जिनित सामाद:
भारतीय समाज में श्रम का विभाजन केवल आर्थिक सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से ‘वर्ण’ और ‘जाति’ व्यवस्था पर आधारित रहा है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था कि “जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों का विभाजन है।” यह व्यवस्था तय करती आई है कि कौन सा काम ‘सम्मानजनक’ है और कौन सा ‘निम्न’, जिसका सबसे गहरा प्रभाव समाज के सबसे हाशिए पर खड़े वर्ग, विशेषकर महिलाओं पर पड़ता है।
वर्ण/जाति व्यवस्था और श्रम का अंतर्संबंध:
ऐतिहासिक रूप से, वर्ण व्यवस्था ने व्यवसायों को जन्म के आधार पर आरक्षित कर दिया।
- श्रम का पदानुक्रम: मानसिक और प्रशासनिक कार्यों को ‘ऊंचा’ और शारीरिक श्रम (Manual Labour) को ‘नीचा’ माना गया।
- अवसरों का अभाव: निचली मानी जाने वाली जातियों को शिक्षा और संपत्ति से वंचित रखा गया, जिससे वे केवल खेतिहर मज़दूरी, सफाई कार्य और चमड़े जैसे श्रम-साध्य कार्यों तक सीमित रह गईं।
- आर्थिक गतिशीलता में बाधा: योग्यता के बजाय जन्म आधारित काम ने कौशल विकास और आर्थिक तरक्की के रास्तों को सदियों तक बंद रखा।
महिला श्रमिकों पर इसका प्रभाव (दोहरी मार):-
महिला श्रमिक ‘जाति’ और ‘लिंग’ के दोहरे दंश को झेलती है। उनके लिए श्रम की चुनौतियां और अधिक जटिल हो जाती हैं:
- अदृश्य श्रम और कम मज़दूरी: दलित और पिछड़ी जातियों की महिलाएँ अक्सर कृषि, निर्माण और घरेलू कामगार के रूप में काम करती हैं। इस श्रम को अक्सर ‘अकुशल’ मानकर न्यूनतम से भी कम मज़दूरी दी जाती है।
- व्यवसाय का चुनाव और सामाजिक बंधन: उच्च जाति की महिलाओं पर जहाँ घर से बाहर निकलकर श्रम करने पर सामाजिक पाबंदियां (पर्दा प्रथा आदि) रही हैं, वहीं निचली जातियों की महिलाओं के लिए बाहर काम करना आर्थिक मजबूरी रही है, जिसके कारण वे शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
- अस्वच्छ और असुरक्षित कार्य: हाथ से मैला ढोने (Manual Scavenging) जैसे कार्यों में आज भी एक विशिष्ट जाति की महिलाओं की बड़ी संख्या है। यह न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि उनकी मानवीय गरिमा पर भी प्रहार है।
- कार्यस्थल पर हिंसा: जातिगत पदानुक्रम के कारण कार्यस्थलों पर महिला श्रमिकों को अक्सर यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, और सामाजिक शक्ति के अभाव में वे अक्सर न्याय की गुहार भी नहीं लगा पातीं।
आधुनिक परिदृश्य और बदलाव:
वैश्वीकरण और शिक्षा के प्रसार ने इस बेड़ियों को तोड़ने का काम किया है:-
- संवैधानिक सुरक्षा: अनुच्छेद 15 और 17 जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करते हैं, जबकि ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम’ लैंगिक भेदभाव को रोकता है।
- आरक्षण और शिक्षा: इन माध्यमों से महिलाएँ अब पारंपरिक जातिगत व्यवसायों से निकलकर कॉर्पोरेट, सरकारी और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं।
पर इन सबके अलावा अशिक्षित श्रमिकों के लिए बैंकिंग प्रणाली आज भी एक बड़ी चुनौती है। साक्षरता की कमी और तकनीकी जटिलताओं के कारण वे अक्सर बैंकिंग सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते या ठगी का शिकार हो जाते हैं।
अशिक्षित श्रमिकों के सामने मुख्य समस्याएं:-
- दस्तावेजीकरण: फॉर्म भरने, हस्ताक्षर करने और केवाईसी (KYC) की जटिल प्रक्रिया से श्रमिक घबरा जाते हैं।
- तकनीकी डर: एटीएम (ATM) का उपयोग, पिन सुरक्षा और मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधाएं उनके लिए किसी ‘पहेली’ से कम नहीं हैं।
- बिचौलियों पर निर्भरता: फॉर्म भरवाने या पैसे निकलवाने के लिए वे अक्सर तीसरे व्यक्ति पर निर्भर होते हैं, जो अक्सर उनके खाते से पैसे की हेराफेरी कर देते हैं।
- व्यवहार संबंधी बाधाएं: कई बार बैंक कर्मचारियों का रूखा व्यवहार या लंबी लाइनें उन्हें बैंक जाने से हतोत्साहित करती हैं।
वास्तव में बैंकिंग अधिकार केवल शिक्षितों की जागीर नहीं है। एक श्रमिक का पसीना अगर बैंक की तिजोरी तक पहुँचता है, तो उस तिजोरी की चाबी (जानकारी) का अधिकार भी उस श्रमिक का है। समाज का कर्तव्य है कि हम उनके अंगूठे के निशान को उनकी मजबूरी नहीं, उनकी ताकत बनाएं।”
वहीं ओड़िशा के विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में वर्ण और जाति व्यवस्था का श्रम तथा महिला श्रमिकों पर प्रभाव एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। ओड़िशा अपनी आदिवासी बहुलता और पारंपरिक ग्रामीण ढांचे के कारण श्रम के सामाजिक विभाजन के मामले में एक विशेष स्थिति रखता है।
ओड़िशा में जाति आधारित श्रम संरचना:-
ओड़िशा के ग्रामीण क्षेत्रों में जाति व्यवस्था का श्रम से सीधा संबंध रहा है। यहाँ जाति के आधार पर व्यवसायों का विभाजन आज भी कुछ रूपों में देखा जाता है।
- चासा (Chasa): ओड़िशा में यह मुख्य खेतीहर समुदाय है, जो राज्य की लगभग 13% जनसंख्या है।
- गोपाल/गौड़ा (Gopal/Gauda): पारंपरिक रूप से पशुपालन और दूध के व्यवसाय से जुड़े हैं, जो लगभग 12% जनसंख्या हैं।
- जनजातीय वर्ग (मुंडा, किसान, गोंड, भुइंया, खड़िया, उरांव, आदि..): वन-आधारित आजीविका, कृषि, पशुपालन और हस्तशिल्प, मज़दूरी और सरकारी योजनाओं से जुड़ी है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 22.85% है।
- प्रवासी (पलायन): बलांगीर, सुंदरगढ़, संबलपुर जैसे पश्चिमी ओड़िशा के जिलों में निचली जातियों और आदिवासियों के बीच मौसमी पलायन की दर बहुत अधिक है, क्योंकि वे पारंपरिक अकुशल श्रम तक सीमित रह गए हैं।
महिला श्रमिकों की स्थिति:- ओड़िशा के आंकड़े
ओड़िशा की अर्थव्यवस्था में महिला श्रमिकों का योगदान बहुत अधिक है, लेकिन यह अक्सर ‘अदृश्य’ और ‘कम भुगतान’ वाला होता है।
- प्राथमिक क्षेत्र में भागीदारी: ओड़िशा की लगभग 74% महिला श्रमिक कृषि, पशुपालन, वानिकी और खनन जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
- जनजातीय (ST) महिलाएँ: ओड़िशा में जनजातीय महिलाओं की कार्य भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में अधिक है, लेकिन वे मुख्य रूप से कृषि मज़दूर (59.15%) के रूप में काम करती हैं। इसके अलावा, लघु वनोपज के संग्रहण में उनका योगदान लगभग 48% है।
- शहरी बनाम ग्रामीण: शहरी ओड़िशा में महिलाओं की श्रम भागीदारी ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है, जो सामाजिक बंधनों और शहरी श्रम बाज़ार की जटिलताओं को दर्शाता है।
महिला श्रमिकों के लिए नए श्रम कानून (ओड़िशा संशोधन)
ओड़िशा सरकार ने हाल ही में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने और महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं:
- नाइट शिफ्ट की अनुमति: ओड़िशा कैबिनेट ने कारखाना अधिनियम (Factories Act), 1948 में संशोधन कर निजी प्रतिष्ठानों में महिलाओं को रात की पाली (7 PM से 6 AM) में काम करने की अनुमति दी है।
- सुरक्षा मानक: नाइट शिफ्ट के लिए नियोक्ताओं को लिखित सहमति लेनी होगी और GPS-युक्त वाहन, महिला सुरक्षा गार्ड तथा सीसीटीवी जैसी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
- कार्य के घंटे: राज्य ने दैनिक कार्य के घंटों को 9 से बढ़ाकर 10 घंटे कर दिया है (साप्ताहिक अधिकतम 48 घंटे के साथ)।
चुनौतियां और सामाजिक न्याय:-
- दोहरा शोषण: ओड़िशा के ग्रामीण इलाकों में दलित और आदिवासी महिलाएँ जाति, वर्ग और लिंग के तिहरे शोषण का सामना करती हैं। उन्हें अक्सर ‘अशुद्ध’ मानकर सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच से रोका जाता रहा है।
- खनन का प्रभाव: कोरापुट और सुंदरगढ़ जैसे ज़िलों में बड़ी खनन परियोजनाओं (जैसे वेदांता) के खिलाफ आदिवासी महिलाओं ने अपनी आजीविका और ज़मीन बचाने के लिए बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है।
- मनरेगा (MGNREGA) की भूमिका/ (VB-G RAM-G): सुंदरगढ़ जैसे ज़िले में जनजातीय महिलाओं के लिए मनरेगा आजीविका का एक मुख्य साधन बना है, जहाँ कई ब्लॉकों में 75-80% तक श्रमिक आदिवासी समुदायों से हैं।
इन तथ्यों को जोड़कर आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जहाँ एक ओर आधुनिक कानून महिलाओं को नाइट शिफ्ट और उद्योगों में अवसर दे रहे हैं, वहीं ग्रामीण ओड़िशा में जाति आधारित श्रम की जड़ें आज भी गहरी हैं जिसे खत्म करने के लिए सामाजिक सुरक्षा और सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
वर्ण और जाति व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से श्रम को विभाजित कर आर्थिक अवसरों को सीमित किया है, जिसके प्रभाव आज भी असमानता के रूप में विद्यमान हैं। समावेशी विकास के लिए श्रम के पारंपरिक विभाजन को तोड़कर योग्यता और सामाजिक न्याय पर आधारित ढांचे की आवश्यकता है। एक न्यायपूर्ण आर्थिक भविष्य के लिए जन्म के बजाय कौशल और कर्म को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

