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घर से दूर आकर आज़ादी में कैद हो गए – कविता

नंदिनी : 

घर से दूर आकर आज़ादी में कैद हो गए
माँ की फिकर, पापा के गुस्से को बंदिश समझते थे
बाहर निकलकर पता चला यह भूल थी हमारी

सोचा था आज़ाद रहेंगे घर से अलग रहकर
पर नहीं जानते थे इतनी-सी उमर में इतने बड़े हो जायेंगे।
अभी तो बचपन था यह देखो पलक झपकते ही हम ज़िम्मेदार हो गए
और अपनी ही आज़ादी में हम क़ैद हो गए ।।

अब हर रोज सपनों के पीछे भागते रहते हैं
देर रात तक नींद नहीं आती है
न जाने क्या-क्या हासिल करना चाहते हैं
घर लौटेंगे तो शान से लौटेंगे खुदको इतना काबिल कर लेंगे
बस इसी कर गुजरने की चाह में घर से दूर हो गए हैं
और अपनी ही आज़ादी में हम क़ैद हो गए ।।

कभी-कभी अब घर जाना होता है
पर वो घर जाना भी क्या घर जाना होता है
जहाँ हर त्यौहार की तैयारी का ज़िम्मा खुद पर होता था
वहाँ अब सिर्फ टाइम पर पहुँचा जाता है।
जहाँ दिन-रात बिताया था ज़िन्दगी का
वहाँ अब घंटो के मेहमान हो गए हैं
अब हम अपनी ही आज़ादी में कैद हो गए हैं ।।

यह सफर आसान नहीं अब मालूम होता है
सुकून नहीं इस आजादी में अब पता चलता है
जहाँ आर्डर देकर सब काम हो जाया करते थे
वहाँ सब काम अब खुद से करना पड़ता है।।

अब इस आज़ादी में मन नहीं लगता है
ज़िम्मेदारी के साथ यहाँ जीना पड़ता है
इस आज़ादी में अब हम तन्हां हो गए हैं
और अपने ही घर से हम दूर हो गए हैं
नहीं जानते थे यह आज़ादी इतनी बड़ी कीमत पर मिलेगी
या फिर जिसे आज़ादी समझते थे वह असल में कैद निकलेगी ।।

Author

  • नंदिनी शर्मा बदरपुर, दिल्ली में रहती हैं । वह अभी बी.ए. सेकेंड ईयर और सॉफ्टवेयर डेवलपर का कोर्स कर रही हैं। उन्हें लड़कियों और युवाओं के मुद्दों पर लिखना पसंद हैं जिसको वह कविताओं के माध्यम से व्यक्त करती हैं।

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