लाल प्रकाश राही:
दुनिया के मज़दूरों एक हो जाओ का नारा भले ही साम्यवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स और उनके अनन्य साथी फेडरिक एंगेल्स ने दिया हो, लेकिन शोषण के विरुद्ध मज़दूरों का संघर्ष उससे भी कई ज़्यादा पुराना है। मज़दूरों, मेहनतकशों का विद्रोह मालिक वर्ग के विरुद्ध कोई नया नहीं है। इतिहास में मालिक वर्ग (लुटेरों) के खिलाफ श्रमिकों का संघर्ष हज़ारों वर्ष से भी पुराना है।
इतिहास में ऐसा पहला विद्रोह स्पार्टकस के नाम पर दर्ज है, स्पार्टकस दुनिया का पहला दास विद्रोही माना जाता है। लगभग 109 ईसा से 70 ईसा पूर्व (यानी 21 सौ वर्ष पूर्व जब दुनिया में इसाई और इस्लाम धर्म भी नहीं थे) रोमन साम्राज्य के खिलाफ एक व्यापक दास विद्रोह हुआ था, जिसमें हज़ारों दासों को अपनी कुर्बानी देनी पड़ी थी। स्पार्टकस के इस विद्रोह को दुनिया का तीसरा दास विद्रोह कहा गया, यानी कि स्पार्टकस से भी पहले दासों ने दो विद्रोह मालिक वर्गों के विरुद्ध किया था। (इस युद्ध को सवाईल का युद्ध भी कहा जाता है।)
हमें इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि अपने अस्तित्व को बचाने और श्रम के शोषण के विरुद्ध मज़दूरों का संघर्ष कोई नया नहीं है। इन्ही सतत संघर्षों के बीच इसी मेहनतकश वर्ग ने इस दुनिया को सजाया-संवारा भी है। आज जो कुछ भी हमें अपने जीवन को चलाने और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उपलब्ध है, वे सारी चीजें इन्हीं मेहनतकशों के श्रम का ही नतीजा है।
अब बात कर रहें है स्पार्टकस की, स्पार्टकस मालिकों द्वारा पददलित लोगों के नेता के रूप में देखा जाता है। वह दुनिया के मेहनतकशों के लिए किसी मुक्तिदाता से कम नहीं है। स्पार्टकस ने सिर्फ अकेले दासों की दासता के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी, उसने हजारों दासों को संगठित कर मालिकों के अथाह शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संगठित किया। एक प्राचीन इतिहासकार अप्पियन के अनुसार 120,000 दासों ने स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह में हिस्सा लिया और दासों के लिए स्वतंत्रता के महासंघर्ष में अपनी शहादत दी। स्पार्टकस की लड़ाई के दौरान ही मृत्यु हो गई, और 6,000 जीवित दासों को भविष्य के विद्रोह के खिलाफ क्रूर चेतावनी के रूप में एक साथ सूली पर चढ़ा दिया गया। इतना ही नहीं यह भी कहा जाता है कि इसकी लड़ाई में स्पार्टकस की प्रेमिका भी उसके साथ लड़ते हुए अपने लोगों के लिए शहीद हो गयी।
मालिक वर्ग के खिलाफ दासों के विद्रोह की कहानी कोई नई कहानी नहीं है। यह संघर्ष हज़ारों हज़ार सालों से निरन्तर होते आ रहे हैं। अपनी गुलामी के खिलाफ अपनी आज़ादी की लड़ाई में लोगों ने अनगिनत कुर्बानियां दी हैं, तब कहीं जाकर हमें थोड़ी सी आज़ादी मिल सकी है। आज तक के इतिहास में दासों से सात बार मालिक वर्ग के खिलाफ विद्रोह किया है जो इतिहास में दर्ज है।
नेट टर्नर का विद्रोह
1831 में अमेरिका में मालिक वर्ग के खिलाफ हुए दासों के विद्रोह में यह सबसे महत्वपूर्ण विद्रोह के रूप में दर्ज है। इसके नेता नेट टर्नर ने ‘साउथेम्पटन काउंटी, वर्जिनिया’ में एक खूनी विद्रोह का नेतृत्व किया था। नेट टर्नर ने अपने सहयोगियों के साथ अपने मालिक और उसके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया था, बाद में राज्य द्वारा नेट टर्नर और उसके 55 सहयोगियों को मौत की सजा दी गयी। कुछ ही दिन बाद गोरों की भीड़ द्वारा 200 दासों को मार डाला गया।
जंज विद्रोह
अफ़्रीकी दासों को अमेरिका में लाए जाने से बहुत पहले उन्होंने मध्य पूर्व में विद्रोह भड़काया और एक साम्राज्य के साथ आमने-सामने हो गए। जंज दास, पूर्वी अफ्रीकियों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला एक अरबी शब्द है। 869 ईस्वी में जंज दास एक अरबी क्रन्तिकारी अली बिन मुहम्मद के साथ जुड़ गए और अब्बासिद खलीफा के खिलाफ उठ खड़े हुए। भूमि और स्वतंत्रता के वादों से प्रेरित होकर जंज दासों ने आपूर्ति जब्त करने और साथी दासों को मुक्त कराने के लिए आस-पास के शहरों में रात में छपेमारी शुरू कर दी, जो एक विनम्र आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह एक पूर्ण क्रान्ति में बदल गया जो लगातार 15 वर्षों तक चलता रहा।
हाईटियन क्रान्ति
दुनिया में सबसे सफल दास विद्रोहों में हाईटिनयन क्रान्ति का उल्लेख किया जाता है, जो दासों के विद्रोह से शुरू होकर एक स्वतन्त्र राज्य की सथापना पर समाप्त हुई। 1791 में सेंट डोमिंगो के फ़्रांसिसी उपनिवेश में यह शुरू हुई, फ़्रांसिसी क्रान्ति के समतावादी दर्शन से प्रेरित होकर काले दासों ने एक संगठित विद्रोह शुरू किया, जिसमें हज़ारों दासों ने अपनी कुर्बानियां दी। अंततः फ़्रांसिसी सरकार ने 1794 में अधिकारिक तौर पर अपने सभी क्षेत्रों में दासता को समाप्त कर दिया। प्रसिद्ध विद्रोही जनरल टुसेन्ट लौवर्चर ने खुद रिपब्लिकन फ़्रांसिसी सेना में शामिल हो गए और 1801 तक खुद को द्वीप के गवर्नर के रूप में स्थापित कर लिया। जब 1802 में नेपोलियम बोनापार्ट की शाही सेना ने लुवरचर पर कब्ज़ा कर लिया और दासता को पुनः बहाल करने का प्रयास किया तो पूर्व दासों ने पुनः हथियार उठा लिए।
1803 में जीन – जैक्स डेसालिंस के नेतृत्व में दासों ने वर्टीएरेस की लड़ाई में फ़्रांसिसी सेना को हराकर दासों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और केरेबियन द्वीप हैती को नए गणराज्य के रूप में स्थापित कर दिया। यह दुनिया का पहला स्वतंत्र दासों का देश बना जिसने संयुक्त राज्य अमेरिका और कैरेबियन में अनगिनत अन्य विद्रोहों को प्रेरित किया।
इस प्रकार दुनिया भर में मेहनत करने वालों ने अपनी मेहनत की वाज़िब कीमत और गुलामी से मुक्ति के लिए निरन्तर संघर्ष किया है। आज हम जिस मई दिवस को उत्सव के रूप में मानते है यह भी लाखों-लाख श्रम करने वालों की कुर्बानी की बदौलत ही हासिल हो सका है।
आज हम 136वाँ विश्व मज़दूर दिवस मना रहे हैं। इसकी भी कहानी उतनी ही रोचक और साहस पूर्ण है जितनी कि स्पार्टकस की। दुनिया में साम्यवादी विचारधारा अपना अस्तित्व बना चुकी थी, फ़्रांस की राज्य क्रान्ति को गुज़रे लगभग सौ बरस बीत चुके थे। दुनिया में साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स को मरे 3 वर्ष हो चुके थे। पूरी दुनिया में समाजवाद, साम्यवाद का भूत शासक वर्ग को सताने लगा था। मज़दूर अपने अधिकारों के लिए मालिक वर्ग के खिलाफ निर्णायक आंदोलन चला रहे थे, हर तरफ मज़दूर श्रम के शोषण के खिलाफ मुक्ति के संघर्ष में शामिल होने लगे थे। 1 मई 1886 की सुबह अमेरिका के शिकागो शहर का हे मार्केट, प्रदर्शनकारी मज़दूरों से ठसा-ठस भर गया था। उसी भीड़ में बम का एक ज़ोरदार धमाका हुआ, यह बम किसने और किस तरफ से फेंका गया, इसका कुछ भी पता नहीं चला। इसके जवाब में पुलिस ने आन्दोलनकारियों पर गोली-बारी शुरू कर दी, जिसेमें सात मज़दूर मारे गए, भीड़ के बगल में ही एक टेलीफोन खम्भा गोलियों के छेद से भर गया था । इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि शासक वर्ग की पुलिस किस हद तक विद्रोह को दबाने की कोशिश करती है।
1 मई 1886 को अमेरिका के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र में मज़दूरों की एक आम हड़ताल हुई, यह 8 घंटे के कार्य दिवस तथा बेहतर कार्य दशाओं की मांग को लेकर की गयी थी। देखते ही देखते यह हड़ताल अमेरिका के शिकागो शहर में चारो तरफ फ़ेल गई। उद्योग, कारखाना मालिकों ने सरकार के पदाधिकारियों से कार्यवाही का आग्रह किया। सरकारी नुमईन्दों ने उद्योगपतियों को सहयोग किया। ऐसा बराबर ही होता है, यह हर देश में हर जगह देखने को मिलता है, यह बिलकुल सत्य बात है कि सत्ता और शासन प्रणाली उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों की संस्था की तरह काम करती है। उस समय भी ऐसा ही हुआ, सरकार और सरकारी नुमईन्दों ने पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का साथ दिया। शिकागो शहर के हे मार्केट के मैदान में हो रही सभा में बम विस्फोट कराया गया और शिकागो पुलिस एवं गैरिसन सैनिकों ने हड़तालियों के ऊपर गोलियां चलाना शुरू कर दी। ऐसा सिर्फ शिकागो में ही नहीं हुआ बल्कि जहाँ-जहाँ मज़दूरों की हड़तालें चल रही थी, रैलियां-सभाएं हो रही थी, सभी जगह पुलिस ने आन्दोलनकारियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया। सैकड़ों मज़दूर माँरे गए, हजारों मज़दूरों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया गया।
शिकागो के 8 मज़दूर नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमें चलाए गए, बाद में इनमें से 7 मज़दूर नेताओं को जिनमें समुअल फिलेंड, अलबर्ट पर्सन्स, लुईस लिंग, अगस्ट स्पाईस, मिसेल सेच्वाब, अडोल्फ़ फीचर, फयूरेग फ्नेगेल शामिल थे, फांसी दे दी गयी और 8वें व्यक्ति आस्कर को 15 साल की सजा सुना दी गई।
प्रख्यात अमेरिकी लेखक विलियम डीन हावेल, ने अमेरिकी पत्र न्यूयार्क हेराल्ड ट्रिब्यून में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस स्वतन्त्र गणराज्य ने सात लोगों को मात्र उनके विचारों के लिए मार दिया है। उन्होंने यह भी लिखा कि इस हत्या से देश की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा है । इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया और पूरी दुनिया में मज़दूरों ने इन मांगों के समर्थन में आंदोलन करना शुरू कर दिया। दुनियाभर में मज़दूरों ने हड़तालें शुरू कर दी, जिससे दुनियाँ के शासक वर्गों में घबराहट होने लगी और अंततः मज़दूरों की इन मांगों को बिना शर्त मान लिया गया। तब से ही 8 घंटे कार्य, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन, के तहत दुनियाँ भर के मज़दूरों को यह क़ानूनी अधिकार मिला हुआ था, लेकिन बाद में ओवर टाईम के नाम पर पुनः मज़दूरों का शोषण शुरू हो गया।
आज हमारे देश में अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों में 700 से भी अधिक किसान शहीद हो गए। देश की मोदी सरकार ने मज़दूरों के लिए लंबे समय से चले आ रहे श्रम कानूनों को ख़त्म कर पूंजीपतियों इजारेदारों के हक़ में नई श्रम संहिताएँ लेकर आये, जिसे संसद और राज्य सभा से पास कराकर कानून के रूप में पास भी करा दिया गया है। एक बार पुनः मज़दूर वर्ग गुलामी की बेड़ियों में जकड़ने की ओर बढ़ रहा है, पूंजीपति धन के बल पर अपने अनुकूल सरकारों को चुन कर सत्ता में भेज रहे हैं। जनता मात्र वोट देने भर के लिए है और जनता का माईंड सेट शासक वर्ग अपने ज्ञान के संसाधनों के बल पर कर रहा है, जिसे शोषित वर्ग समझने में फेल हुआ है।
आज हमें इस बात को समझना पड़ेगा कि हम अपनी लडाई कैसे लड़ें और शासक वर्ग की हर साजिश का पर्दाफाश कर श्रम करने वालों के अधिकारों और उनकी आज़ादी को मुकम्मल बना सकें। आज देश और दुनियाँ के मज़दूरों, किसानों, नौजवानों, विद्यार्थियों के लिए सबसे जरूरी कार्यभार है कि वह मेहनतकशों, किसानों को जागरूक और संगठित कर उनकी लड़ाई को सफल बनायें, आज के मई दिवस की सार्थकता इसी बात में है।

