जयमंती:
मैं जयमंती, मेरे पिता का नाम शिवशंकर चौधरी और माँ का नाम सबिता देवी है I मैं बिहार में कटिहार जिले के एक छोटे से गाँव समेली में पैदा हुई थी I तब मेरे दादा जी किसानी करते थे I मेरा जन्म 29 अगस्त को दादी के घर हुआ, परिवार में सब बहुत खुश थे I बाहर के लोग और परिवार वाले सभी कहते थे की घर में लक्ष्मी पैदा हुई हैI मेरी परवरिश हो ही रही थी कि फिर तीन साल के अंदर मेरी बहन पैदा हुई, तब भी परिवार में सभी खुश थेI मगर फिर कुछ दिन बाद मेरी तीसरी बहन पैदा हुई और समाज के लोगो ने ताना देना शुरू कर दिया कि खुद तो अकेला बेटा ही था और अब कोई बेटा नहीं है इसका तो वंश आगे नहीं बढ़ेगा I मैंने अपने बचपन में कई बार यह शब्द सुनेI
2002 में अचानक मेरे परिवार में एक घटना होती हैI बारिश का मौसम था, मेरे दादा भैंस चराने निकले और फिर रात में 10 बजे ढूंढ़कर उनकी लाश को लाया गया I उस समय घर में पूरा सन्नाटा छा गया I घर पर सिर्फ मेरी माँ और दादी ही थे I पापा पंजाब में काम करते थे I घर का खर्च भी दादा से ही चलता थाI
4 साल की उम्र में मेरी पढ़ाई शुरू कर दी गई I मेरी माँ मुझे घर पर भी पढ़ाती थी जिसके कारण मैं पढ़ाई में काफी तेज़ हुआ करती थीI हमारे इलाके में स्कूल करीब में था जिसमे कक्षा 5 तक पढ़ाई होती थीI गाँव में लड़कियों को पांचवी तक पढ़ाकर उनकी 15-16 साल में शादी कर दी जाती थी लेकिन मेरे माँ-पापा ने मुझे कभी नहीं रोका और मैं आगे पढ़ती गईI गाँव वाले पापा को ताने मरते थे कि इतना बेटी है और जितना तेरी लड़की पढ़ी लिखी होगी उतना दहेज़ देना पड़ेगाI खाने को घर में कुछ है नहीं और पढ़ाए जा रहा हैI
मेरी मैट्रिक्स की पढ़ाई
मुझे बड़े होने के कारण घर की ज़िम्मेदारी कम ही उम्र में मिल गई, खेत का काम, गाय पालते थे उसका देख-रेख और घर का कामI पढ़ाई करने में भी काफी दिक्कते आई मगर मैंने पढ़ना नहीं छोड़ा I 2009 तक हम छः बहने हो गए थे और पापा अकेले कमाने वालेI वह मज़दूरी करते थे साथ में पेट में स्टोन भी हो गया था जिससे इलाज का खर्च भी बढ़ गया और उस पर अंधविश्वास का असरI घर में दुःख का सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा थाI 2009 में मेरी मैट्रिक्स की परीक्षा का फॉर्म भरना था तभी मैं 2010 में परीक्षा में बैठ सकती थी I मेरी माँ ने फीस के पैसे देने के लिए कर्ज़ लिया और फिर 2010 में मैंने परीक्षा दी और पास हो गई I घर में लोगों की भीड़ लग गई, गाँव के लोग बधाई देने आने लगेI गाँव में बहुत दिनों से किसी लड़की ने मैट्रिक्स पास नहीं की थी और मैं गाँव की तीसरी लड़की थी जिसने ऐसा कियाI
जैसे ही मेरी मैट्रिक्स का रिजल्ट आया गाँव की महिलाएँ कहने लगी कि अब इसकी शादी कर दोI मेरी माँ ने नाना से बात की और वह रिश्ता लेकर आ गए, लड़की पसंद और शादी तयI मेरे पापा उस समय पंजाब में थे, जब उनको पता चला तो उन्होंने कहा कि 18 साल से पहले बेटी की शादी नहीं होने देंगे और इस तरह मेरी शादी टली और आगे की पढ़ाई शुरू हो गईI
अब मुझे पैसे भी कमाना था तो मैं एक क्लिनिक में काम करने लगी I इंटर किया, बी.ए. फर्स्ट ईयर किया तो पापा बोले कि अब शादी कर देते हैं, मगर मैंने कहा पढ़ाई पूरी करना है और इस तरह मेरा बी.ए. फाइनल हो गयाI फिर हुआ मेरे भाई का जन्म, वह दिन मेरी ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा ख़ुशी भरा दिन थाI
परिवार बड़ा होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी I रहने के लिए घर नहीं था, बारिश होती थी तो रात भर जागना पड़ता था I किसी-किसी दिन तो खाने को लेकर भी सोचना पड़ता था I मैंने हर परिस्थिति को सामने से गुज़रते हुए देखा हैI 2015 में मैं संगठन से जुड़ी और इंटर्नशिप के बाद मुझे संगठन में काम मिलाI मैंने कमाना शुरू कियाI घर में किसी भी भाई-बहन की पढ़ाई नहीं रुकवायाI मेरी और तीन बहनो ने भी काम करना शुरू किया, मम्मी को भी अजीविका से जुड़वाया और धीरे-धीरे घर की आर्थिक स्तिथि में सुधार आने लगाI मम्मी-पापा दोनों काफी खुश थेI
मेरे परिवार को सबसे बड़ा झटका
2018 में बिना घर में बताए मैंने शादी कर लियाI मेरी अंतर्जातीय शादी होने के कारण उस समय घर-परिवार तो छोड़िए मेरे संगठन में भी तहलका मच गया थाI मेरे जीवनसाथी का नाम फुलेश्वर हैI तब से लेकर आज तक हम दोनों मिलकर काम करते रहे हैंI मैं आज भी संगठन के साथ जुड़कर काम करती हूँI हमारा अब तीन साल का एक बेटा भी हैI ज़िन्दगी में आज भी संघर्ष तो खत्म नहीं हुआ है, मगर मैं हिम्मत जुटाकर काम करने में लगी हूँI तो यह थी मेरी ज़िन्दगी की कहानी जिसमें बचपन से लेकर आज तक संघर्ष ही संघर्ष है, मगर मैंने कभी हार नहीं मानी हैI

