शैलेश:
कैसे सत्ता का दुरुपयोग और न्याय, समानता, समता, और बंधुता के मूल्यों का हनन, ज़िम्मेदारी उठाने की स्थिति में रिश्तेदारों द्वारा किया गया। जुलाई का महीना था मौसम बहुत अजीब सा था, काले काले बादल छाए हुए थे और जोरों की आंधी चारों तरफ से उठ रही थी। मैं कपड़ों को समेटने छत पर गई, जब तक छत पर पहुँची, तब तक आधे कपड़े उड़ चुके थे। आधे कपड़े लेकर नीचे आते हुए सोच रही थी कि जो कपड़े उड़ गए हैं, उनके लिए मैं क्या जवाब दूंगी। क्यों चली यह आंधी, यह मौसम क्यों खराब हुआ, क्या कुछ देर रुक नहीं सकता था, मैं पूरे कपड़े जब तक उठा ना लेती। यह सोचते हुए मैं नीचे आई, नीचे आकर मैंने कपड़े रखकर अम्मा से कहा कि कुछ कपड़े उड़ गए हैं, मेरा इतना कहना हुआ कि अम्मा मुझे कोसने लगी। अम्मा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए बोली, “तेरा काम करने में मन कहाँ लगता है। तेरा तो इधर-उधर में मन लगता है, तू तो पैदा ही हुई है नुकसान करने के लिए।”
उनकी ज़ोर की आवाज़ सुनकर मैं डर जाती, किसी काम में जाकर लग जाती और रोने लगती। मन ही मन यह सोचती कि इसमें मेरी क्या गलती थी; पर किसी से कभी नहीं कह पाती कि आखिर मेरी क्या गलती थी? इस तरह की छोटी-छोटी डांट खाकर मेरा जीवन चलता रहा, बिना किसी गलती के भी लोगों के ताने सुनने की मेरी आदत पड़ गई थी। मैं उनके तानों से पूरी तरह से टूट जाती थी, पूरे-पूरे दिन रोती थी और खुद को कमरे में बंद कर लेती थी। मुझे लगता था कि शायद मुझमें ही कोई कमी है इसलिए मुझसे ही सारे काम बिगड़ते हैं और लोग मुझसे चिढ़ते हैंl
एक दिन फिर इसी तरह का एक किस्सा हुआ, बड़ी बहन को लड़के वाले देखने आ रहे थे और मेरे लिए अम्मा का आदेश था, “तुझे कमरे से बाहर नहीं निकलना है। अगर तेरी वजह से गुड़िया का रिश्ता टूटा तो तेरी खैर नहीं।” यह सुनकर मैं फिर से सहम गई और पूरे दिन भूखी-प्यासी एक कमरे में बंद रही। मन में हमेशा यह बात चलती रही कि क्या माँ-बाप का ना होना बच्चों के लिए इतना बड़ा गुनाह है कि वह अपना जीवन दूसरों की मर्ज़ी के अनुसार ही जी सकते हैं, इन्हीं तनों-बानो में जीवन कटता रहाl
शाम हुई, अंधेरा हो चुका था और मुझे भूख बहुत ज़ोर की लगी थी, जब मैं बाहर आई तब तक मेहमान जा चुके थे। मैं अम्मा के पास गई तो अम्मा एक किनारे मुँह लटकाए बैठी थी। मैंने कहा, “क्या हुआ अम्मा?” वो बोली, “तू मुझसे बात भी मत कर!” मैं फिर सहन गई, अब मैंने क्या किया? फिर थोड़ी सी हिम्मत करके बोली, “क्या हो गया अम्मा?” अम्मा बोली, “लड़के वालों ने न कर दी है, उन्होंने पहले तुझे कहीं देखा है और बोलते हैं कि आपकी छोटी भतीजी से करनी हो तो बताइए?”
हाँ मैं यह बताना भूल गई कि ‘अम्मा’ मेरी बड़ी माँ हैं और मैं अपने बड़े पापा और बड़ी माँ के साथ रहती हूँ। मेरे 6 साल के होते-होते ही मेरे माँ- पिता दोनों ही गुज़र गए थेl अम्मा के हाथ में चाय थी, चाय का गिलास उन्होंने मेरे पैर पर फेंका और मुझे ज़ोर की चोट लग गई और मैं जोर-जोर से रोने लगीl अम्मा के इस सुलूक से मैं अंदर से और भी सहम गई थीl जीवन में माँ पिता की कमी मुझे उसे समय और भी ज्यादा खल रही थीl मेरी उम्र उस समय 14 साल की थी, पर शायद समय और हालात के कारण मेरी समझ 20 साल की उम्र वाले लोगों जैसी थी।
घर पर माली दीदी आई थी फूल लेकर, वह भी घर के हालात पूरी तरह से समझती थी। एक दिन वह मुझे नीचे मिली तो उन्होंने मेरा हाल पूछा, मैंने उनसे कहा कि सब कुछ ठीक है, यह सुनकर उन्होंने कहा, “तू सोच ले सब कुछ ठीक है या फिर सिर्फ तू ऊपर से ठीक बोल रही है। जब तक तू अपने लिए नहीं सोचेगी, तब तक कोई तेरे लिए सोचने वाला नहीं है। तुझको अगर पढ़ना है, अपना भविष्य सही करना है तो बोलना पड़ेगा, वरना ऐसे ही डराई धमकाई जाएगी।”
माली दीदी लड़कियों और महिलाओं के साथ समूह बनाकर बुटीक का काम करती थी, उन्होंने मुझसे कई बार कहा था कि तू उसमें जाकर सीख सकती है और अपने लिए पढ़ाई का खर्च निकल सकती हैl मैं उनकी कही बातों को रात भर सोचती रही कि मैं कैसे अम्मा से कहूँगी कि मुझे बुटीक का काम सीखना है और उन पैसों से आगे पढ़ाई करना है? क्योंकि घर का काम सबको चाहिए था साथ में पापा के कारखाने का काम भी करना होता था, अगर मैं वहाँ जाने लगती तो यह सब कौन करता? पर माली दीदी की बातों से मेरे अंदर कुछ हिम्मत आई थी कि बोलना तो पड़ेगा। दोपहर में अम्मा-पापा दोनों एक साथ बैठे थे तो अम्मा ने खाना लाने को कहा। मैं खाना लेकर गई तो मैंने पापा से कहा, “माली दीदी बोल रही थी बुटीक का काम फ्री में सिखाएंगे और मैं जाना चाहती हूँ।” यह सुनकर पापा बोले कि कारखाने का काम कौन करेगा और अम्मा बोली कि घर का काम कौन करेगा। मैंने कहा कि घर का काम निपटने के बाद सीखूंगी और फिर वापस आऊंगी तो कारखाने का कर लूँगी। अम्मा बोली अगर तू सीखने जाएगी तो कभी हमारे घर वापस नहीं आएगी।
यह वही घर था जिसकी देखभाल मैं पूरे जी-जान से करती थी। जिसके किचन के एक-एक डिब्बे सिर्फ मुझे पता थे कि वह कहाँ रखे हैं और किस में क्या है। पर अम्मा की बातों से पता चला कि वह घर तो मेरा है ही नहीं और फिर मैं वहीं से टूट गई। मैं सोचने लगी कि कहाँ रहूंगी, कहाँ जाऊंगी। मेरे 10 साल के छोटे भाई को कैसे पालूंगी और फिर दो दिन इन्हीं सब में बीत गया। तीसरे दिन अम्मा बाहर चिल्लाते हुए आई और बोली, “अरे जब तक यह मनहूस घर पर रहेगी तब तक कुछ सही नहीं हो सकता।” हुआ ये था कि मेरे भाई का लड़का सीढ़ियों से गिर गया था और मुझे पता भी नहीं था क्योंकि मैं तो किचन में सबके लिए पराठे बना रही थी। उसको लेने वाला भी कोई भी नहीं था, उसकी बड़ी बहन सो रही थी और भाभी को कोचिंग करवा दिया गया था।
अम्मा की बात सुनकर मैं वहाँ गई और बच्चे को उठाया तो अम्मा बोली, “उसको मत छू! निकल जा यहाँ से!” बस उस दिन मैंने अपने भाई को साथ लिया और वहाँ से निकल आई। मैंने माली दीदी के साथ समूह में कार्य करना 15 साल की उम्र में ही सीख लिया था। मैंने उनके साथ सैंपल बनाना सीखा और मेरा बनाया हुआ सैंपल दिल्ली और मुंबई में पास होने लगा, जिससे कई तरह के आर्डर उनको मिलने लगे। इसके बाद मैंने किराए पर कमरा लिया और अपने भाई के साथ वहाँ पर रहने लगी। 3 साल मैं वहाँ पर रही जो मेरे जीवन का सबसे पहले बदलाव था। इस दौरान मैंने बोलना, खुद के लिए समय निकालना और अपने अनुसार जीवन में फैसले लेना सीखा और यह सिर्फ माली दीदी की वजह से ही संभव हो पाया। माली दीदी के साथ मैंने कपड़ों पर छपाई कैसे होती है और कैसे उस पर ज़री और स्टोन का कार्य करते हैं सीखा। यह सीखकर मैंने अपनी एक पहचान बनाई और अपनी पढ़ाई भी शुरू की, और मैं अपने भाई के साथ रहने लगीl

