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आज के दौर का ‘टॉम थंब’: घर से दूर कमाने वाले युवाओं की कहानी

ज़ैनब फातिमा:

कुछ दिनों पहले मैंने एक कहानी पढ़ी। यह कहानी यूरोप और अमेरिका की सबसे प्रसिद्ध और पुरानी लोककथाओं (Folktales) में से एक है। वहाँ के साहित्य और रंगमंच (Theatre) में इसे अक्सर एक नाटक या नाट्य प्रदर्शन (Dramatic Play) के रूप में बच्चों को दिखाया और पढ़ाया जाता है। मैंने इस कहानी को पढ़ा और पढ़ने के बाद जहाँ एक तरफ टॉम थंब की बुद्धि का अहसास होता है, वहीं दूसरी तरफ मेरे मन में इसके नैतिक पहलुओं को लेकर कई सवाल और विचार भी आते हैं।

यहाँ इस अनोखी कहानी और उस पर मेरे विचारों का पूरा विवरण दिया गया है:

टॉम थंब की कहानी

एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा अपनी पत्नी और सात बेटों के साथ रहता था। टॉम थंब उनका सबसे छोटा बेटा था, जो आकार में बहुत छोटा, लेकिन दिमाग से बहुत तेज था। उसके छह भाई उससे बड़े थे। गरीबी इतनी बढ़ चुकी थी कि घर में खाने के लिए एक दाना भी नहीं बचा था।

एक रात, टॉम थंब ने अपने माता-पिता को बात करते हुए सुन लिया। गरीबी से मजबूर होकर उसके माता-पिता तय कर रहे थे कि अगले दिन सभी बच्चों को जंगल में ले जाकर छोड़ देंगे, ताकि उन्हें बच्चों को भूखा मरते न देखना पड़े। टॉम ने यह बात सुन ली और अपने भाइयों को बचाने की योजना बना ली।

अगले दिन जब माता-पिता सातों बच्चों को जंगल ले जाने लगे, तो टॉम थंब रास्ते भर रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े गिराता हुआ गया, ताकि उन्हीं टुकड़ों के सहारे वे वापस घर लौट सकें। जंगल पहुँचकर जब बच्चे खेलने में मस्त हो गए, तब माता-पिता उन्हें अकेला छोड़कर चुपचाप घर लौट आए। जब भाइयों को अहसास हुआ कि वे अकेले हैं, तो वे रोने लगे। टॉम ने उन्हें समझाते हुए कहा, “घबराओ मत, मैंने वापस लौटने का रास्ता बना रखा है।”

लेकिन जब टॉम ने रास्ता देखा, तो पाया कि सारे रोटी के टुकड़े जंगल के पशु-पक्षी खा चुके थे। अब सातों भाई जंगल में भटकने लगे। भटकते-भटकते वे एक बड़े से महल जैसे घर पहुँचे। दरवाजा एक राक्षसी ने खोला। उसने बच्चों को देखा और दया खाकर अंदर बुला लिया। उसने चेतावनी दी, “मेरे पति एक राक्षस हैं और इंसानों का मांस खाते हैं। तुम लोग जल्दी से सोफे के पीछे छुप जाओ।”

थोड़ी देर में राक्षस घर आया। आते ही उसे ताज़े मांस की खुशबू आने लगी। वह बच्चों को ढूँढकर खाने ही वाला था कि राक्षसी ने उसे रोकते हुए कहा, “आपने आज का खाना तो खा लिया है, इन्हें सुबह नाश्ते में खाइएगा।” राक्षस मान गया और सोने चला गया।

राक्षसी की सात बेटियाँ भी उसी घर में थीं, जो सिर पर सुंदर मुकुट पहनकर सोती थीं। टॉम और उसके भाई टोपियाँ पहनकर एक ही कमरे में सो रहे थे। टॉम ने राक्षस की बात सुन ली थी कि वह सुबह उन्हें मार डालेगा। टॉम ने चुपके से अपनी और अपने भाइयों की टोपियाँ उतारकर राक्षसी की बेटियों के सिर पर रख दीं और उन बेटियों के मुकुट उतारकर अपने भाइयों को पहना दिए।

आधी रात को राक्षस अंधेरे में कमरे में आया। उसने टटोलकर सिर छुआ। जैसे ही उसने टोपी महसूस की, उसे लगा कि ये लकड़हारे के बच्चे हैं। उसने एक-एक करके अपनी ही सातों बेटियों को मार डाला। मौका मिलते ही टॉम थंब अपने छह भाइयों को लेकर वहाँ से भाग निकला।

सुबह जब राक्षस को सच्चाई पता चली, तो वह गुस्से से आगबबूला हो गया। उसने अपना जादुई जूता पहना, जो एक कदम में कई मील की दूरी तय कर सकता था, और बच्चों को ढूँढने निकल पड़ा। ढूँढते-ढूँढते राक्षस बहुत थक गया और एक बड़ी-सी चट्टान के पास सो गया।

टॉम थंब और उसके भाइयों ने सोए हुए राक्षस को देख लिया। टॉम ने चुपके से राक्षस के पैरों से जादुई जूता निकाल लिया और उसे खुद पहन लिया। जादुई जूते की मदद से वह तुरंत वापस राक्षस के घर पहुँचा और राक्षसी से कहा, “आपके पति मुसीबत में हैं! उन्हें डाकुओं ने पकड़ लिया है। अगर आप तुरंत घर का सारा धन-दौलत और जेवर नहीं देंगी, तो वे उन्हें मार डालेंगे।”

घबराई हुई राक्षसी ने सारा खजाना टॉम को दे दिया। टॉम थंब वह सारा धन-दौलत लेकर अपने भाइयों के पास आया और जादुई जूते की मदद से पल भर में अपने घर लौट आया।

जब माता-पिता ने अपने बच्चों को सही-सलामत और ढेर सारे धन के साथ देखा, तो उन्होंने उन्हें खुशी-खुशी गले लगा लिया। उस धन की मदद से उनका परिवार हमेशा के लिए गरीबी से बाहर निकल आया।

आज के दौर का ‘टॉम थंब’ और हमारी जिम्मेदारी पर मेरा विचार

इस कहानी में अंगूठे जितना छोटा वह बालक कैसे अपने गरीब माता-पिता की मदद करने और धन कमाने के लिए दुनिया में निकल पड़ता है। लेकिन जब मैंने इस कहानी को आज के दौर के परिप्रेक्ष्य में गहराई से समझा, तो मुझे अहसास हुआ कि यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक बहुत बड़ी सच्चाई है।

मेरी नज़र में, आज के दौर में घर से दूर कमाने जाने वाले वे तमाम लड़के ही असली ‘टॉम थंब’ हैं। हमारे समाज में एक ऐसा माइंडसेट बन गया है कि लड़कों को बस किसी भी तरह बाहर भेजना है ताकि वे पैसे कमाकर लाएं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या हमने उन्हें सही ‘जीवन कौशल’ दिए हैं? क्या हमने उन्हें इस काबिल बनाया है कि वे बाहर की दुनिया की कड़वी सच्चाइयों का सामना कर सकें?

अक्सर हम देखते हैं कि बिना पूरी तैयारी और मार्गदर्शन के युवाओं को बाहर भेज दिया जाता है। वे अनजान शहरों में झुग्गियों या छोटी-तंग जगहों में रहते हैं, 12-14 घंटे बिना सही खाने-पीने के पसीना बहाते हैं और अपनी हर खुशी का त्याग कर देते हैं। वे जो कुछ भी कमाते हैं, सब घर वापस भेज देते हैं।

मेरा यह मानना है कि बच्चों से सिर्फ धन कमाने की उम्मीद रख लेना काफी नहीं है। एक परिवार और समाज के नाते हमारी भी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम उन्हें सक्षम बनाएं, सही संस्कार और हुनर दें। हमें उन पर अपनी पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए, ताकि बाहर जाकर वे सिर्फ संघर्ष ही न करें या खुद को लुटाएं नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ अपने हिस्से की सही जगह और सफलता हासिल कर सकें।

Author

  • ज़ैनब फ़ातिमा उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद, अयोध्या की रहने वाली हैं। उन्होंने उर्दू साहित्य में एम.ए. किया है और इसके बाद लगभग दो वर्षों तक शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं। पढ़ाना और बच्चों के साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में रहना उनके लिए हमेशा एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा है। वर्तमान में वे अवध पीपुल्स फोरम के साथ लाइब्रेरी फैसिलिटेटर के रूप में काम कर रही हैं, जहाँ वे तीन इंटर कॉलेजों में लगभग 600 किशोरियों के साथ लाइब्रेरी एजुकेशन प्रोग्राम के ज़रिए जीवन कौशल और किताबों से जुड़ाव पर काम कर रही हैं।

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