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विश्वविद्यालयों के मनसबदार : लघुकथा

नीतिशा खलखो : 

दृश्य : चाय की चुस्कियों में घुला हुआ माहौल। 

वीर : पता है कल वीसी ऑफिस में ए. पी.पी. पार्टी के लोगों ने जमकर तोड़ फोड़ की। मीडिया में दिखाया जा रहा  कि स्टूडेंट के खिलाफ प्रशासन के निर्णयों के विरुद्ध में यह सब कांड हुआ। पर जो बात तुम सभी को नहीं मालूम वह यह है कि पिछले वीसी ने जितने कंस्ट्रक्शन के काम करवाये उसमें बहुत करोड़ का घोटाला है। जिसे इस वीसी ने पकड़ा है, और वह फ़ाइल उस स्टूडेंट के तोड़ फोड़ के बाद से गायब है।

गौरव : पर यह वीसी और पहले वाली वीसी  तो एक ही खेमे के हैं, फिर ऐसे कैसे हो सकता है?

वीर : महाराज! आप रहे वहीं के वहीं, तुमने इतना खाया, यह बात हाई कमान के पास रखकर उससे और बड़ी कुर्सी चाहिए की नहीं। एक को वीसी के बाद कमीशन का चेयरमैन बनाया गया, पर किसी को  तो  और आगे की और बड़ी कुर्सी चाहिए न। किसी और बड़े आयोग की कुर्सी। तो यह जंग जायज है और आगे बढ़ रही है। 

गौरव : अच्छा! तो जल्द ही हम इस वीसी को किसी आयोग में हेडशिप करते जल्द पाएंगे !

वीर : और नहीं तो क्या ! सब्र इतना ही होता तो सभ्यताएं क्या आज यहाँ आधुनिकता और उत्तराधुनिकता के इस मुक़ाम तक पहुंच पाती ?
जल्लाद लोग,
गला काट प्रतियोगिता!
छि:।
स्टूडेंट्स  का खून पीने वाले  यह लोग।

(एक गहरी खामोशी और  लंबा सन्नाटा, गाड़ियों की आवाजाही की आवाज पर सवाल झूल ही रहे, टंगे से, अनुत्तरित)

Author

  • नीतिशा, झारखंड की रहने वाली हैं। वह वर्तमान में झारखंड के धनबाद ज़िले में स्थित बी.एस.के. कॉलेज, मैथन में विभागाध्यक्ष हैं। नीतिशा कई आदिवासी आंदोलनों, विशेषकर साहित्यिक आंदोलनों से जुड़ी हैं।

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