट S4 कोच की गेट वाली सीट पर थी। डिब्बा स्लीपर था, पर हालत कुछ ऐसी लग रही थी मानो यह जनरल डिब्बा हो! बहुत अधिक भीड़ भरी हुई थी।

इसी बीच, दो ट्रांसजेंडर ट्रेन में चढ़े और यात्रियों से पैसे मांगने लगे। जिनमें से कोई तो 10-20 रूपए दे देता तो कोई कहने लगता, दे दो यार, नहीं तो तमाशा करेंगे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने रुपए देने से साफ़ इनकार कर दिया और उन ट्रांसजेंडर पर चिल्लाने लगे –

 “किस बात के पैसे मांग रही हो? भगवान ने दो हाथ-पैर दिए हैं, कोई काम क्यों नहीं करतीं? शर्म नहीं आती?

उनकी इन बातों को सुनकर भीड़ में से और भी लोग बोलने लगे, ये तो कहीं भी आ जाते हैं, शादी में, बच्चा होने पर, घर बनवाने पर, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और लोगों को परेशान करते हैं पैसे मांगकर।

उनकी बातों को सुनकर मुझे भी लगा, हाँ, लोग गलत तो नहीं कह रहे। बाकी लोग तो मेहनत से पैसे कमाते हैं और ये तो बिना मेहनत के पैसे मांग लेते हैं। मेरे मन में भी ऐसे कईं सवाल उठने लगे।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरे उन सवालों का जवाब इतनी जल्दी मिल जाएगा।

उन दोनों ट्रांसजेंडर में से एक बोली – “आप कह तो सही रहे हो, पर ये भी सही है कि हम शादी, बच्चा होने या स्टेशनों पर आकर पैसे मांगते हैं। हमें भी अच्छा नहीं लगता इसे मांगना, यह भी भीक ही है। लेकिन कभी आपने सोचा है हमें ऐसा क्यूँ करना पड़ता है, इसके पीछे वजह क्या है? कहीं न कहीं इसके लिए आप सब लोग ही जिम्मेदार हैं।”

वह आगे बोली “जब किसी घर में बच्चा पैदा होता है, तो परिवार खुश होता है। लेकिन अगर पता चल जाए कि बच्चा ट्रांसजेंडर है, तो वही खुशी एक बोझ बन जाती है। हमें श्राप समझा जाता है। कोई अपनाता नहीं। अगर हमें प्यार और शिक्षा दी जाती, तो आज हम भी किसी मुकाम पर होते – शायद डॉक्टर, इंजीनियर, या साइंटिस्ट होते। पर इस समाज ने हमें अलग कर दिया, हमारी पहचान को ही नकार दिया।

और अगर कोई हमें अपनाता भी है, तो हमें नौकरियों से वंचित रखा जाता है। जब काम नहीं मिलेगा, तो पेट कैसे पालें? मजबूरी में हमने ये रास्ता चुना – जहाँ हम लोगों को आशीर्वाद देते हैं और लोग हमें कुछ चंद पैसे दे देते हैं।

अगर आप सच में चाहते हो कि हम ऐसा ना करें, तो समाज को बदलो, हमें अपनाओ, हमें भी अवसर दो, फिर देखना, हम भीख नहीं मांगेंगे। हो सकता है कि इस देश के सबसे बड़े वैज्ञानिक या डॉक्टर हममें से ही कोई निकले।”

इतना कहकर वो दोनों वहाँ से चले गए।

मैं एकदम स्तब्ध रह गया। उस पल मुझे अहसास हुआ कि हाँ, कहीं न कहीं हम समाज के लोग ही दोषी हैं। अगर हमने उन्हें अपनाया होता, सम्मान दिया होता, शिक्षा और अवसर दिए होते तो शायद आज उन्हें इस स्थिति में ना आना पड़ता।

जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, सबको समान अधिकार नहीं देंगे तब तक समाज में ऐसी कुरीतियाँ और गहराती जाएंगी।

उस दिन की वह बातचीत आज भी मेरे दिल और दिमाग में गूंजती है। उस दिन मुझे पहली बार गहराई से समझ आया कि समाज की सच्ची तरक्की तब होगी जब हम हर इंसान को चाहे वह किसी भी पहचान का हो, बराबरी और इज्जत देंगे। 

उस सफ़र में, उनसे मुलाक़ात ने मेरे जीवन पर बहुत गहेरा प्रभाव डाला जिससे मेरा समाज को देखने, सोचने समझने का नज़रिया बदल गया।

आज भी वो पल मेरी यादों में जिंदा है – “एक सीख बनकर, एक गहेरी सचाई बनकर”।

फीचर्ड फोटो आभार : बीबीसी

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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