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आमू आखा एक छे! – एक कविता 

सौरभ :

हम सब..सारे लोग..
पेड़ और पौधे..
नदी और झरने,
सारे पशु..
सारी पक्षियाँ..
सारे कीड़े..और मकौड़े..
हम कितने भी अलग हों
पर हम सब एक हैं..

ये दुनिया को समझने की समझ है..
उन लोगों की,
जिन्होंने इन जंगलों को बचाया है,
बनाया है..

जिन्होंने ज़मीन से खाना पैदा करना सीखा..
जिन्होंने पानी से, और पहाड़ों से,
एक आवाज़ में समझा

कि प्रकृति और जीवन में..
सिर्फ हम इंसान नहीं है
ये दुनिया सिर्फ हमारे लिए ही नहीं है..

सब एक दूसरे पर निर्भर हैं..
एक दूसरे से सीखते हैं..
और ये..
कि सच में..
हम सब एक हैं

आमू आखा एक छे..
The slogan ‘Aamu Aakha Ek Chhe’ represents the worldview of the indigenous people. It expresses our interconnectedness, a symbiotic and useful relationship between all people, all animals, all trees and herbs, all insects, and all birds. It reveres the deep connections of each species with the physical features on our planet – to live with each other – to survive and thrive. This being of oneness treats the mountains, the rivers, the forests, the oceans – and all of life – as one. 

आमू आखा एक छे!
यह नारा आदिवासी और अन्य मूल-निवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, समझ और विवेक के बारे में बताती है। यह बताती है कि पूरी धरती और प्रकृति, उसके अनेक विशिष्ट प्रजातियों के बीच के गहरे और ज़रूरी सम्बन्ध है, और हम इंसानों को उन सबको एक और बराबर मानना है। 

Author

  • सौरभ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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