सिम्मी:
यूँ तो जिस किसी भी शिक्षक चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी, हर कोई यह बताने और सिद्ध करने में लगा हुआ है कि पूर्व प्राथमिक और प्रथमिक स्तर पर बच्चों के साथ खेल और कला के माध्यम से ही शिक्षण कार्य को किया जा रहा है। फिर भी प्राथमिक स्तर पर बच्चों में स्कूल, क्लास रूम और पढ़ने लिखने के प्रति बेहतर रूचि नहीं बन पा रही है। इसको सरकारी एवं गैर सरकारी दोनों तरह के स्कूलों में देखा समझा जा सकता है। बच्चों में बहुत गति होती है, उनकी गति के अनुरूप काम होने की कोशिश होना चाहिए, जबकि हो इसके विपरीत रहा है।
आधुनिक शिक्षा और स्कूल बच्चों की सीखने से भरी और उत्साहपूर्ण दिनचर्या में उदासीनता ला रहे हैं। इससे बच्चे कक्षा के बाहर अपने लिए बेहतर दुनिया पाते हैं। यह इंटरवल एवं छुट्टी के समय बच्चों की ऊर्जा और उत्साह को देखकर समझा जा सकता है। स्कूल एवं क्लास रूम के बाहर बच्चे अपना खुद का स्पेस क्रिएट करते हैं जो अमूमन खेल-कूद का स्थान होता है। यह खेल पारंपरिक एवं परिवेश आधारित होते हैं, जहाँ बच्चों में बढियाँ खेलने के कारण से लीडरशीप भी उभरती है और टीम भावना का भी विकास होता है। हमको यह देखना है कि हमारे टीचरों का प्रशिक्षण, कला और खेल के विषय में किस तरह से किया जा रहा है। शिक्षक कला और खेल के माध्यम से भाषा एवं गणित को कक्षा में लाने के लिए खुद कितना तैयार है। शिक्षक रंगों और चित्रों के साथ काम करने के लिए क्या तैयारी करते है। उनके खुद के सीखने की क्या प्रक्रिया रही है।
शिक्षक एवं अभिभावकों दोनों में ही कला और खेल के नज़रिये से सीधे तौर पर विषय को लेकर कोई दृष्टि नहीं है। कला और खेल के माध्यम से विषय पढ़ाने और पढ़ने से भविष्य बनता हुआ नहीं दिखाई देता है। पूर्व प्राथमिक और प्राथमिक स्तर पर क्लास रूम की सजावट पर काफी चर्चा है। इसके पीछे तर्क है कि इससे बच्चों का कक्षा में रूचि बनती है। पर देखा जाए तो बच्चे अधिकांश समय घर और अपने गाँव-मोहल्ले में रहते हैं। जहाँ कोई सजावटी कार्य नहीं है, फिर भी वह पूरी रूचि के साथ काम करते हैं। वह वहाँ से भागना या छुट्टी होने का विचार नहीं करते हैं।
कक्षा में भाषा के विकास और समझ बनाने के लिए कहानी कहने और उस कहानी के किरदारों को निभाने का नाटक किया जाता है। जिससे बच्चे कहानी को समझें और उनके किरदारों के साथ खुद को जोड़ने का प्रयास करें। कहानी कहने के लिए टी. एल. एम. का प्रयोग होता है, जिससे बच्चों में आकर्षण पैदा हो और उनकी दिलचस्पी बराबर बनी रहे। गणित के लिए गोली, क्यूब, लूडो, सर्कल, आदि माध्यम से काम होता है। बोल भाई कितने, आप बोलो जितने के आधार पर बच्चे संख्या को खेल-खेल में जोड़ते और घटाते रहते हैं। कला और खेल कार्नर बनाकर भी काम किया जा रहा है।
कक्षा में स्वतंत्र तौर पर पेंटिंग बनाने के लिए पेपर, कलर, आदि रखा जाता है। इन-डोर और आउट-डोर दोनो ही तरह से काम किया जा रहा है। इन सबके बावजूद ये समझ अभी तक शिक्षा में नहीं बन पाई है कि हम सारी शिक्षा बच्चों को खेल के हिसाब से देने की बात तो करते हैं, लेकिन खेल की शिक्षा और कला की शिक्षा पर बात ही नहीं करते। स्कूलों में भाषा सीखने में कला का प्रयोग हो रहा है, गणित सीखने में खेल का प्रयोग हो रहा है। लेकिन खेल और कला सीखने का प्रयास नहीं हो रहा है। यानी हम कहीं न कहीं मानते है कि खेल और कला सिर्फ सहायक हो सकते हैं और सहायक ही बने रहें। अभी हम शिक्षा में इसकी जरूरत और व्यवस्था स्थापित नहीं कर पाए हैं। इतने सब की समझ होने के बावजूद भी बच्चे स्कूल में रूचिकर माध्यम से काम करने में सक्षम नहीं हो पा रहे है, तो क्यों?
फीचर्ड फोटो आभार: यूनिसेफ

