Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

बहराइच की स्वास्थ्य व्यवस्था – एक त्रासदी

ज्योति व शैलेश, बहराइच, उत्तर प्रदेश 

मुझे मेला देखना और मेले में छोटे-छोटे सामान खरीदना बहुत ज़्यादा पसंद है। जब मैने यह सुना कि दूर शहर में दो दिन के लिए मेला लगा है और उसमें बाहर से कुछ जादू दिखाने वाली टोली आई है तो मैं बहुत ज्यादा खुश हुई। वहाँ पर जाने का मन मैंने तुरंत बना लिया। मैंने गाँव में अपने दूर की चाची से बातचीत की और चाची जी साथ में ले जाने के लिए तैयार हो गई।

हम दोनों मेला देखने के लिए सुबह 9:00 बजे घर से निकल गए। हमारे यहाँ से चौराहे की दूरी लगभग 5 किलोमीटर हैl हमारे यहाँ किसी भी तरह का संसाधन नहीं चलता है जिससे हम जा सकें तो हम दोनों लोग पैदल निकल पड़ेl रास्ते में जाते समय हमने एक आदमी को देखा जो पसीने से तर-बतर था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। उसकी आँखों से यह झलक रहा था कि मानो वह किसी से मदद की गुहार लगा रहा हो। वह एक महिला को साइकिल पर बिठाकर चौराहे की तरफ जा रहा था। थोड़ा नजदीक आने पर मुझे महिला के कराहने की आवाज़ सुनाई दी – “हे राम, हे मालिक अब नहीं सहन हो रहा है।”

मैं उसकी आवाज़ सुनकर कुछ आगे बढ़ी। मैंने उसको देखा तो उसे देखकर मुझे लगा कि मानो वह महिला पूरी तरीके से खराब तबीयत और दर्द  के कारण हताश हो चुकी थी। उसकी आँखें गड्ढे में घुसी हुई थीं, गाल एकदम चिपके हुए थे, आँखों के नीचे काले घेरे थे और होठ सूखकर काले हो गये थे।

मैंने उनसे पूछा कि भैया इन्हें क्या हुआ है? वह आदमी बोला कि जो सभी महिलाओं को होता है। जब तक मैं समझती, तब तक मेरी चाची समझ गई, और वह बोली की भैया आपकी घरवाली तो बहुत ज़्यादा परेशान हैl आपको कोई गाड़ी या साधन बुलाकर तब अस्पताल ले जाना चाहिए था। उस महिला को डिलीवरी होने वाली थी..!!l वह पुरुष बोला कि क्या करें बहन जी बहुत कोशिश की, पर हमारे पास इतने पैसे ना थे, कि हम कोई साधन बुक करा के अस्पताल को ले जाते। हमारे तो मोबाइल में भी पैसा नहीं है कि हम कहीं पर फ़ोन कर पाते। हमारी स्थिति ही ऐसी है कि हम साइकिल से ही जा सकते हैं। बात करते-करते अचानक से वह महिला ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी।

महिला बहुत ज़्यादा परेशान थी। महिला के प्रसव का समय बिल्कुल नज़दीक था।

वह महिला साइकिल से उतरकर नीचे ज़मीन पर बैठ गई। यह देखकर मैं और मेरी चाची दोनों लोग वहाँ पर रुक गए और उस महिला की सहायता करने के लिए सोचने लगे। हम लोग यह सब सोच ही रहे थे कि क्या करें,  उतने में महिला का प्रसव वहीं पर हो गया। चाची जी ने दौड़कर मेरे दुपट्टे से महिला को ढक दिया। उस पुरुष ने अपना अंगोछा भी चाची जी को दे दिया और वहाँ से हट गया। तब तक हमने पता लगाया कि यहाँ का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 6 किलोमीटर दूरी पर स्थित था।

वहाँ की आशा या एनम, किसी का भी पता नहीं था। फ़ोन  करने पर भी कुछ पता नहीं चला। फिर हमने एक   बहन जो पास गाँव में रहती थी, उनसे राशन ढोने वाला ठेला मांगा और उसी पर उनको बिठाकर  स्वास्थ्य केंद्र पर पहुँचने की कोशिश की। जब तक वहाँ पर सभी पहुँचते, तब तक होने वाले शिशु की मृत्यु हो गई, हमने जैसे-तैसे उस महिला और उसके बच्चे की सहायता की। आशा कार्यकर्ता भी वहाँ पर पहुँच गई। आशा को बताने पर मैंने सुना की आशा ने कहा कि बच्चे के मुंह में कुछ जहरीला पदार्थ चले जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया।

आज भी मैं जब उस घटना के बारे में सोचती हूँ, तो बहुत ज्यादा तकलीफ़ होती है।

आज अगर हमारे यहाँ की यातायात सुविधा बेहतर होती तो शायद वह गरीब व्यक्ति अपनी घरवाली को समय से अस्पताल पहुँच पाता या उसकी औरत की स्थिति बेहतर होती तो वह समय से आशा कार्यकर्ता, एनम या स्वास्थ्य केंद्र पर सूचना दे पाता। मैं हमेशा उस बात को लेकर परेशान होती हूँ कि कैसे कोई आसपास के व्यक्ति ने उनकी सहायता नहीं की। कैसे कोई एक महिला के लिए इतना लापरवाह हो सकता हैl

उस दिन यह घटना देखने के बाद हम जहाँ के लिए निकले थे, वहाँ नहीं गए और बहुत निराशा और उदासी लेकर घर वापस आ गए।

ग्रामीण क्षेत्रों में दूर-दूर तक सुनसान सड़के दिखाई देती हैंl आसपास कोई सुविधा व व्यवस्था नहीं होती है कि किसी भी तरह की आपदा आने पर ग्रामीण वासियों की समय पर मदद की जा सके। पर चुनाव के समय पार्टियों के जरिए और प्रधानों के जरिए अनेक तरह के वादे किए जाते हैं। चुनाव पूरे होते ही किसी भी तरह की सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं दी जाती हैं। बहुत दूर-दूर पर स्वास्थ्य केंद्र स्थापित होते हैं। 6 किलोमीटर और 7 किलोमीटर की दूरी पर स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्कूल बने हुए होते हैं। जिससे बहुत से ग्रामीण क्षेत्रवासी सुविधाओं से वंचित होते हैं और ऐसे ही सुविधाओं से वंचित उस महिला ने अपने बच्चे की जान समय पर अस्पताल न पहुँचने के कारण गवां  दी और उसकी भी जान खतरे में आ गई।

क्या आशा वर्कर का काम नहीं है गर्भवती महिलाओं का ध्यान रखना और समय पर अस्पताल ले जाना ? क्या गरीबों की ज़िन्दगी इतनी सस्ती है कि सरकार को उसी कोई चिंता नहीं है?  

फीचर्ड फोटो आभार: हिंदुस्तान टाइम्स

Authors

  • शैलेश, उत्तर प्रदेश से हैंl वर्तमान में शैलेश सरजू फाउंडेशन के साथ जुड़कर उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में काम कर रही हैंl वह महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के साथ शिक्षा, आजीविका और संविधान से जुड़ी गतिविधियों के अंतर्गत कार्य करती हैंl शैलेश को कविता और कहानी लिखना अच्छा लगता हैl

    View all posts
Exit mobile version