दीपिका माथुर और तन्नु :
बहुत याद आती है, अपने अंदर छुपी उस छोटी-सी बच्ची की,
जो शायद अब मर चुकी हैं।
वो मासूम थी, निडर थी, इस दुनिया से बेखबर थी
पर जब से जाना है इस दुनिया को, वो दुनिया नाम से ही डर चुकी हैं।
और लगता है वो अब पूरी तरह से मर चुकी हैं।
कभी ना चुप होने वाली लड़की आज गुमसुम-सी बैठी है,
लाखो सवाल है मन में, पर किसी से कुछ न कहती हैं,
और नजदीक जाओ उसके तो डरी सहमी रहती है,
जितने सवाल थे मन में,
वो अब खुद ही से कर चुकी हैं।
लगता है वो अब पूरी तरह से मर चुकी हैं।
चीखने लगती हैं वो अंदर ही अंदर,
जब याद आता उसे वो मंजर,
हर लम्हा चुभता जैसे हो कोई खंजर,
खुशी अब बस उसके लिए एक नाम है
वो याद ऐसा असर कर चुकी हैं।
लगता है वो अब पूरी तरह से मर चुकी है।
अंधेरा होते ही सांसे उसकी चढ़ने लगती हैं,
क्योंकि वो याद कड़वे सच की तरह उसके सामने आने लगती हैं,
वो चिंख्ती है जोरो से पर कोई उसका शोर सुन नही पाता है।
किसी का हाथ था उसके मुंह पर,
और इस तरह उसकी चिंखों को रोका जाता हैं।
हाथो से कर रही थीं कोशिश खुद को छुड़ाने की पर,
उसके हाथों को भी जकड़ा जाता हैं।
जैसे हो वो कोई जानवर,
इस तरह उसे बिस्तर पर पटका जाता हैं।
नही पहुंच पाए इस बार गोविंद भी
शायद इसलिए द्रोपदी को एक बंद कमरे में नग्न किया जाता हैं।
चारो तरफ था अंधेरा और थी जानी पहचानी शक्सियत,
पैरों तले जमीन निकल गई जब जानी उसने किसी अपने की ही हकीकत।
अब उस हैवान के हाथ उस बच्ची के महज शरीर या कपड़ों तक सीमित नहीं थे।
उसने तो उसकी भी हद पार की थी,
और उस मासूम की इज्जत तार-तार की थी।
फिर भी कोई शिकवा नहीं था उसे,
उस हैवान कि इंसानियत जो मर चुकी थी।
और इस तरह एक बच्ची अंदर ही अंदर मर चुकी थी।

