छोटू सिंह रावत :
राजस्थान के अजमेर ज़िले के नारेली गाँव की रहने वाली सोनू योगी ने अपने हौसले, आत्मविश्वास और मेहनत के दम पर एक नई पहचान बनाई है। नारेली गाँव से लगभग 4 किलोमीटर दूर खेतों में रहने वाली सोनू की शादी, फिर पढ़ाई का रुक जाना, और शादी के बाद परिवार की ज़िम्मेदारियों में उलझ जाना — सोनू की कहानी भी पहले आम लगती थी, लेकिन उनका संघर्ष उन्हें खास बना गया।
शादी के बाद दादा ससुर की मृत्यु और सास का अकेलापन, फिर पारिवारिक संकोचों में घिरी सोनू को जब बेटी हुई, तब उन्होंने अपने व्यवहार और संयम से घरवालों का भरोसा जीता। इसी विश्वास ने उन्हें सेन्टर फाॅर लेबर रिसर्च एण्ड एक्शन संस्था द्वारा ईंट भट्टे पर बालवाड़ी केंद्र में नौकरी तक पहुँचाया।
सोशल मीडिया से बदली पहचान
बालवाड़ी में काम करते-करते सोनू ने इंटरनेट की ताकत को पहचाना। सोशल मीडिया पर छोटे-छोटे वीडियो अपलोड करने शुरू किए। देखते ही देखते इंस्टाग्राम पर 1 लाख से अधिक फॉलोअर्स और फेसबुक पर 70 हज़ार से ज़्यादा फॉलोअर्स हो गए। आज सोनू जहाँ भी जाती हैं, लोग उन्हें पहचानते हैं – “आप तो वही हो ना जो वीडियो बनाती हैं!”
सोनू बताती हैं कि कभी-कभी सोशल मीडिया पर बुरे कमेंट भी आते हैं जो दुख देते हैं, पर उनके परिवार का कहना है — “इग्नोर करो, सुनो मत, फालतू लोगों पर ध्यान दोगे तो कभी आगे नहीं बढ़ सकोगी।”
केन्द्र को चलाने का ज़िम्मा सोनू योगी संभाल रही हैं। सोनू ईंट भट्टे पर आने वाले प्रवासी बच्चों को रोज़ाना पोषाहार देती हैं, रचनात्मक गतिविधियां करवाती हैं और उन्हें गीत और कविताएं सिखाती हैं। साथ ही वे गर्भवती महिलाओं और किशोरियों की स्वास्थ्य जाँच और टीकाकरण सुनिश्चित करने का कार्य भी कर रही हैं। ईंट-भट्टों पर काम करने वाले प्रवासी परिवारों के बीच सोनू एक भरोसे का नाम बन चुकी हैं। ईंट-भट्टों की धूलभरी ज़िंदगी के बीच, यह बालवाड़ी केन्द्र एक नई उम्मीद और उज्जवल भविष्य की नींव रख रहा है।
बाइक, परीक्षा और भरोसे की उड़ान
सात साल पहले छूटी पढ़ाई को फिर से शुरू कर, इस साल सोनू ने ओपन स्कूल से 12वीं कक्षा की परीक्षा दी है। परीक्षा केंद्र गाँव से 10 किमी दूर था और उस दिन कोई साथ नहीं था, तब सोनू ने खुद बाइक उठाई और लहंगे और घूंघट में ही बाइक चलाकर परीक्षा देने पहुँची। आज वह रोज़मर्रा के कामों के लिए भी बाइक चलाती हैं, जो गाँव में महिलाओं के लिए एक साहसिक कदम माना जाता है।
“अब मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं”
सोनू कहती हैं, “पहले मैं सिर्फ एक बहू थी, अब मैं एक कामकाजी महिला हूँ, एक सोशल मीडिया क्रिएटर हूँ, और एक प्रेरणा हूँ।”
वे आगे कहती हैं: “जब तक महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलेंगी, उनकी वेल्यू कोई नहीं समझेगा। अगर परिवार का भरोसा जीत लिया जाए, तो दुनिया बदल सकती है।”
अब सोनू का सपना
अब सोनू चाहती हैं कि वह कम्प्यूटर सीखे और अपने गाँव की महिलाओं को भी कम्प्यूटर सीखने के लिए प्रेरित करें ताकि गाँव की और भी महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, अपनी पहचान बनाएं और यह साबित करें कि घूंघट में छुपी महिलाएं भी एक दिन इंटरनेट और समाज दोनों की दिशा बदल सकती हैं।

