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लिव-इन रिलेशन पर युवा साथियों की सोच 

तन्मय और शो:

शो: हम्म…मेरे आंगने में तुम्हारा क्या काम है?

तन्मय: क्या बात है… सुबह-सुबह रेडियो चालू?

शो: अरे… उत्तराखंड में जो नया कानून निकला है लिव-इन रिश्तों पर… उसके बारे में पढ़ रहा था। पढ़ते-पढ़ते, यही गाना दिमाग में आ गया…

तन्मय: हा हा…..ठीक गाना चुने हो… तो क्या सोचते हैं हम इसके बारे में…

शो: इसके माने…लिव-इन रिश्ते के बारे में? या उत्तराखंड में जो क़ानून बनने चला है उसका ?

तन्मय: अभी जैसे क़ानून बनते जा रहें है, उनके सन्दर्भ में लिव-इन रिश्तों के बारे में क्या सोचते हो?

शो: मुझे लगता है कानून को समाज के सन्दर्भ में देखना चाहिए। लिव-इन रिश्ते तो एक तरफ बहुत प्रगतिशील लगते हैं। जहाँ शादी के रिश्ते के बाहर दो प्रेमी एक साथ रह रहें है, और वो भी ऐसे समाज में जहाँ शादी करना अनिवार्य है। शादी ना करें तो ज़रूर आप में कोई दोष या कमी है।

तन्मय: यही नहीं, शादी  हो, तो सिर्फ एक पुरुष और एक महिला के बीच में हो, एक ही जाति में, एक ही धर्म में हो। उस शादी में से बच्चे निकले, जल्दी निकले, हो सके तो लड़का निकले। यौनिक संबंध आप सिर्फ उस शादी के अन्दर करें और ज़िन्दगी भर उसी से रिश्ता रखें, किसी भी कीमत पर उसे निभाएं।  

शो: सच में, शादी का संसथान लोगों की ज़िंदगियाँ अक्सर झंड करके रख देता है। करन जौहर की फिल्में देख कर चार दिन की शिफोन साड़ी और करवाचौथ वाली चांदनी, और ज़िन्दगी भर का नियम कानून, दुनिया दारी ढोना। खास कर औरत के लिए। हालांकि पुरुष भी पिसते हैं। पहले था कि समाज को खुश रखो शादी कर के। आज कल स्टेट की दखलंदाजी के चलते सरकारी बाबुओं को भी मनाकर रखना पड़े। हाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि हम मुख्यधारा में दिखने वाली जातिवादी समाज की बात कर रहें हैं। आदिवासी समाजों में नियम अलग हैं, वहाँ ऐसे रिश्तों को कई बार मान्यता मिलती है।  

तन्मय: सही कह रहे हो। वैसे तो प्यार, इश्क, मोहब्बत, चाहत, रिश्ते, यह बहुत नीजी चीज़ें है। लेकिन अपने समाज में इनको ले कर सबके बहुत राय होते हैं। उसी समाज से राजसत्ता भी प्रभावित है। दोनों को नियंत्रण पसंद है। नियंत्रण के लिए नियम चाहिए और नियम को लागू करने के लिए जानकारी चाहिए। जब हम अपने रिश्ते राजसत्ता के साथ पंजीकृत करते हैं, तो हम अपने निजी ज़िन्दगी के बारे में जानकारी देकर गिनती में आते हैं। जब हम गिनती में आते हैं, तब हमारा नियंत्रण करना आसान हो जाता है।

शो: इस नए कानून के हिसाब से, अगर एक पुरुष और एक महिला, 21 साल के ऊपर है, और साथ रहना चाहते हैं तो उनको एक महीने के अन्दर अपने लिव-इन रिश्ते को प्रशासन के साथ पंजीकृत करना पड़ेगा। यदि वो अपने रिश्ते को पंजीकृत ना करें, तो उनको जेल भी भेजा जा सकता है।

तन्मय: भाई, यही तो है आधुनिक हिन्दू राष्ट्र का कमाल! यह लिव-इन रिश्ते को तब तक जगह देगा जब तक इसे गिना जा सकता है, नियम और दायरों में बंधा हुआ रहे, यह उतना भर ही अलग हो जितना की चल सके। बगैर सीटी का प्रेशर कुकर विस्पोटक होता है ना! आधुनिकता की भी जीत हुई और ग्रेट हिन्दू समाज और परम्परा की भी। भूलना नहीं चाहिए, यह वही राष्ट्र है जो समलैंगिक विवाह या पंजीकृत समलैंगिक संबंधों को ना कह रहा है, जिससे क्वीयर और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अपने पसंद का जीवन जीना बहुत मुश्किल हो गया है। जो अंतरजातीय शादी रोक रहा है, अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच शादी को टोक रहा है, प्यार के इज़हार को बंद करवा रहा है, सरोगेसी और बच्चा गोद लेना मुश्किल बना रहा है, समान नागरिक संहिता ला रहा है। इन सब तरीकों से हिंदु कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल रहा है। पर्सनल पोलिटिकल है यानी व्यक्तिगत ज़िन्दगी और निर्णय भी राजनीतिक होते हैं, यह बात यह सरकार खूब समझती है। इसलिए उन पर कब्ज़ा करना चाहती है।  

शो: मेरा आधा दिमाग कहता है कि इस कानून से मुझे बहुत फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि यह कानून मेरे जैसे लोगों के लिए है ही नहीं। दिमाग का दूसरा हिस्सा कहता है कि सरकार के इस चाल को समझना चाहिए, इसका विरोध करना चाहिए क्योंकि आज उनके लिए आये हैं कल अपने लिए आयेंगे तब बोलने वाला कोई नहीं रहेगा वगैरा वगैरा। कोई भी नियम तोड़ने वाला, कोई भी अलग सोचने वाला महफूज़ नहीं है। पर सच तो यह है कि, मेरे जैसे लोग लोग जो अपने आप को ना पुरुष के दायरे में रख पाते हैं और न महिला के, वो तो ना सरकार की गिनती में आते हैं और ना अपने समाज की।

तन्मय – हाँ. समलैंगिक महिला या पुरुष यानी गे या लेस्बियन लोगों को भी इतनी परेशानी नहीं होती होगी इस कानून से, क्योंकि हमारे तुम्हारे जैसे लोगों को देख के अक्सर लोग सोचते हैं- अरे दो भाई या दो बहन रहते हैं साथ में।

शो – संत लोग हैं। ब्रह्मकुमारी। या मिशन वाले। यह भी सुनने को मिलता है हा हा।

तन्मय – होटल में ठहरने में भी दिक्कत नहीं। नाम अलग होने पर भी जेंडर सेम दिखे तो कोई सवाल नहीं पूछता या रोक-टोक नहीं करता, जैसा बिन बिहाये लड़का और लड़की संग करते हैं।

पर हमारे जैसे लोगों को बाँधने के लिए या रोकने के लिए यह कानून नहीं तो कई और कानून और मान्यताएं जारी है, फ़िक्र मत करो। ऐसा नहीं है कि हम बड़े आज़ाद हैं इस दौर में।

इसलिए दोनों समाज और राजसत्ता का लोगों की निजी ज़िन्दगियों में दखलन्दाज़ी, लोगों की निजताओं पर सवाल खड़ा करना, किस से शादी कर सकते हैं, या नहीं कर सकते, कब शादी कर सकते हैं, किसके साथ रह सकते हैं, कैसे रह सकते हैं, ऐसे कानूनओं की खिलाफी करनी होगी, सबको करनी होगी।

शो: लेकिन सवर्ण हिन्दू, पढ़े-लिखे शहरी मध्यमवर्गीय लोग क्यों चिल्ला रहें हैं इस कानून को ले कर? उनमें से कितने लोग लिव-इन जैसे रिश्तों को अपनी ज़िन्दगी में बढ़ावा देते हैं? हाँ टेस्ट ड्राइव की तरह बड़े शहरों में आधुनिकता के नाम पर कुछ दिन साथ रह लिए, फिर शादी कर ही लेते हैं, क्योंकि उसी रिश्ते की मान्यता है, उस में सुख-सुविधाएं मिलती हैं। तुम्हारे कितने विषमलैंगिक (heterosexual) दोस्त जो वर्चस्व से आते हैं, वो शादी को नकार के अपने जीवनसाथियों के साथ ज़िन्दगी जीते हैं और दुनिया को चुनौती देते हैं? सच तो यह है कि अपने परिवारों को जब हम इतने संपन्न और प्रगतिशील हो जाने के बाद नहीं समझा पाते कि ऐसे ही ज़िन्दगी जीना है, अपने शर्तों पे, तब सरकार पे क्यों गुस्सा करना? हाँ थ्योरी में यह रोक-टोक, छान-बीन, ज़िंदगियों के साथ छेड़-छाड़ गलत लगता है, पर यह चोर-चोर चिल्लाने वाले कभी इन चुनौतियों को जी कर भी तो देखें, शादी जैसे संस्थानों को ठुकरा के भी तो देखें!  

तन्मय: सच कह रहें हो। जैसे नियम तोड़ने का और चुनौतियों को झेलने का ठेका बस वही लोग ले कर रखे हैं जो पहले से ही हाशिये पर खड़े हैं- वो दलित-बहुजन-आदिवासी समाज हो या लेस्बियन ट्रांस्गेजेंडर जैसे समुदाय। दलित समाज आज हमारे इलाकों में बहुत ज़्यादा ब्राह्मणवादी बना दिए जा रहें हैं और सवर्ण प्रथाओं को अपना रहे हैं, वरना इन समाजों में रिश्तों पर इतना रोक टोक नहीं था। फिर आदिवासी समाजों में भी। लिव-इन तो एक बड़ा ही सीमित बहस है देखा जाए तो, यूरोप या अमरीकी संस्कृति से सीखा हुआ शब्द। ऐसी परम्पराएं, ऐसे रिश्ते अपने यहाँ भी रहें हैं, रहेंगे। पर उन्हें चिन्हित करके एक दायरे में बाँधने की कोशिश है, एक रंग में रंगने की कोशिश हैं जो इस सरकार को बहुत अच्छे से आती है।

शो: अपने पहचान, अपनी हकीकत की ज़िंदगियाँ खुल के जीने का खामियाजा भी दबे कुचले समाज के लोग ही भरें, उस पर शर्म तो कभी संघर्ष भी यही लोग करें। इनके नाम पे राजनीति की रोटियां सेकी जाए, इनके मुद्दों पर किताबें लिखी जाए और हर तरफ से मज़े लूटें सिस्जेंडर सवर्ण हिन्दू हेटेरोसेक्शुअल (cisgender savarna hindu heterosexual) महिला-पुरुष।

तन्मय – कुछ भी कह लो मजे तो हमरे जैसे लोग भी ले ही लेते हैं, ना 😉?!

शो – हा हा हा, सो तो है। मज़ा बिना जियेंगे कैसे, लड़ेंगे कैसे? लाइफ में खुल के मज़े करने चाहिए। मज़ा पे रोक-टोक नहीं सहेंगे। अपने मज़े पे अपना हक। नाच-नाच के, गा-गा के, फुल मस्ती से समाज बदलेंगे, सत्ता पलटेंगे।

तन्मय – गीत से शुरू हुआ, तो क्यूँ ना एक नारे से ख़तम करें आज की बातचीत?

शो और तन्मय – हमारा इश्क भी कमाल है, संघर्ष का मिसाल है!  

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