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कठोरी : सरगुजा के गोंड आदिवासियों का कृषि आरंभ का पारंपरिक लोकपर्व

गिरीश कुमार:

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के गोंड बाहुल्य आदिवासी गाँवों में कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और सामुदायिक जीवन का आधार है। यही कारण है कि खेती का प्रत्येक चरण किसी न किसी लोक परंपरा और धार्मिक विश्वास से जुड़ा हुआ है। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण परंपरा है ‘कठोरी’, जिसे कई गाँवों में ‘कठबिदरी’ के नाम से भी जाना जाता है।

यह पारंपरिक रस्म प्रत्येक वर्ष बैसाख माह के कृष्ण पक्ष (अंधियारी) के प्रथम सोमवार को धान की बुवाई प्रारंभ होने से पहले पूरे गाँव द्वारा सामूहिक रूप से संपन्न की जाती है। इसका उद्देश्य अच्छी वर्षा, भरपूर धान उत्पादन तथा फसलों को प्राकृतिक आपदाओं, कीट-पतंगों और वन्य जीवों से सुरक्षित रखने की कामना करना होता है।

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) ज़िले के खड़गवां विकासखंड अंतर्गत ग्राम दुबछोला के बुजुर्ग श्री गुलाब सिंह गोंड़ 72 वर्ष बताते हैं कि कठोरी या कठबिदरी की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। चूंकि धान गोंड आदिवासी समाज का मुख्य खाद्यान्न है, इसलिए अच्छी फसल की कामना के साथ यह पूजा पूरे गाँव की सामूहिक भागीदारी से आयोजित की जाती है।

वे आगे बताते हैं कि गाँव में बाद में आकर बसे उरांव आदिवासी समाज को छोड़कर अन्य सभी कृषक परिवार इस अनुष्ठान में मुख्य रूप से भाग लेते हैं। प्रत्येक किसान अपने घर में सुरक्षित रखे धान के बीज तथा हल में उपयोग होने वाले पुराने लोहे के फाल को बांस से बनी पारंपरिक टोकरी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘मोरा’ कहा जाता है, में रखकर गाँव पुर्वजों द्वारा स्थापित देवता महादेव के स्थान पर पहुँचे हैं।

कठोरी से जुड़ी एक विशेष सामाजिक मान्यता है। पूजा संपन्न होने तक गाँव के लोग कुएं या वर्तमान के हैंडपंप से पानी निकालना अशुभ मानते हैं। इसलिए एक दिन पहले या भोर तक प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकता का पानी बड़े बर्तनों में संग्रह कर लेता है । यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पूरे गाँव द्वारा सामूहिक अनुशासन का पालन करने का भी उदाहरण है।

पूरे अनुष्ठान का संचालन गाँव का बैगा (आदिवासी पारंपरिक पुजारी) करता है। सभी किसान अपने साथ लाए धान के बीज का लगभग आधा भाग एक स्थान पर मिलाकर सामूहिक बीज का रूप देते हैं, जिसे बाद में बैगा अपने साथ लेकर जाता है। कई परिवार अपने घर में बनी तीन, पाँच या सात रोटियाँ भी साथ लाते हैं, जिन्हें पूजा के बाद बैगा अपने साथ ले जाता है। 

पूजा के दौरान बैगा मिट्टी के एक घड़े में पानी भरकर उसके मुँह को हरे पत्तलों से ढककर बाँध देता है। पत्तलों के ऊपर कुछ चावल के दाने रखे जाते हैं और वह अपने हाथों में एक काले रंग की छोटी मुर्गी पकड़कर उसे दाने खाने के लिए निवेदन करता है। मुर्गी द्वारा निवेदन स्वीकार कर दाना चुग लेने के पश्चात् बैगा शीघ्रता से पत्तल को बीच से फाड़ते हुए मुर्गी को पानी में डुबोता है। ग्रामीणों की इससे जुड़ी मान्यता है कि जब मुर्गी घड़े के पानी में तेज़ी से पंख फड़फड़ाती है, तो इसे वर्षा के दौरान आकाशीय बिजली गिरने की संभावना का संकेत माना जाता है, जबकि उसके शांत रहने को गाँव के लिए शुभ संकेत समझा जाता है। यह विश्वास पीढ़ियों से लोकमान्यता के रूप में जीवित है। 

इसके बाद बैगा घड़े के पानी को हरी पत्तेदार डालियों की सहायता से स्थानीय देवता महादेव के चारों ओर इस प्रकार छिड़कता है, मानो वर्षा हो रही हो। साथ ही, वह धान के बीज बिखेरने अथवा खेत में छीटने की प्रतीकात्मक क्रिया का अभिनय करता है। इसके पश्चात् उपस्थित अन्य किसान भी बीज छिटकने तथा हाथ में हल का फाल लेकर खेत जोतने जैसा अभिनय करते हैं। इस प्रकार पूरा अनुष्ठान आने वाले कृषि चक्र का सांकेतिक आरंभ बन जाता है। 

पूजा में नारियल, घी, गुड़, अगरबत्ती, दीपक, महुआ की पारंपरिक मदिरा तथा सूखे गोबर के कंडों को जलाकर हवन किया जाता है।

फसलों को जंगली जानवरों और अन्य जीवों से सुरक्षित रखने की कामना भी इस पूजा का महत्वपूर्ण भाग है। इसके लिए पत्तों के बने दोने में छोटे-छोटे पत्थर रखे जाते हैं, जो शेर, भालू, चूहे, पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रतीक माने जाते हैं। बाद में इन्हें भूमि में गाड़ दिया जाता है। यह एक प्रकार से प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने और फसल की रक्षा की सामूहिक प्रार्थना है।

पूजा में प्रयुक्त मुर्गी को न तो मारा जाता है और न ही उसकी बलि दी जाती है। कई बार उसे देवस्थल पर ही छोड़ दिया जाता है, जबकि कभी-कभी बैगा उसे अपने साथ ले जाता है। हालांकि, प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार बकरे की बलि देने की परंपरा भी कुछ गाँवों में प्रचलित है।

जहाँ दुबछोला गाँव में कठोरी पूजा बैसाख के कृष्ण पक्ष के प्रथम सोमवार को की जाती है, वहीं अन्य विभिन्न गाँवों के लोगों के अनुसार कृष्ण पक्ष के रहते तथा उसके समाप्त होने तक सुविधा अनुसार विभिन्न दिनों में कठोरी पूजा संपन्न करवाना अनिवार्य होता है। अंत में ‘मोरा’ में बचे हुए धान के बीज को अपने घरों में रखे बीज के साथ मिला दिया जाता है तथा इसके बाद ही समस्त गाँव के किसान खेतों में कृषि कार्य प्रारंभ करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस पूजा के बिना खेती आरंभ करना शुभ नहीं माना जाता।

गोंड आदिवासी क्षेत्रों में कठोरी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह सामुदायिक सहभागिता, कृषि संस्कृति, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है। इस अवसर पर पूरा गाँव एक स्थान पर एकत्र होता है, सामूहिक निर्णय और सहभागिता का वातावरण बनता है तथा नई कृषि ऋतु का स्वागत किया जाता है।

आज जबकि आधुनिक कृषि पद्धतियाँ तेजी से गाँवों तक पहुँच रही हैं, तब भी सरगुजा के अनेक गोंड बाहुल्य गाँवों में कठोरी जैसी परंपराएँ स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को पूरे जोश और उत्साह के साथ जीवित बनाए हुए हैं। यह पारंपरिक स्थानीय लोकपर्व बताता है कि आदिवासी समाज के लिए खेती केवल उत्पादन का माध्यम ही नहीं, बल्कि प्रकृति, देवत्व और सामुदायिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने का एक सांस्कृतिक दर्शन भी है।

Author

  • गिरीश कुमार छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में लंबे समय से आदिवासी समुदायों, जंगल और स्थानीय मुद्दों से जुड़े सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। वे जन अधिकार संगठन के साथ मिलकर क्षेत्रीय समस्याओं, वन अधिकारों और आदिवासी समाज से जुड़े सवालों पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वे युवाओं के साथ वैज्ञानिक चेतना और तर्कशील सोच को बढ़ावा देने के लिए भी कार्य कर रहे हैं।

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