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पितृसत्ता को आईना दिखाती 2 लघुकथाएँ  

नीतिशा खलखो:

#1 चलो पितृसत्ता तोड़ें

कुमार : ये स्कूल वाले हर दिन क्या ही बच्चों को हु हा सिखाते रहते हैं? सुबह की नींद भी पूरी शांति के साथ आदमी नहीं ले सकता इस शोर में तो!

नितिन : प्रार्थना के बाद यह केवल लड़कियों के लिए सेल्फ डिफेंस कार्यक्रम के तहत सिखाया जा रहा।

कुमार : इससे ज्यादा अच्छा यह नहीं कि लड़कों को सेंसिटिव और लड़कियों के प्रति सम्मान और बराबरी सिखाई जाए, लड़कियों को हिंसक बनाने के बजाय!!

नितिन : आईडिया बुरा नहीं है, चलो इस पितृसत्ता की कब्र खोदना हम खुद के घर से शुरू करें। मुश्किल होगा ज़रूर पर नामुमकिन नहीं।

#2 बेटी पढ़ाने वाला देश यह

दृश्य : दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बेहतरीन राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन के बाद खाने पर विशिष्ट वक्ताओं की मेज से हल्के फुल्के मज़ाक व ठहाकों का माहौल।

मैडम मिंज – देश में पीएचडी की सीट बहुत कम कर दी है सरकार ने। बहुत मुश्किल दौर होगा शिक्षा के क्षेत्र में।

विशष्ट वक्ता, प्रो. सिंह– नो मिसेज मिंज कहाँ सरकार गलत कर रही है, सभी पढ़-लिख जाएंगे तो हमारे घर का झाड़ू पोछा कौन करेगा? सबके लिए काम तो बचना ही चाहिए न! सरकार वही तो कर रही है।

(और पूरे मेज में से उठता है ज़ोरदार ठहाका, एक ऐसे तल्ख मानसिकता से परिचय कि मात्र मिसेज मिंज की भौहें तनती हैं और बाकी पूरी महफ़िल जैसे किसी मस्ती में झूम उठे हों।)

दृश्य (बदलता है)
इंटरनॅशनल कांफ्रेंस में सभी जर्मनी में हैं।

प्रो. सिंह – ओह इन कांफ्रेंस वालों ने यहाँ रहने के साथ पैंट्री दे दी है, खाना अपना एक महीने तक खुद बनाना है क्योंकि बाहर के खाने में किस में बीफ, पोर्क हो समझ ही नहीं आता। अब वेज खाने के लिए खुद ही यहाँ बनाना है, इतनी ठंड में! ऊपर से यँहा मेड सर्विस  इतनी महंगी है कि वह बजट में ही नहीं है। उफ्फ मेरी तो मौत है, इंडिया होता तो महारानी थी, अब यँहा आकर नौकरानी सा महसूस हो रहा है।

(मैडम मिंज – सब सुनकर सिर्फ मुस्कुरा पा रही हैं आज )

Author

  • नीतिशा, झारखंड की रहने वाली हैं। वह वर्तमान में झारखंड के धनबाद ज़िले में स्थित बी.एस.के. कॉलेज, मैथन में विभागाध्यक्ष हैं। नीतिशा कई आदिवासी आंदोलनों, विशेषकर साहित्यिक आंदोलनों से जुड़ी हैं।

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