शैलेश सिंह:
संगीत दिवस के दौरान मेरा मिलना तीन नए साथियों से हुआ, यह तीन साथी महिमा, मैरी और खुशबू थी, तीनों की उम्र 10 से लेकर 15 साल के बीच की थी और तीनों आपस में अच्छी दोस्त थी। हमने इस बार गाने की गतिविधि रिसिया पार्क में रखी थी और तीनों किशोरिया वहाँ पर खेल रही थी। सबसे बड़ी 15 साल की खुशबू कभी पेड़ों पर लटक जाती तो कभी फूल तोड़ने के लिए सभी को मना करती।
महिमा और मैरी खुशबू को देखा करती, महिमा धीरे से मैरी के कानों में कुछ कहती और दोनों ज़ोर से हंस पड़ती। मैं यह सब एक पेड़ के नीचे बैठकर देख रही थी, अचानक 10 साल की मैरी की नज़र मेरी ओर पड़ी तो मुझे हँसी आ गई, उसने महिमा को बताया फिर दोनों ने आपस में बात की और दोनों जोर से हँसने लगी। फिर दोनों ने खुशबू को दिखाया तो तीनों ने आपस में बात की और फिर मेरे पास आकर बैठ गईl ढोलक, चार्ट पेपर, दरी, पेन, पेंसिल सब ध्यान से देखने लगी और फिर मैरी का सवाल आया- “यहाँ पर क्या करने आई हो ?”
मैंने कहा, “हम यहाँ आज संगीत दिवस मनाने आए हैं । “
महिमा बोली, “यह क्या होता है ?”
मैंने कहा, “यह समझ लो कि मस्ती का दिन है । “
खुशबु बोली, “वह तो हम रोज़ करते हैं । यह दिन तो हमारा रोज़ होता है । “
तभी वह उठकर थोड़ी कुछ दूर गई और वापस आकर बैठ गई। मैंने जब पूछा कि कहाँ गई थी, तो उसने गुटका दिखाते हुए बताया कि कुल्ली करने गई थीl फिर वह हमारे साथ पूरे दिन जुड़ी रही।
मैंने बात ही बात में खुशबू से कहा, “गुटखा खाना अच्छी बात नहीं है । “
खुशबू ने कहा, “अच्छी बात ना होती तो मेरे पापा-मम्मी क्यों खाते? और मुझे डांटते ना? खाने से रोकते ना ?”
मैंने फिर पूछा कि तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं तो उसने बताया कि वह बाहर रहते हैं, यहाँ नहीं रहते हैं । जब मैंने पूछा कि तुम्हारा घर कहाँ है तो महिमा बोली, कि यहाँ से बहुत दूर है। मैंने पूछा कि कितना दूर हैं तो वह बोली कि पता नहीं पर एक घंटा लगता है । महिमा ने बताया कि उसके मम्मी-पापा भी बाहर रहते हैं और वहाँ काम करते हैं। मैंने जब पूछा कि क्या काम करते हैं तो उसने बताया, “बहुत सारा सामान लोगों के पास जो बचता है वह उन्हें दे देते हैं और वह घर ले आते हैंl वह यही काम करते हैंl मम्मी-पापा आते-जाते रहते हैं।” इसके बाद खुशबू ने बताया कि वह मांग कर अपना गुज़ारा करते हैं ।
फिर मैंने उनसे बैठकर और भी बातें की, इस दौरान महिमा ने बताया कि वह और मैरी कभी-कभी पढ़ने भी जाते हैंl स्कूल में उनका नाम लिखा हैl मैंने पूछा कि कौन सा स्कूल है सरकारी या प्राइवेट, तो दोनों शांत हो गई, उन्हें नहीं पता था कि वह कौन से स्कूल में पढ़ती हैंl महिमा बताती है कि वह अपनी बड़ी बहन के साथ यहाँ पर रहती है, बड़ी बहन की अभी शादी नहीं हुई है और सुबह 5:00 बजे उठकर वह अपने लिए ज़रूरत का सामान खोजने जाते हैं। कभी-कभी समय पर वापस आ जाते हैं तो स्कूल भी चले जाते हैं ।
इसके बाद महिमा बहुत धीमे स्वर में मुझसे कहती है, “दीदी एक बार एक चाचा ने मुझे बुलाया और बहुत दूर तक ले गए। हम उनके साथ चले जा रहे थे फिर हम चुपके से वहाँ से भाग गए।”
मैंने पूछा, “क्यों भाग गई ?”
महिमा ने कहा, “वह हमको ठीक नहीं लग रहे थे और पता नहीं कहाँ पर ले जा रहे थे।”
फिर बहुत नरमी से उसने कहा, “दीदी यह सब करना मुझे अच्छा नहीं लगता है, माँ-पिता की वजह से करना पड़ता है वह बोलते हैं कि हमारा पेशा (काम) ही यही है । “
मैंने फिर पूछा, “और क्या-क्या करते हो ?”
खुशबू बताने लगी, “हम बस इधर-उधर घूमते हैं और जो भी मिलता है उसी से अपना गुज़र-बसर करते हैं । “
मैंने कहा, “तुम नहीं पढ़ती ?”
वह बोली, “नहीं ! अम्मा ने कहा है हमको पढ़कर क्या करना है। हमें तो वैसे भी मांग के सारी चीज मिल जाती है । “
खुशबू बताती है कि वह कभी स्कूल नहीं गई, उसको नहीं पता कि स्कूल में क्या होता हैl उसने बस बाहर से स्कूल को देखा हैl वह कहती है, “मिले हुए खाने और पैसों से मैं खुश हूँ, और कोई गुटखा खिला दे तो मैं और भी खुश हो जाती हूँ।”
यह एक 15 साल की किशोरी के विचार और शब्द थे…
हम सब अपना टिफिन लेकर गए थे, जब हमने उनको भी साथ में खाने के लिए बोला तो खुशबू ने पूछा, “कुछ इसमें मिलाया तो नहीं है ?”
मैंने बोला, “नहीं, मैं पहले खाती हूँ।”
तो वह बोली, “हाँ खाओ, एक बार एक लड़के ने पता नहीं क्या खिलाया जो मुझे चक्कर आने लगा और नशा आ रहा था । इस नशे में मुझे घर पहुँचने में बहुत रात हो गई थी और घर पर मुझे अम्मा ने बहुत मारा था, मेरी एक भी बात नहीं सुनी थी । तभी से हम किसी से खाना नहीं लेते हैं । लोग हमारी मजबूरी का फायदा उठाते हैं ।”
वहाँ से निकलते समय मैंने उनसे पूछा कि तुम यहाँ पर रोज़ आते हो तो तीनों बोली कि नहीं यहाँ पर एक बार ही पहले आए हैं। फिर मैने उनसे पूछा कि मुझसे क्या मदद चाहती हो? तो महिमा और मैरी का जवाब था कि हमें कॉपी, बस्ता और किताबें मिल जाती तो अच्छा रहता।और खुशबू का जवाब था कि दीदी मुझे कपड़े दे दो। मुझे उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगा कि वह अपने मन में इन छोटी-छोटी खुशियों को छुपा कर रखती हैं। वह अपने मन की बात शायद ही किसी से कह पाती हों। उन्हें वैसा माहौल नहीं मिल पा रहा है कि वह अपनी बातें कह सकें। पूरे दिन हमारे साथ रहने के बाद उन तीनों ने खाने, पैसे या गुटखा की मांग ना करके कॉपी, किताब और कपड़े की मांग की। जाते समय हमने उनका पता और फोन नंबर पूछा। फोन नंबर तो उन्हें नहीं पता था, लेकिन उन्होंने अपने गाँव का नाम बताया। इसके बाद से मैं और मेरी टीम उनके गाँव जाकर उनकी मदद करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अब आप उनकी मदद कैसे करना चाहेंगे, हमे 9554228347, 9628851740 नंबर पर संपर्क करके जरूर बताएँ।

