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मौजूदा समय में महिलाओं के लिए संभावनाएँ और चुनौतियाँ

कोर्दूला कुजूर:

महिलाओं के लिए संभावनाएँ और चुनौतियाँ समाज में एक महत्वपूर्ण विषय है। महिलाएँ के लिए अब अपने जीवन में नयी ऊंचाइयों को छूने के लिए अवसर भरपूर हैं। शिक्षा, कैरियर, उद्यमिता और सामाजिक समर्थन के माध्यम से, महिलाएं अब आगे बढ़कर खुद को सामर्थ बना रही हैं। समाज में समानता और सुरक्षा की मांग के साथ, महिलाएं अपने अधिकारों की रक्षा को लेकर भी सक्रिय हो रही हैं।

एक समय था जब महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलती थी। उनका दायरा घर के आंगन और गाँव तक ही सीमित था। शिक्षा के क्षेत्र में उनके लिए सीमित जगह थी, रोज़गार के क्षेत्र में अवसर नहीं के बराबर थे। राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में यदि हम अवसर की बात करें तो वो भी नहीं के बराबर थे। इन सभी क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं ने लम्बा संघर्ष किया, लम्बी लड़ाईयां लड़ी। महिलाओं के इस लम्बे संघर्ष ने, महिलाओं और लड़कियों के लिए संभावनाओं का दरवाज़ा खोल दिया है। 

महिलाओं को सशक्त करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया। इस दरम्यान कोशिश किया गया कि सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबरी के अवसर मिले, इसके लिए बकायदा कानून भी बनाया गया, जिसके तहत महिलाओं को लैंगिक समानता का अधिकार मिला। 

इस कानून का उद्देश्य है कि सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबरी का हक मिले। इसके तहत महिलाओं ने शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, स्पोर्ट्स इत्यादि क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनाई है।

कई बड़े ओहदे यथा डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट, पायलट, लोको-पायलट यहाँ तक कि महिलाओं के लिए कठिन कहे जाने वाले पुलिस और सेना के उच्च पदों को भी महिलाएं सुशोभित कर रही हैं। दूसरी तरफ देखें तो ये भी सच्चाई है कि इन क्षेत्रों में कितनी महिलाओं ने परचम लहराया है और ये कौन महिलाएं हैं? क्या सभी समुदाय की महिलाओं को ये अवसर मिले हैं? आज भी कई तरह के सवाल हमारे सामने हैं।

महिलाओं को बराबरी का संवैधानिक अधिकार मिलने के बाद बेशक महिलाओं के लिए सभी क्षेत्रों में संभावनाओं के द्वार खुले हैं और ये स्वागत योग्य भी है । 

जब हम संभावनाओं की बात करते हैं तो वर्तमान समय में कुछ बिन्दुओं पर हमें जरूर नज़र डालनी चाहिए –

दूसरी तरफ सशक्त महिलाओं वाले समाज में आज भी लिंग आधारित हिंसाएं बरकरार है। महिलाओं को अभी भी उत्पीड़न और यौन हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। महिलाएं जब घर के दहलीज से बाहर कदम रखती हैं तब कई तरह की समाजिक अड़चनें आती हैं।

वहीं, जब हम अपने राज्य में आदिवासी महिलाओं की बात करते हैं, तो उनका जीवन चुनौतियों से भरा हुआ है। आज भी आदिवासी महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है। सरकारी स्कूलों में 8वीं कक्षा तक की ही पढ़ाई होती है। जिनके पास साधन और पैसे हैं वे अपने बच्चों को दूर के विद्यालयों में अथवा हास्टलों में रखते हैं। जिनके पास साधन और पैसे नहीं है वो या तो घरों में ही रह जाते हैं अथवा पलायन कर जाते हैं। आदिवासी महिलाओं को सम्पत्ति पर अधिकार नहीं है जिसके कारण कैरियर चुनने और बिजनेस करने में कठिनाईयां आती है। समाज में आज भी लैंगिक असमानता है, निर्णय लेने में नहीं के बराबर भागीदारी है। डायन प्रथा जैसी बुराईयां आज भी बरकरार है। इन सारी समस्याओं के बावजूद भी जब महिलाएं अपने बलबूते विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आज भी यहाँ की महिलाओं को जल, जंगल, ज़मीन के अधिकार, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 

यहाँ की महिलाएं रूढ़िवादी परंपरा और सामाजिक ताने-बाने के कारण आज भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर सशक्त नहीं हो पाई हैं। साथ ही, उन्हें अक्सर आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन सारी चीजों को देखने के बाद हमें लगता है कि यहाँ की महिलाएं किसी भी चुनौती का सामना करके अपने सपनों को पूरा करने में सक्षम हैं।

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  • कोर्दुला कुजूर आदिवासी एक्टिविस्ट हैं और रांची, झारखंड में रहती हैं। महिलाओं और बच्चों के सवालों पर वह लंबे समय तक काम करते आ रही है और झारखंडी आदिवासी वुमेन्स एसोशियन शुरुआत करने में प्रमुख भूमिका निभाई हैं। साथ ही झारखंडी आदिवासियों के भाषा आंदोलन के सहभागी बनकर कुड़ुख भाषा को बचाए रखने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आयी हैं।

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