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जागरूक हो रहे हैं ग्वालियर की रुद्रपुरा बस्ती के सहरिया आदिवासी

सुनील: 

सहरिया बस्ती रुद्रपुरा, यह बस्ती मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले के वार्ड-63 में बसी हुई है। यहाँ सहरिया समुदाय के 20-25 घर हैं, जिनमें लगभग 100 लोगों की आबादी निवास करती है। वार्ड न. 63 में जहाँ विकसित बस्ती खत्म होती है, उससे 1 किलो मीटर आगे जाकर गंदे नाले के पास यह बस्ती बसी हुई है। यहाँ के लोगों का आजीविका का मुख्य ज़रिया सिर्फ मज़दूरी है, वह भी दबंग समाज के खेतों में जाकर मजदूरी करना जैसे – धान लगाना, आलू खोदना, धान काटना, चावल काटना, सरसों काटना और खेतों में खाद डालना आदि। इन सब कामों में पूरा परिवार लगा रहता है। ना प्रशासन और ना ही कभी किसी नेता जी ने कभी इस बस्ती में जाकर इनके विकास के लिए काम किया है, और तो और अब बस्ती के लोगों ने भी अपने विकास की आस छोड़ दी है। बस्ती में ना तो पक्के मकान हैं, ना सड़क है और ना ही बच्चों की शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था है। सभी बच्चे शिक्षा से वंचित हैं।

साल 2023 में 17 अप्रैल को जब पहली बार जेनिथ की टीम बस्ती में गई, तब हमने इस बस्ती के बारे में जाना और तब से ही लगातार इस बस्ती में लोगों के बीच जाकर बातचीत के माध्यम से हमने अपनी पहचान बनाई और लोगों से मुद्दों पर चर्चा करना चालू किया। बस्ती में चौपालें की जिसमें उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दी। साथ ही हमने उन्हें ऐसे कानूनों की भी जानकारी दी जिससे वह दबंगों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार के खिलाफ लड़ सकें और न्याय पा सकें। बस्ती के एक व्यक्ति के साथ दबंग समाज के व्यक्ति के द्वारा किये गए अत्याचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई में उनके साथ खड़े होकर हमने न्याय की लड़ाई भी लड़ी। इसमे यह भी साबित हुआ कि अगर लड़ाई विश्वास के साथ लड़ी जाए तो जीत निश्चित होती है। दबंग समाज के उन लोगों ने अपने बचाव के लिए जिले के बड़े-बड़े वकील किये, लेकिन वह भी उन्हें जेल जाने से नहीं रोक पाए। उनके जेल जाने से कहीं ना कहीं बस्ती के लोगों में आत्मविश्वास भी बढ़ा। जेनिथ टीम ने ज़िम्मेदार अधिकारी और नेताओं से संपर्क किया और बस्ती की समस्या से उन्हें अवगत भी करवाया, जिसके लिए हम बस्ती के लोगों को साथ लेकर गए। अब वर्तमान में यह स्थति है कि लोग अपने अधिकारों के लिए संगठित होने लगे हैं और अधिकारिओं को ज्ञापन देना, उनके साथ मीटिंग करना, धरना प्रदर्शन करना आदि सांगठनिक गतिविधियाँ करने का आत्मविश्वास बस्ती के लोगों में आ चुका है।

बस्ती के प्रमुख मुद्दे –

शिक्षा: जब हमने रुद्रपुरा की इस बस्ती में काम शुरू किया तो पूरी बस्ती में सिर्फ 2 बच्चों के नाम ही सरकारी स्कूल में लिखे हुए थे, और वह भी स्कूल नहीं जाते थे। बाकी बच्चों ने तो स्कूल के अन्दर कभी कदम भी नहीं रखा था। बैठकों के माध्यम से हमने लोगों को प्रेरित किया कि वह बच्चों को स्कूल में भेजें और लोग बच्चों को स्कूल भेजने को तैयार हो गए। फिर स्कूल में जाकर प्रिंसिपल से मुलाकात की और उन्हें बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाने की बात कही तो इस पहल में उन्होंने भी बढ़ चढ़कर भाग लिया। अब एक समस्या सामने आ रही थी कि बच्चे स्कूल कैसे जाएँ, तो बस्ती में ही रहने वाले रामरतन आदिवासी ने ज़िम्मेदारी ली कि वह बच्चों को अपनी टमटम गाड़ी से स्कूल छोड़ेंगे और छुट्टी के बाद वापस भी लेकर आएंगे। इस तरह 17 बच्चों को स्कूल में जोड़ा और 7 बच्चों को अगंवाडी से जोड़ा गया, लेकिन बच्चे ज़्यादा दिन स्कूल नहीं जा सके। समस्या यह थी कि जिन बच्चों के माता-पिता खेत मज़दूर थे, वह उन्हें साथ में मदद करने के लिए ले जाने लगे और अन्य  बच्चों के पास आधार कार्ड या अन्य डॉक्यूमेंट नहीं होने से स्कूल में परमानेंट उनका नाम नहीं लिखा जा रहा था, इस कारण उन्हें सरकारी सुविधाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा था। अन्य बच्चे जो पहले से स्कूल में पढ़ रहे थे, उन्हें यह सुविधाएँ मिल रही थी और उन्हें देखकर बच्चे उदास हो जाते थे और फिर धीरे-धीरे बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। लेकिन हमने अभी भी हार नहीं मानी है, हमने तहसीलदार से बात की और सभी बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया को चालू कर दिया है। हमारा प्रयास है की जब जुलाई में स्कूल खुलेंगे तब तक सभी बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड हों, जिससे उनके स्कूल में दाखिले के लिए किसी प्रकार की रुकावट ना आये।

स्वास्थ: बस्ती नाले के पास बसी होने के कारण यहाँ बीमारियों का भंडार है, यहाँ मच्छरों से होने वाली बीमारी जैसे डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया का खतरा बना रहता है। बस्ती में एक मौत तो सांप के काटने से हो चुकी है, कारण समय पर उपचार ना मिल पाना रहा है। सरकारी हॉस्पिटल की यहाँ की दूरी लगभग 8 किलो मीटर है और जिला अस्पताल की दूरी लगभग 16 किलो मीटर है। इस कारण लोगों को हॉस्पिटल में जाने में परेशानी होती है और हॉस्पिटल की बात करें तो लम्बी-लम्बी लाइन में लगने के बाद भी यह निश्चित नहीं है कि उनका इलाज चालू हो जायेगा। पहले तो डॉक्टर को दिखाने के लिए लाइन में लगो, फिर डॉक्टर के द्वारा लिखी गई जाँच करवाने के लिए लाइन में लगो और अगर डॉक्टर ने 3-4 जाँच लिखी है तो उन्हें करवाने में ही 2-3 दिन लग जाते हैं। कुल मिलकर मरीज को 3-4 दिन लगातार हॉस्पिटल जाने के बाद दवा मिल पाती है और उन्हें अपनी मज़दूरी छोड़कर जाना पड़ता है, तो यह उनके लिए एक बहुत बड़ी समस्या है।

चुनाव के समय की स्थति

वर्तमान में देश में चुनाव का समय चल रहा है। इस चुनाव के समय में बस्ती में लोगों के बीच जाकर चुनाव को लेकर उनकी रूचि को जानने की कोशिश की तो लोगों ने बताया कि जब पार्षद या विधायक चुनाव होते हैं तो पार्टी वाले बस्ती में आकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लोगों को लालच देते हैं और लोगों के साथ बस्ती में काम करवाने के बड़े-बड़े वादे करते हैं। बस्ती के लगभग 90% वोटर वोट तो डालते हैं लेकिन चुनाव के बाद फिर कोई भी नेता कभी बस्ती में लौट कर नहीं आता। बस्ती के लोगों ने यह भी बताया कि नेता लोग ट्रैक्टर या ट्रक में भर कर उन्हें वोट डलवाने लेकर जाते हैं और फिर उसके बाद कभी पलटकर नहीं देखते। यही क्रम हर चुनाव में चलता रहता है। अब तो बस्ती वालों ने आस भी छोड़ दी है कि कोई नेता उन्हें उनके अधिकार दिलवा पायेगा। इस बार के लोकसभा चुनाव के समय लोगों में चुनाव को लेकर बिलकुल भी उत्साह नहीं था, फिर भी बस्ती के अधिकांश लोग वोट डालने गए, लेकिन इस बार बिना किसी उम्मीद के कि चुनाव में जीतने वाला नेता उनके लिए कुछ करेगा। 

Author

  • सुनील कुमार, मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले में रहते हैं | उन्होंने ग्वालियर में जीवाजी विश्व विद्यालय से एम.एम (अर्थशास्त्र) और एल.एल.बी की शिक्षा प्राप्त की है | वह वर्ष – 2013 से समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2021 से सुनील, जेनिथ संस्था, ग्वालियर के साथ जुड़कर ग्वालियर मैं कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में, वह ग्वालियर में सहरिया समुदाय (आदिवासी) को न्याय तक पहुँचाने की लड़ाई में उनके साथ ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

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