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बागेश्वर (उत्तराखंड) के सामाजिक कार्यकर्ता पूरण रावल को आखिरी सलाम

गोपाल लोधियाल: 

पूरण दा से मेरी मुलाकात 2009 में अल्मोड़ा में एक बैठक में हुई थी जो उत्तराखंड में लगातार प्राकृतिक आपदाओं और क्लाइमेट चेंज को लेकर थी। पूरण रावल इंजीनियरिंग के छात्र रह चुके थे और अपनी आजीविका चलाने के लिए वह बागेश्वर में फ्रिज-एसी रिपेयरिंग का काम करते थे। वह जब अपने फील्ड से आते-जाते थे तो उन्हें पहाड़ के जंगलों में लगी हुई आग के पशु-पक्षियों के जल-मरने, पर्यावरण के नुकसान और वनस्पतियों को हुए नुकसान को देखकर वह बहुत दुखी हुआ करते थे। इस कारण उन्होंने अपनी ग्राम सभा अडोली में वन पंचायत के जंगल में वृक्षारोपण का काम शुरू किया। इस काम को करते-करते धीरे-धीरे उन्होंने अपना प्रोफेशनल काम छोड़ दिया और बाकी पूरा जीवन जल-जंगल-ज़मीन को बचाने के लिए देने का निर्णय लिया। उनके ऐसे अथक प्रयास से क्षेत्र के लोग प्रभावित हुए और उनको वन पंचायत का सरपंच बना दिया गया। पूरण रावल करीब 15 साल तक अपनी वन पंचायत के सरपंच रहे।

पूरण रावल द्वारा पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण की दिशा में किये गए महत्वपूर्ण कार्यों का असर आगे यह हुआ कि फिर उन्हें वन पंचायत सरपंच संगठन बागेश्वर का अध्यक्ष बना दिया गया। वन पंचायत जिला अध्यक्ष बागेश्वर होने की नाते उन्होंने उच्च हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर और बुग्यालों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी काम किया, साथ ही पिंडर घाटी, सरयू घाटी और गरुड़ घाटी में वन पंचायत के अधिकारों को लेकर लगातार संघर्ष किया। पूरण दा, वन पंचायत संघर्ष मोर्चा से पिछले करीब 12 साल से जुड़े थे, फिर वर्ष 2019 में उन्हें वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष का पद सौंपा गया। इसके बाद उन्होंने राज्य के भीतर अलग-अलग जिलों में संगठन की कार्यकारिणियों का गठन किया और वन पंचायत के अधिकारों को लेकर और वन अधिकार कानून को लेकर खूब काम किया। 

पूरण दा एक खुशमिजाज व्यक्ति थे, मुस्कुराकर और प्यार से पुचकार दोस्ती करना उनका शौक था। मूंछों को ताओ देते, काले चश्मे को पहन कर घूमते-मुस्कुराते, दोस्तियाँ बनाते उस इंसान के व्यक्तित्व में अलग ही खिंचाव था। हमें पहले लगता था कि यह मूँछें कहीं मज़बूत पितृसतात्मक सोच का प्रतीक तो नहीं, लेकिन उनसे जब बात हुई तो वह बोले कि मुझे मूंछ बड़ी करने का शौक है। वह हमेशा इस दिशा में भी चिंतनशील रहते कि समाज से गैर-बराबरी को कैसी मिटाया जाए और आपसी प्रेम और भाईचारे को कैसे बढ़ाया जाए। लगातार उनकी यही चिंता बनी रहती कि हम अपनी वन पंचायत को कैसे मजबूत करें, कैसे हम संगठन को राज्य भर में और मजबूत बना सके। 

पूरण दा हमेशा कहते थे कि मुझे एक बहुत बड़ा काम करना है, वन पंचायत संघर्ष मोर्चा को व्यापक बनाना है। लोगों के अधिकारों और संसाधनों तक उनकी पहुँच कैसे सुनिश्चित हो इस पर वे सदा विचार और काम करते रहे। अभी पिछले महीने 2-3 मई को ही वह भवाली आए थे, उनके साथ बहुत से कार्यक्रम तय हुए थे, पिंडर घाटी और सरयू घाटी में दो बड़ी बैठकों का आयोजन का कार्यक्रम होना तय हुआ था। वो कहते कि अभी लोगों के पास खेती-किसानी वाला काम बहुत है तो जुलाई में हम इस कार्यक्रम को करेंगे। लेकिन उस दिन जाने क्यूँ ऐसा लगा कि वह थोड़ा उखड़े से हैं, जैसे भीतर नकारात्मकता सामाई हो। ऐसा खयाल आया लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाया। वह हमारे संगठन के बहुत ज़रूरी पिलर थे, उनका जाना जन संगठन के लिए बड़ी क्षति है, जिसकी भरपाई करपाना बहुत मुश्किल है। 

एक बार मैं पूरण दा के इलाके में गया था, शामा शिखर क्षेत्र की एक ऊँची सी धार पर जाकर पूरण दा ने जब आवाज़ लगाना शुरू किया तो करीब 30 गाँव के लोग एक जगह इकट्ठा हो गए और बहुत अच्छी मीटिंग हुई। मीटिंग में जल-जंगल-ज़मीन और वन पंचायत के मुद्दों सहित महिलाओं के मुद्दों पर भी गहनता से बातचीत हुई। तब एहसास हुआ कि इस व्यक्ति की स्वीकार्यता लोगों के बीच में यूँ ही नहीं बनी, और ऐसा करना कोई मामूली काम नहीं है। उस मीटिंग से समझ आया कि पूरण दा का अपने क्षेत्र के लोगों और मुद्दों पर गहरा प्रभाव था। उनके भीतर लोगों को जोड़ने की एक अद्भुत क्षमता थी, उनकी खासियत थी कि वो सुनते सबकी थे लेकिन करते अपने मन की ही थे। आपकी बहुत याद आएगी पूरण दा… 

फीचर्ड फोटो आभार: महिपाल ‘मोहन’

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  • गोपाल उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अपने क्षेत्र में वन पंचायत संघर्ष मोर्चा से जुड़कर स्थानीय समुदायों के हक़-अधिकारों के मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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