भावना:
मेरा नाम भावना है। मैं पिथौरागढ़ ज़िले के धारचूला विकासखंड के चामी गाँव में रहती हूँ। मैं आप सभी के सामने अपने गाँव की महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सन 2000 से पहले और सन 2000 के बाद क्या-क्या परिवर्तन आए, उसके बारे में बताऊंगी।
सन 2000 से पहले हमारे गाँव की स्थिति बहुत कठिन थी। उसे समय शिक्षा की सुविधा बहुत सीमित थी, जिसके कारण महिलाओं को पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता था। अधिकांश महिलाओं की कम उम्र में ही शादी कर दी जाती थी। पहले 12 से 15 वर्ष की आयु में भी विवाह हो जाता था और छोटी उम्र में ही उन्हें घर, परिवार और बच्चों की ज़िम्मेदारियां संभालनी पड़ती थी। उसे समय महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी नहीं थी और समाज में उनकी भागीदारी भी बहुत कम थी। उसे समय पूरे दिन दूसरों का सामान उठाकर पहुँचाने के बदले दिन का 3 किलो अनाज मिलता था। इसके साथ ही महिलाओं को कई प्रकार के शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ता था। माहवारी के समय उन्हें छुआछूत जैसी कुरीतियों का सामना करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त घरेलू हिंसा मानसिक उत्पीड़न और अन्य प्रकार के अत्याचार भी आम थे।
सन 2000 के बाद धीरे-धीरे परिस्थितियों में सुधार आना शुरू हुआ। महिलाओं ने स्वयं को सशक्त बनाना प्रारंभ किया और काम करने की दिशा में कदम बढ़ाए। इसी दौरान मनरेगा का काम शुरू किया गया इसके साथ-साथ सरकार द्वारा बनाए गए संस्थाओं ने गाँव-गाँव जाकर लागू हुए कानून के बारे में लोगों को जागरूक किया और काम करने के अवसरों के बारे में बताया। इसके अतिरिक्त महिलाओं को घरेलू हिंसा के बारे में भी जागरूक किया इसी के साथ सन 2013 में गाँव की महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह बनाना शुरू किया जिससे वे छोटे-छोटे व्यवसाय और बचत के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त बनने लगी।
आज स्थिति पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। अब गाँव की महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। अपने विचार खुले रूप से व्यक्त कर रही हैं और सभाओं में भाग ले रही हैं। वे अब नेतृत्व की भूमिका भी निभा रही हैं। आज की महिलाएं “Independent women” के रूप में उभर रही हैं।
ग्राम पंचायत के स्तर पर महिलाओं ने हिस्सा लिया और ग्राम प्रधान, वार्ड सदस्य व सरपंच बनकर गाँव की महिलाओं का विकास कर रही है। अपनी आजीविका को ग्राम स्तर पर लागू कर अपना आत्मविश्वास बढ़ाकर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं।

