जूहेब आज़ाद:
मेरे कूड़ेदान में
कुछ कागज़ के पन्ने
उनमें बसे
लफ़्ज़ मेरे
तकलीख़* मेरी
कुछ दर्द
और मेरे
सपने अधूरे
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*तकलीख़ : रचना
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जुहेब, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं।

