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कलम आधी नहीं हो सकती

इंदु सिंह:

कलम आधी नहीं हो सकती
कलम पीछे नहीं लौट सकती
जितनी बंदूके हैं दुनिया में
पेंसिल कलम उनसे ज़्यादा
तादाद में,

एक कलम
जीवन जीती है,
अभिव्यक्ति करती है,
प्यार करती है,
गुस्सा करती है,
क्रांति करती है,
नफ़रत नहीं करती,
नफ़रत नहीं फैलाती।

विकास का पहिया अब
आगे बढ़ने लगा,
कलम भी क्या
नफ़रत फैलाने लगी है?

जिनकी स्याही सूख गयी
वो दाग दे कर,
कागज़ मटमैला कर उठी है

ये स्याही नई कलमों को
साफ़ करनी है अब
इसके लिए रबर नहीं बना सके है हम…..

फीचर्ड फोटो आभार – आई.एन.सी.

Author

  • इंदु, सरीला, हमीरपुर (उत्तर प्रदेश) से हैं और इलाहबाद विश्वविध्यालय से हिन्दी साहित्य पर शोध कर रही हैं।

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