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गरीब का स्कूल

राकेश जाधव:

एक स्कूल ऐसा भी….!
जहाँ पढ़ाई कम और पढ़ना ज़्यादा है।
जहाँ अध्ययन कम और रटना ज़्यादा हैं।
जहाँ सभ्याचार की तुलना में पढ़ना ज़्यादा हैं।
जहाँ मंज़िल छोटी लेकर दौड़ना ज़्यादा हैं।

एक स्कूल ऐसा भी….!
जहाँ मास्टर मोबाइल में व्यस्त हैं।
उसे ख़बर दुनिया भर की है।
इधर बच्चे वंचना में मस्त हैं।
मास्टर को फिकर अपने घर की है।

एक स्कूल ऐसा भी….!
जहाँ मास्टर से ज़्यादा छत बोलती है।
जहाँ ज्ञान की उलटी गंगा बहती है।
जहाँ मास्टर बच्चों के बाद स्कूल पहुँच रहा है।
वाह! मेरा देश क्या प्रगति कर रहा है?

एक स्कूल ऐसा भी….!
जहाँ बोध शहरी भाषा में परोसा जा रहा है।
जहाँ पता अपने अस्तित्व का नहीं है।
वहां अकबर – बीरबल को रटा जा रहा है।
जहाँ शिक्षा के आड़ में, सरोकार किया जा रहा है।

एक स्कूल ऐसा भी….!
जहाँ भार तनहा बस्तों का बढ़ता है।
जहाँ शिक्षण बंटा है, अमीरी-गरीबी में।
एक इतिहास रचता है, एक इतिहास पढ़ता है।
जहाँ भेद केवल बैठने का नहीं है।
एक नाश्ते में बॉर्नवीटा, एक मध्यान्ह भोजन खाता है।

“देश के 15 से 20 प्रतिशत युवा ऐसे होते जो केवल 12वीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ देते है सिर्फ़ सही शिक्षा के अभाव में”

फीचर्ड फोटो आभार: हिंदुस्तान टाइम्स

Author

  • राकेश, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले के ग्राम देवली के निवासी हैं। वर्तमान में वे बड़वानी ज़िले के शासकीय शहीद भीमा नायक महाविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं साथ ही लेखन कार्य में भी सक्रिय रूप से जुड़े हैं। राकेश, साकड़ के आधारशिला स्कूल के भूतपूर्व छात्र रह चुके है। प्रतिलिपि जेसे प्रसिद्ध प्लेटफार्म पर राकेश की कुछ रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

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